चीन की अर्थव्यवस्था गंभीर असंतुलन से गुजर रही है। अपस्फीति और घरेलू कर्ज बढ़ने से मांग कमजोर हो गई है। कंपनियां उत्पादन बढ़ा रही हैं लेकिन बिक्री घट रही है। निर्यात ही GDP को सहारा दे रहा है।
China: चीन खुद को दुनिया के सामने एक मजबूत और अमीर अर्थव्यवस्था के रूप में पेश करता रहा है। बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर प्रोजेक्ट, तेज रफ्तार ट्रेनें, विशाल फैक्ट्रियां और विदेशी निवेश के आंकड़े उसकी इस छवि को और मजबूत बनाते हैं। लेकिन अब इस चमकदार तस्वीर के पीछे छुपा सच धीरे धीरे सामने आने लगा है। हालिया रिपोर्ट्स संकेत दे रही हैं कि चीनी अर्थव्यवस्था गंभीर असंतुलन से गुजर रही है, जहां विकास के आंकड़े मजबूत दिखते हैं लेकिन जमीनी हकीकत इससे काफी अलग है।
अपस्फीति ने बढ़ाई चिंता
चीन की अर्थव्यवस्था इस समय Deflation यानी अपस्फीति के दौर से जूझ रही है। इसका मतलब है कि बाजार में सामान की कीमतें लगातार गिर रही हैं। आमतौर पर कीमतों का गिरना उपभोक्ताओं के लिए राहत माना जाता है, लेकिन जब यह लंबे समय तक चलता है तो यह अर्थव्यवस्था के लिए खतरे की घंटी बन जाता है। चीन में यही स्थिति देखने को मिल रही है, जहां जरूरत की चीजें सस्ती होती जा रही हैं लेकिन लोग खर्च करने से बच रहे हैं।
ब्लूमबर्ग रिपोर्ट का बड़ा खुलासा
ब्लूमबर्ग की एक रिपोर्ट ने चीन की आर्थिक स्थिति पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। रिपोर्ट के मुताबिक चीन में करीब 70 रोजमर्रा के उत्पादों की कीमतों में तेज गिरावट दर्ज की गई है। यह गिरावट आधिकारिक Consumer Price Index यानी CPI से भी कहीं ज्यादा है। इसका सीधा संकेत है कि बाजार में मांग कमजोर है और उत्पादन जरूरत से ज्यादा हो चुका है।
अत्यधिक उत्पादन बनी बड़ी समस्या
चीन की सबसे बड़ी ताकत उसकी मैन्युफैक्चरिंग क्षमता मानी जाती रही है। लेकिन अब यही ताकत उसकी कमजोरी बनती नजर आ रही है। फैक्ट्रियों में जरूरत से ज्यादा सामान तैयार हो रहा है, जबकि खरीदने वाले ग्राहक कम होते जा रहे हैं। इसका नतीजा यह हुआ है कि कंपनियां अपने स्टॉक को निकालने के लिए कीमतें लगातार घटा रही हैं।
रोजमर्रा की चीजें सबसे ज्यादा प्रभावित
सबसे ज्यादा असर उन वस्तुओं पर पड़ा है, जिनका इस्तेमाल आम लोग हर दिन करते हैं। खाने पीने का सामान, घरेलू उपयोग की चीजें और दैनिक जरूरतों से जुड़ा उत्पाद लगातार सस्ते हो रहे हैं। इससे साफ होता है कि आम चीनी नागरिक की क्रय शक्ति कमजोर हो रही है।
झूठ छुपाने का पुराना रिकॉर्ड
चीन पर पहले भी कई बार यह आरोप लग चुके हैं कि वह अपनी सच्चाई को दुनिया से छुपाता है। कोरोना महामारी के दौरान भी यही देखने को मिला था, जब संक्रमण के शुरुआती आंकड़े और हालात लंबे समय तक दुनिया से छुपाए गए। अब अर्थव्यवस्था के मामले में भी चीन पर इसी तरह के आरोप लग रहे हैं।
आर्थिक आंकड़ों पर संदेह
चीन दावा करता है कि उसकी अर्थव्यवस्था करीब पांच प्रतिशत की रफ्तार से बढ़ रही है। लेकिन विशेषज्ञों का मानना है कि यह आंकड़ा पूरी सच्चाई नहीं दिखाता। जब बाजार में मांग कमजोर हो, कीमतें गिर रही हों और लोग खर्च करने से बच रहे हों, तो तेज ग्रोथ के दावे सवालों के घेरे में आ जाते हैं।

कर्ज के बोझ तले दबता ड्रैगन
दुनिया को कर्ज देने वाला चीन खुद भारी कर्ज में डूबता नजर आ रहा है। सरकारी आंकड़ों और अंतरराष्ट्रीय रिपोर्ट्स के मुताबिक चीन पर घरेलू और विदेशी कर्ज तेजी से बढ़ा है। यह कर्ज अब उसकी अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा खतरा बनता जा रहा है।
SAFE रिपोर्ट की चेतावनी
स्टेट एडमिनिस्ट्रेशन ऑफ फॉरेन एक्सचेंज यानी SAFE की रिपोर्ट के अनुसार 2025 के अंत तक चीन पर सरकारी कर्ज करीब 18.8 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर तक पहुंचने का अनुमान लगाया गया था। वहीं बाहरी कर्ज 2.37 से 2.44 ट्रिलियन अमेरिकी डॉलर के बीच रहा। ये आंकड़े चीन की वित्तीय सेहत पर गंभीर सवाल खड़े करते हैं।
घरेलू कर्ज की तेज रफ्तार
चीन में घरेलू कर्ज की स्थिति और भी चिंताजनक है। खासकर निजी सेक्टर में कर्ज का बोझ तेजी से बढ़ा है। डलास फेडरल रिजर्व बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक 2007 से 2009 के वैश्विक वित्तीय संकट के बाद चीन में ऋण विस्तार का दौर शुरू हुआ, जो आज तक थमा नहीं है।
GDP के मुकाबले बढ़ता कर्ज
रिपोर्ट्स के अनुसार 2016 तक के आठ सालों में चीन के गैर वित्तीय निजी क्षेत्र का कर्ज GDP के 106 प्रतिशत से बढ़कर 188 प्रतिशत तक पहुंच गया। मीडिया रिपोर्ट्स यह भी बताती हैं कि 2025 तक चीन का घरेलू कर्ज 2015 की तुलना में लगभग दोगुना हो चुका है।
उपभोक्ता खर्च में गिरावट
चीन में लोग भविष्य को लेकर असमंजस में हैं। नौकरी की अनिश्चितता, प्रॉपर्टी सेक्टर की सुस्ती और कर्ज के बोझ ने आम नागरिक को खर्च करने से रोक दिया है। यही वजह है कि बाजार में मांग नहीं बढ़ पा रही और कंपनियां कीमतें घटाने पर मजबूर हैं।
निर्यात बना GDP का सहारा
कर्ज बढ़ने और घरेलू मांग कमजोर होने के बावजूद चीन की GDP में बढ़ोतरी की बड़ी वजह उसका Export मॉडल है। चीन आज भी दुनिया को भारी मात्रा में सामान भेजता है। इसी निर्यात के दम पर उसकी अर्थव्यवस्था का पहिया घूम रहा है।
प्रति व्यक्ति आय में इजाफा
IMF और World Bank के आंकड़ों के अनुसार चीन की प्रति व्यक्ति GDP में बीते दशकों में बड़ा उछाल आया है। 2024 से 2025 के बीच यह आंकड़ा करीब 13,300 डॉलर से बढ़कर 13,800 डॉलर तक पहुंच गया। यह तुलना तब और चौंकाती है जब 1960 के दशक में चीन की प्रति व्यक्ति आय 100 डॉलर से भी कम थी।













