बिहार के नालंदा जिले की बिहारशरीफ मंडल कारा में कैदी की रिहाई के दौरान ऐसी गंभीर चूक सामने आई है, जिसने जेल प्रशासन की कार्यप्रणाली पर सवाल खड़े कर दिए हैं। अदालत से जमानत एक कैदी को मिली थी, लेकिन जेल से दूसरे बंदी को रिहा कर दिया गया। दोनों के नाम और पिता के नाम से जुड़ी समानता के कारण पहचान में गड़बड़ी होने की बात सामने आई है। हैरानी की बात यह है कि 24 सितंबर को हुई इस चूक का पता जेल प्रशासन को करीब सात दिनों तक नहीं चला। एक अक्टूबर को रिपोर्ट तैयार होने के बाद मामला सामने आया, जिसके बाद विभाग में हड़कंप मच गया। मामले में जेल प्रशासन की रिपोर्ट के आधार पर तीन वार्डनों को निलंबित कर दिया गया।
दैनिक जागरण की रिपोर्ट के मुताबिक, इस मामले में सतीश चौहान उर्फ सतीश बिंद और चंद्रदीप चौहान उर्फ चंद्रदीप बिंद के नाम सामने आए हैं। सतीश चौहान अस्थावां थाना कांड संख्या 203/26 और 201/26 के आरोपित बताए गए हैं, जबकि चंद्रदीप चौहान उर्फ बौना अस्थावां थाना कांड संख्या 362/25 के मामले में जेल में बंद था। रिपोर्ट के अनुसार, सतीश चौहान के पिता का नाम भी चंद्रदीप है। नामों में समानता के कारण रिहाई के समय कथित तौर पर भ्रम पैदा हुआ और जमानत पाने वाले सतीश की जगह चंद्रदीप जेल से बाहर निकल गया।
इस गलती का सबसे गंभीर पहलू यह रहा कि रिहाई के दिन से लेकर करीब एक सप्ताह तक यह स्पष्ट नहीं हो पाया कि जेल से सही व्यक्ति बाहर गया है या नहीं। 24 सितंबर को रिहाई हुई, जबकि एक अक्टूबर को सहायक प्रवेश शाखा के कक्षपाल नवीश कुमार की रिपोर्ट तैयार होने के बाद गड़बड़ी सामने आई। जांच में पता चला कि जिस सतीश चौहान को जमानत मिली थी, वह जेल में ही बंद था, जबकि दूसरा बंदी उसकी जगह बाहर जा चुका था।
मामले का पता चलने के बाद जेल प्रशासन ने रिहाई से जुड़े रिकॉर्ड की पड़ताल की। इसके बाद दो अक्टूबर की सुबह वास्तविक जमानत पाने वाले सतीश चौहान को विधिवत रिहा किया गया। दूसरी ओर, गलत पहचान के कारण जेल से बाहर निकले चंद्रदीप चौहान उर्फ बौना ने भी उसी दिन स्थानीय अदालत में सरेंडर कर दिया। रिपोर्ट के मुताबिक, वह दोपहर करीब तीन बजे अदालत पहुंचा। इस घटनाक्रम के बाद दोनों बंदियों की स्थिति स्पष्ट हुई, लेकिन रिहाई की प्रक्रिया में हुई चूक को लेकर सवाल बने हुए हैं।
रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि चंद्रदीप चौहान के खिलाफ दो आपराधिक मामले दर्ज थे। इनमें से एक मामले में उसे जमानत मिली थी, जबकि दूसरे मामले में जमानत लंबित थी। ऐसे में यह सवाल भी जांच के दायरे में आता है कि रिहाई के समय बंदी के खिलाफ दर्ज सभी मामलों और उनकी मौजूदा कानूनी स्थिति का सही तरीके से सत्यापन किया गया था या नहीं। इस संबंध में अंतिम निष्कर्ष जांच के बाद ही स्पष्ट होगा।
किसी भी कैदी को रिहा करने से पहले अदालत के आदेश, बंदी की पहचान, पिता के नाम, संबंधित मुकदमे और अन्य आवश्यक दस्तावेजों का मिलान किया जाना जरूरी होता है। यदि दो बंदियों के नाम मिलते-जुलते हों, तो पहचान की पुष्टि के लिए अतिरिक्त सावधानी बरतनी चाहिए। इस मामले में कथित तौर पर हुई गलती से यह सवाल उठा है कि क्या निर्धारित सत्यापन प्रक्रिया का सही ढंग से पालन किया गया था और रिहाई से पहले सभी जरूरी रिकॉर्ड की जांच हुई थी।
मामला सामने आने के बाद एक स्थानीय कांग्रेस नेता की ओर से वरिष्ठ अधिकारियों को आवेदन देकर उच्चस्तरीय जांच की मांग किए जाने की भी जानकारी रिपोर्ट में दी गई है। आवेदन में जेल प्रशासन की कार्यप्रणाली और रिहाई प्रक्रिया में हुई कथित लापरवाही की जांच कराने की मांग उठाई गई थी। मामले में यह पता लगाना महत्वपूर्ण होगा कि गलती किस स्तर पर हुई, संबंधित कर्मियों की जिम्मेदारी क्या थी और क्या रिकॉर्ड की जांच में कोई अन्य कमी भी सामने आती है।
जेल अधीक्षक ने संबंधित ड्यूटीकर्मियों से स्पष्टीकरण मांगा और प्रारंभिक जांच के बाद मुख्यालय को रिपोर्ट भेजी। इसी रिपोर्ट और जेल अधीक्षक की अनुशंसा के आधार पर कारा महानिरीक्षक ने तीन जेल वार्डनों को तत्काल प्रभाव से निलंबित कर दिया। अधिकारियों के मुताबिक, जेल प्रशासन की ओर से चूक हुई है। हालांकि, निलंबन के बाद भी पूरे मामले में जिम्मेदारी का अंतिम निर्धारण जांच के निष्कर्षों पर निर्भर करेगा।
इस घटना ने कैदियों की रिहाई की प्रक्रिया में पहचान सत्यापन और निगरानी को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए हैं। एक ओर जमानत पाने वाले कैदी को समय पर रिहाई नहीं मिल सकी, वहीं दूसरी ओर दूसरे मामले में जमानत लंबित होने की बात सामने आने के बावजूद दूसरा बंदी जेल से बाहर निकल गया। इसलिए जांच में केवल नामों की समानता ही नहीं, बल्कि सभी संबंधित मामलों की स्थिति और रिहाई के दस्तावेजों की जांच भी अहम होगी।
फिलहाल तीन जेलकर्मियों के निलंबन के बाद आगे की जांच पर नजर है। यह स्पष्ट होना बाकी है कि रिहाई के समय पहचान की पुष्टि कैसे हुई, गलती सात दिनों तक रिकॉर्ड में क्यों नहीं पकड़ी गई और भविष्य में ऐसी चूक रोकने के लिए क्या कदम उठाए जाएंगे। बिहारशरीफ मंडल कारा का यह मामला बताता है कि जेल में रिहाई की प्रक्रिया के दौरान दस्तावेजों और पहचान का सटीक मिलान कितना महत्वपूर्ण है।











