Cancer Medicine Price: ₹2,700 की दवा पर ₹27,000 MRP, SC ने उठाए सवाल

Cancer Medicine Price: सुप्रीम कोर्ट ने ₹2,700 की कीमत वाली कैंसर दवा पर ₹27,000 MRP को लेकर गंभीर सवाल उठाए। कोर्ट ने दवाओं की कीमत, मरीजों पर बोझ और

कैंसर जैसी गंभीर बीमारी के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं की कीमतों में भारी अंतर को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने सख्त सवाल उठाए हैं। अदालत के सामने आए एक मामले में कैंसर की एक दवा की Price to Retailer (PTR), यानी दुकानदार को मिलने वाली कीमत, करीब 2,700 रुपये बताई गई, जबकि उसी दवा का अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) 27,000 रुपये था। 

नई दिल्ली: कैंसर जैसी गंभीर बीमारियों के इलाज में इस्तेमाल होने वाली दवाओं की ऊंची कीमतों को लेकर सुप्रीम कोर्ट ने चिंता जताई है। अदालत के सामने एक ऐसा मामला आया, जिसमें एक कैंसर दवा की Price to Retailer यानी PTR कीमत ₹2,700 बताई गई, जबकि उसी दवा पर अधिकतम खुदरा मूल्य (MRP) ₹27,000 दर्ज था। यानी रिटेलर तक पहुंचने वाली कीमत और MRP के बीच करीब दस गुना का अंतर सामने आया।

सुप्रीम कोर्ट की जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की पीठ ने इस बड़े मूल्य अंतर पर सवाल उठाते हुए दवा की कीमत तय करने की मौजूदा व्यवस्था पर गंभीर चिंता व्यक्त की। अदालत यह सुनवाई उन याचिकाओं पर कर रही है, जिनमें दवाओं की कीमतों, जेनेरिक दवाओं, मेडिकल डिवाइस और मरीजों के इलाज के खर्च से जुड़े मुद्दे उठाए गए हैं। मामले की अगली सुनवाई 29 सितंबर को होगी।

₹2,700 और ₹27,000 के बीच इतना बड़ा अंतर क्यों?

सुनवाई के दौरान अदालत को बताया गया कि कैंसर के इलाज में इस्तेमाल होने वाली एक आवश्यक दवा रिटेलर को ₹2,700 में उपलब्ध होती है, लेकिन उसकी पैकेजिंग पर ₹27,000 की MRP दर्ज है। जस्टिस संदीप मेहता ने इस अंतर पर कड़ा सवाल उठाते हुए पूछा कि जब दवा निर्माता इसे रिटेलर को काफी कम कीमत पर उपलब्ध कराता है तो उपभोक्ता के लिए इतनी अधिक MRP निर्धारित करने की जरूरत क्यों है।

अदालत की टिप्पणी का मुख्य केंद्र यह था कि जीवनरक्षक दवाओं की कीमत और मरीज द्वारा चुकाई जाने वाली वास्तविक राशि के बीच इतना बड़ा अंतर इलाज को आर्थिक रूप से कठिन बना सकता है।

दवाओं की कीमतों पर मौजूदा नियमों को लेकर सवाल

सुनवाई के दौरान Drugs (Prices Control) Order, 2013 यानी DPCO के तहत दवाओं की कीमत नियंत्रित करने की व्यवस्था पर भी चर्चा हुई। याचिकाकर्ता की ओर से अदालत को बताया गया कि निर्धारित सूची में शामिल दवाओं के लिए कीमतों पर सीलिंग व्यवस्था लागू होती है, जबकि बड़ी संख्या में गैर-निर्धारित (non-scheduled) दवाओं की शुरुआती कीमत तय करने पर उसी तरह का नियंत्रण नहीं है।

याचिकाकर्ता के अनुसार, यही अंतर कुछ दवाओं के शुरुआती मूल्य निर्धारण में बड़े अंतर की गुंजाइश पैदा कर सकता है। सुनवाई में National Pharmaceutical Pricing Authority (NPPA) की भूमिका और दवाओं की कीमतों से संबंधित जानकारी की उपलब्धता का मुद्दा भी सामने आया।

मरीजों पर पड़ सकता है सीधा आर्थिक बोझ

कैंसर का इलाज अक्सर लंबे समय तक चल सकता है और इसमें दवाओं, जांच तथा अन्य चिकित्सा सेवाओं पर लगातार खर्च होता है। ऐसे में किसी आवश्यक दवा की कीमत में बड़ा अंतर मरीज और उसके परिवार के कुल इलाज खर्च को प्रभावित कर सकता है। सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई के दौरान इस बात पर भी चिंता जताई कि गंभीर बीमारी से जूझ रहे परिवारों को इलाज का खर्च उठाने के लिए अपनी संपत्ति या बचत तक का इस्तेमाल करना पड़ सकता है। हालांकि, अदालत के सामने रखे गए कुछ आरोप याचिकाकर्ताओं की दलीलों का हिस्सा हैं और उन पर अंतिम न्यायिक निष्कर्ष अभी नहीं आया है।

सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं पर भी असर

अदालत ने सरकारी स्वास्थ्य योजनाओं के तहत दवाओं की कीमतों के प्रभाव पर भी सवाल उठाए। सुनवाई के दौरान यह मुद्दा सामने आया कि यदि किसी सरकारी स्वास्थ्य योजना के तहत अस्पताल महंगी दर पर दवा खरीदता है और उसका खर्च सरकार से प्रतिपूर्ति के रूप में लिया जाता है, तो इसका वित्तीय भार सार्वजनिक धन पर पड़ सकता है।

आयुष्मान भारत जैसी योजनाओं के संदर्भ में भी यह सवाल उठाया गया कि सरकारी फंड से इलाज कराने वाले मरीजों के लिए महंगी दवाओं की कीमतों का असर अंततः सरकारी खर्च पर पड़ सकता है।

Leave a comment