ब्रिटेन में प्रवासियों को लेकर गहरी राजनीतिक दरार: स्कॉटलैंड ने भारतीय छात्र को सांसद चुना

इंग्लैंड मे प्रवासियों के खिलाफ बढ़ती नाराजगी के बीच स्कॉटलैंड ने भारतीय छात्र और ट्रांसजेंडर क्यू मणिवन्नन को सांसद चुनकर रचासमावेशी लोकतंत्र का संदेश दिया है।

ब्रिटेन में प्रवासियों को लेकर राजनीति दो ध्रुवों में बंटी दिख रही है। इंग्लैंड में विरोध बढ़ रहा है, जबकि स्कॉटलैंड ने भारतीय छात्र और ट्रांसजेंडर क्यू मणिवन्नन को सांसद चुनकर समावेशी लोकतंत्र का नया संदेश दिया है।

लन्दन: ब्रिटेन इस समय प्रवासियों और विदेशी नागरिकों को लेकर गहरी राजनीतिक और सामाजिक बहस के दौर से गुजर रहा है। एक तरफ इंग्लैंड में अवैध प्रवासियों और बाहरी लोगों के खिलाफ नाराजगी तेजी से बढ़ रही है, वहीं दूसरी ओर स्कॉटलैंड ने एक भारतीय छात्र को संसद सदस्य चुनकर दुनिया को चौंका दिया है।

यह विरोधाभास केवल राजनीतिक मतभेद नहीं, बल्कि ब्रिटेन के भीतर बदलती सामाजिक सोच, पहचान की राजनीति और लोकतंत्र की नई व्याख्या को भी दर्शाता है। इंग्लैंड में जहां “राष्ट्रीय पहचान” और “स्थानीय संस्कृति” को बचाने की बहस तेज हो रही है, वहीं स्कॉटलैंड खुद को एक अधिक समावेशी और बहुसांस्कृतिक समाज के रूप में पेश कर रहा है।

स्कॉटलैंड में भारतीय छात्र ने रचा इतिहास

तमिलनाडु के रहने वाले क्यू. मणिवन्नन ने स्कॉटलैंड की राजनीति में इतिहास रच दिया है। वह स्कॉटिश संसद में पहुंचने वाले पहले भारतीय छात्र और पहले ट्रांसजेंडर सांसद बन गए हैं।

मणिवन्नन भारत के हरियाणा स्थित ओपी जिंदल ग्लोबल यूनिवर्सिटी से पढ़ाई करने के बाद वर्ष 2021 में स्कॉटलैंड गए थे। वहां उन्होंने यूनिवर्सिटी ऑफ सेंट एंड्रूज में इंटरनेशनल रिलेशंस में PhD के लिए दाखिला लिया।

स्कॉटिश ग्रीन्स पार्टी ने उन्हें एडिनबरा क्षेत्र से उम्मीदवार बनाया और उन्होंने चुनाव जीतकर राजनीतिक इतिहास में अपनी जगह बना ली।

उनकी जीत इसलिए भी खास मानी जा रही है क्योंकि वह अभी तक ब्रिटेन के स्थायी नागरिक नहीं हैं और स्टूडेंट वीजा पर स्कॉटलैंड में रह रहे थे।

ट्रांसजेंडर पहचान ने जीत को और ऐतिहासिक बनाया

मणिवन्नन की पहचान केवल एक भारतीय छात्र तक सीमित नहीं है। वह ट्रांसजेंडर समुदाय से आते हैं, जिससे उनकी जीत वैश्विक स्तर पर LGBTQ+ प्रतिनिधित्व के लिहाज से भी बेहद महत्वपूर्ण मानी जा रही है।

विशेषज्ञों का कहना है कि यह चुनाव परिणाम दुनिया को यह संदेश देता है कि लोकतांत्रिक राजनीति अब पारंपरिक पहचान की सीमाओं से आगे बढ़ रही है।

स्कॉटिश ग्रीन्स पार्टी ने उनकी जीत को “समावेशी लोकतंत्र की सफलता” बताया है।

स्कॉटलैंड की प्रवासी नीति क्यों अलग है?

स्कॉटलैंड लंबे समय से प्रवासियों के प्रति अपेक्षाकृत उदार नीति अपनाता रहा है। वर्ष 2020 में वहां की सरकार ने ऐसा नियम लागू किया था, जिसके तहत वैध वीजा पर रहने वाले विदेशी नागरिकों को स्थानीय चुनावों में वोट देने का अधिकार मिला।

सरकार का तर्क था कि जो लोग: टैक्स देते हैं

  • अर्थव्यवस्था में योगदान करते हैं
  • समाज का हिस्सा बनकर रहते हैं

उन्हें राजनीतिक भागीदारी का भी अधिकार मिलना चाहिए।

इसके बाद स्कॉटलैंड ने चुनाव लड़ने के नियमों में भी बदलाव किया, जिससे वैध वीजा धारकों को संसद चुनाव लड़ने की अनुमति मिल गई।

  • इसी बदलाव का फायदा मणिवन्नन को मिला।
  • सांसद बनने के बाद बदल गई स्थिति

मणिवन्नन का स्टूडेंट वीजा इस वर्ष समाप्त होने वाला था। लेकिन सांसद बनने के बाद उनकी स्थिति पूरी तरह बदल गई है।

  • स्कॉटिश संसद सदस्य के रूप में:
  • उनका कार्यकाल 2031 तक रहेगा
  • उन्हें लगभग 77,000 पाउंड वार्षिक वेतन मिलेगा
  • भारतीय मुद्रा में यह राशि करीब 1 करोड़ रुपये प्रतिवर्ष के बराबर है

दिलचस्प बात यह है कि स्टूडेंट वीजा पर पूर्णकालिक नौकरी की अनुमति नहीं होती, लेकिन स्कॉटलैंड ने 2022 में नियम बदलकर जनप्रतिनिधियों के पद को “रोजगार” की श्रेणी से बाहर कर दिया था।

इंग्लैंड में बढ़ रहा है प्रवासियों के खिलाफ गुस्सा

जहां स्कॉटलैंड समावेशी राजनीति का उदाहरण पेश कर रहा है, वहीं इंग्लैंड में प्रवासियों के खिलाफ गुस्सा लगातार बढ़ता दिखाई दे रहा है।

हाल ही में हुए स्थानीय काउंसिल चुनावों में मुख्य विपक्षी दलों के साथ-साथ प्रधानमंत्री की लेबर पार्टी को भी झटका लगा। सबसे ज्यादा फायदा Reform UK पार्टी को हुआ, जिसका मुख्य एजेंडा अवैध प्रवासियों और बाहरी लोगों के खिलाफ सख्त नीति अपनाना है।

इस पार्टी का दावा है कि बड़े पैमाने पर हो रहे प्रवासन से:

  • इंग्लैंड की सांस्कृतिक पहचान बदल रही है
  • स्थानीय संसाधनों पर दबाव बढ़ रहा है
  • रोजगार और सामाजिक सेवाओं पर असर पड़ रहा है
  • विशेष रूप से नावों के जरिए ब्रिटेन पहुंचने वाले अवैध प्रवासियों को लेकर जन असंतोष बढ़ा है।
  • यूरोप और अमेरिका में भी बढ़ रही है राष्ट्रवादी राजनीति

विशेषज्ञों का मानना है कि ब्रिटेन में दिखाई दे रही यह राजनीतिक ध्रुवीकरण केवल स्थानीय घटना नहीं है।

यूरोप और अमेरिका के कई देशों में भी:

  • राष्ट्रवादी राजनीति
  • आव्रजन विरोधी अभियान
  • सांस्कृतिक पहचान की राजनीति
  • तेजी से मजबूत हो रही है।

फ्रांस, जर्मनी, इटली और अमेरिका में भी प्रवासियों को लेकर बहस चुनावी राजनीति का बड़ा मुद्दा बन चुकी है।

भारतीय समुदाय भी बहस के केंद्र में

इंग्लैंड में बढ़ते प्रवासी विरोध का असर दक्षिण एशियाई समुदायों पर भी दिखाई देने लगा है। हालांकि विरोध मुख्य रूप से अवैध प्रवासन को लेकर है, लेकिन कई मामलों में भारतीय, पाकिस्तानी और बांग्लादेशी मूल के लोगों को भी “बाहरी” नजरिए से देखा जा रहा है।

विशेषज्ञों का कहना है कि आर्थिक दबाव और सामाजिक बदलाव के दौर में अक्सर प्रवासी समुदाय राजनीतिक बहस का केंद्र बन जाते हैं।

हालांकि ब्रिटेन की अर्थव्यवस्था लंबे समय से विदेशी पेशेवरों, छात्रों और कामगारों पर निर्भर रही है।

स्कॉटलैंड क्यों चाहता है अधिक प्रवासी?

स्कॉटलैंड की स्थिति इंग्लैंड से काफी अलग मानी जाती है। वहां की आबादी धीरे-धीरे घट रही है और कई क्षेत्रों में कुशल कामगारों की कमी देखी जा रही है।

स्कॉटिश सरकार चाहती है कि:

  • डॉक्टर
  • इंजीनियर
  • IT प्रोफेशनल
  • रिसर्चर
  • अंतरराष्ट्रीय छात्र
  • वहां आकर काम करें और अर्थव्यवस्था को मजबूत बनाएं।

इसी वजह से वहां की नीतियां अपेक्षाकृत अधिक उदार हैं।

लोकतंत्र की नई बहस

मणिवन्नन की जीत ने पूरी दुनिया में एक नई बहस छेड़ दी है। कुछ लोग इसे लोकतंत्र की ताकत और समावेशिता का उदाहरण बता रहे हैं, जबकि आलोचकों का कहना है कि गैर-नागरिकों को संसद तक पहुंचने देना राष्ट्रीय राजनीति के लिए जोखिम हो सकता है।

सोशल मीडिया और ब्रिटिश मीडिया में इस मुद्दे पर तीखी बहस जारी है।

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