चीन-ऑस्ट्रेलिया संबंध अब भी नाजुक, पूर्व राजदूत ने चेताया- स्थिरता तय नहीं

ऑस्ट्रेलिया के पूर्व चीन राजदूत ग्राहम फ्लेचर ने चेताया कि दोनों देशों के रिश्ते अब भी नाजुक है। रणनीतिक, डार्विन पोर्ट और प्रशांत क्षेत्र तनाव बढ़ा सकते हैं।

ऑस्ट्रेलिया के पूर्व चीन राजदूत ग्राहम फ्लेचर ने चेताया है कि दोनों देशों के रिश्ते अब भी नाजुक हैं। उन्होंने कहा कि रणनीतिक मतभेद, तकनीकी प्रतिबंध, डार्विन पोर्ट और प्रशांत क्षेत्र में बढ़ती प्रतिस्पर्धा भविष्य में संबंधों को फिर प्रभावित कर सकती है।

कैनबरा: ऑस्ट्रेलिया के चीन में पूर्व राजदूत ग्राहम फ्लेचर ने चेतावनी दी है कि चीन और ऑस्ट्रेलिया के बीच संबंधों में हाल के वर्षों में सुधार जरूर आया है, लेकिन यह स्थिरता अभी भी बेहद नाजुक है। उनका कहना है कि दोनों देशों के बीच रणनीतिक और वैचारिक मतभेद इतने गहरे हैं कि रिश्ते भविष्य में किसी भी बड़े झटके से दोबारा प्रभावित हो सकते हैं। फ्लेचर ने एक नई रिपोर्ट में कहा है कि कैनबरा के लिए चीन के साथ स्थिर संबंध बनाए रखना जरूरी है, लेकिन इसे स्थायी उपलब्धि मानना उचित नहीं होगा।

पूर्व राजदूत ने रिश्तों को बताया संवेदनशील

ऑस्ट्रेलिया में चीन के साथ संबंधों को लेकर जारी बहस के बीच ग्राहम फ्लेचर की यह रिपोर्ट महत्वपूर्ण मानी जा रही है। फ्लेचर 2019 में चीन में ऑस्ट्रेलिया के राजदूत बने थे। उनका कार्यकाल ऐसे समय शुरू हुआ था, जब दोनों देशों के बीच रिश्ते तेजी से बिगड़ने लगे थे।

ऑस्ट्रेलिया की तत्कालीन मॉरिसन सरकार ने चीन में कोरोना वायरस के शुरुआती प्रकोप की स्वतंत्र अंतरराष्ट्रीय जांच की मांग की थी। इसके बाद बीजिंग और कैनबरा के बीच तनाव काफी बढ़ गया था। व्यापार और निवेश से जुड़े कई क्षेत्रों में भी दोनों देशों के रिश्तों पर इसका असर पड़ा।

2022 में लेबर पार्टी के सत्ता में आने के बाद दोनों देशों ने रिश्तों को दोबारा स्थिर करने की दिशा में कदम उठाए। व्यापारिक प्रतिबंधों में कुछ राहत और उच्चस्तरीय बातचीत की बहाली से दोनों देशों के संबंधों में सुधार दिखाई दिया। हालांकि, फ्लेचर के मुताबिक यह सुधार अभी इतना मजबूत नहीं है कि इसे स्थायी सामान्य स्थिति माना जा सके।

चीन के साथ सहयोग बढ़ाने के प्रस्तावों पर ऑस्ट्रेलिया सतर्क

लोवी इंस्टीट्यूट के लिए तैयार अपनी रिपोर्ट में फ्लेचर ने कहा कि चीन ने ऑस्ट्रेलिया के साथ बुनियादी ढांचे और आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस जैसे क्षेत्रों में सहयोग बढ़ाने की कोशिश की है। हालांकि, उनका आकलन है कि ऑस्ट्रेलियाई सरकार ने इन प्रस्तावों को लेकर काफी सावधानी बरती और कुछ प्रयासों को आगे नहीं बढ़ाया।

फ्लेचर के मुताबिक, कैनबरा शायद मौजूदा सीमित लेकिन अपेक्षाकृत स्थिर रिश्ते को पर्याप्त मान रहा है। सरकार के लिए चीन के साथ आर्थिक संबंध बनाए रखना महत्वपूर्ण है, लेकिन रणनीतिक क्षेत्रों में चीन पर अत्यधिक निर्भरता पैदा करने से बचना भी उतना ही जरूरी माना जा रहा है।

उनका तर्क है कि पिछले वर्षों में चीन की आर्थिक दबाव की रणनीति ने ऑस्ट्रेलिया को यह अनुभव कराया कि बीजिंग जिस आर्थिक या व्यापारिक प्रभाव को अपने पास मानता है, उसका इस्तेमाल राजनीतिक परिस्थितियों के अनुसार किया जा सकता है।

आर्थिक निर्भरता को लेकर ऑस्ट्रेलिया की चिंता

फ्लेचर ने कहा कि चीन के साथ रिश्तों में ऑस्ट्रेलिया के लिए एक महत्वपूर्ण सबक यह रहा है कि आर्थिक निर्भरता को रणनीतिक जोखिम में बदलने से रोकना जरूरी है। उनके अनुसार, अगर किसी एक देश के पास दूसरे देश पर बहुत अधिक आर्थिक प्रभाव हो जाता है तो भविष्य में राजनीतिक मतभेद के दौरान उस प्रभाव का इस्तेमाल दबाव बनाने के लिए किया जा सकता है।

इसी वजह से ऑस्ट्रेलिया चीन के साथ आर्थिक संबंधों को पूरी तरह खत्म करने के बजाय उन्हें संतुलित तरीके से आगे बढ़ाना चाहता है। व्यापार जारी रखना और रणनीतिक निर्भरता सीमित रखना कैनबरा की नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा बन गया है।

यह संतुलन ऑस्ट्रेलिया के लिए आसान नहीं है क्योंकि चीन उसके सबसे महत्वपूर्ण व्यापारिक साझेदारों में शामिल है। ऐसे में दोनों देशों के बीच आर्थिक संबंधों को बनाए रखते हुए राष्ट्रीय सुरक्षा हितों की रक्षा करना सरकार के सामने बड़ी चुनौती है।

दोनों देशों के बीच विचारधारा की खाई

फ्लेचर का मानना है कि ऑस्ट्रेलिया और चीन के बीच भविष्य में बेहद करीबी संबंध बनने की संभावना सीमित है। इसके पीछे सिर्फ व्यापार या तत्काल राजनीतिक मतभेद नहीं, बल्कि दोनों देशों की क्षेत्रीय व्यवस्था और राष्ट्रीय सुरक्षा को लेकर अलग-अलग सोच है।

ऑस्ट्रेलिया अमेरिका और उसके सहयोगियों के साथ सुरक्षा साझेदारी को अपनी रणनीतिक नीति का महत्वपूर्ण हिस्सा मानता है। दूसरी ओर चीन एशिया-प्रशांत क्षेत्र में अपनी राजनीतिक, आर्थिक और सैन्य भूमिका को लगातार मजबूत कर रहा है।

फ्लेचर के मुताबिक दोनों देशों की विश्व दृष्टि और रणनीतिक एजेंडा में अंतर इतना व्यापक है कि कैनबरा के लिए चीन के साथ बेहद करीबी राजनीतिक संबंध बनाने की कोशिश व्यावहारिक नहीं होगी। उनका कहना है कि ऑस्ट्रेलिया को रिश्तों को वास्तविक परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए संभालना होगा।

ताइवान पर संघर्ष सबसे बड़ा जोखिम

पूर्व राजदूत ने चीन और ऑस्ट्रेलिया के संबंधों पर भविष्य में संभावित बड़े संकटों को लेकर भी चिंता जताई है। उन्होंने चीन की ओर से ताइवान पर सैन्य कार्रवाई जैसे बेहद गंभीर घटनाक्रम को संभावित खतरे के रूप में स्वीकार किया, हालांकि उन्होंने इसे फिलहाल सबसे मजबूत या तत्काल जोखिम नहीं माना। ताइवान को लेकर चीन और अमेरिका के बीच तनाव बढ़ने की स्थिति में ऑस्ट्रेलिया पर भी रणनीतिक दबाव बढ़ सकता है। ऑस्ट्रेलिया अमेरिका का महत्वपूर्ण सुरक्षा सहयोगी है, जबकि चीन उसका प्रमुख आर्थिक साझेदार है। 

इसलिए किसी बड़े क्षेत्रीय सैन्य संकट में कैनबरा के लिए दोनों पक्षों के बीच संतुलन बनाना बेहद मुश्किल हो सकता है। फ्लेचर के मुताबिक, इससे भी पहले रिश्तों में गिरावट किसी एक बड़े मुद्दे के बजाय कई गंभीर मतभेदों के लगातार जमा होने से शुरू हो सकती है। अगर दोनों देश इन विवादों को प्रभावी तरीके से नियंत्रित नहीं कर पाए तो संबंध दोबारा निचले स्तर पर जा सकते हैं।

डार्विन पोर्ट को लेकर बढ़ सकता है विवाद

ऑस्ट्रेलिया के डार्विन पोर्ट से जुड़ा मुद्दा भी चीन-ऑस्ट्रेलिया संबंधों के लिए संवेदनशील बन सकता है। पोर्ट ऑफ डार्विन का संचालन चीनी स्वामित्व वाली कंपनी से जुड़ा हुआ है और ऑस्ट्रेलियाई सरकार इस व्यवस्था की समीक्षा कर रही है। फ्लेचर ने संकेत दिया कि डार्विन पोर्ट पर ऑस्ट्रेलिया की नीति बीजिंग के साथ तनाव का कारण बन सकती है। ऑस्ट्रेलिया में रणनीतिक बुनियादी ढांचे पर विदेशी स्वामित्व को लेकर सुरक्षा चिंताएं लगातार बढ़ी हैं।

चीन इस तरह के सुरक्षा आधारित निवेश प्रतिबंधों को लेकर पहले से असहज रहा है। अगर डार्विन पोर्ट को लेकर कैनबरा कोई बड़ा फैसला करता है तो इससे दोनों देशों के बीच आर्थिक और राजनीतिक विवाद फिर बढ़ सकता है।

चीन पश्चिमी तकनीकी प्रतिबंधों से नाराज

फ्लेचर ने कहा कि चीन अमेरिका और यूरोपीय देशों की उन नीतियों को लेकर increasingly असहज है, जिनके तहत राष्ट्रीय सुरक्षा के आधार पर चीनी तकनीक और निवेश पर प्रतिबंध या नियंत्रण लगाए जा रहे हैं। चीन पहले ही सेमीकंडक्टर, आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस, दूरसंचार और अन्य रणनीतिक तकनीकों से संबंधित पश्चिमी प्रतिबंधों का विरोध करता रहा है। 

बीजिंग का मानना है कि ऐसी नीतियां उसके आर्थिक और तकनीकी विकास को रोकने की कोशिश हैं।फ्लेचर के अनुसार, चीन इन प्रतिबंधों का जवाब देने के लिए ऐसी व्यवस्थाएं विकसित कर रहा है जिनका इस्तेमाल भविष्य में वैश्विक स्तर पर किया जा सकता है। इससे पश्चिमी देशों और चीन के बीच तकनीकी प्रतिस्पर्धा और तेज होने की संभावना है।

प्रशांत द्वीपों में भी बढ़ सकती है प्रतिस्पर्धा

ऑस्ट्रेलिया और चीन के बीच रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का एक अन्य महत्वपूर्ण क्षेत्र प्रशांत द्वीप समूह है। पिछले वर्षों में चीन ने इस क्षेत्र में अपनी आर्थिक और कूटनीतिक मौजूदगी बढ़ाने की कोशिश की है। ऑस्ट्रेलिया भी लंबे समय से प्रशांत द्वीप देशों को अपनी विदेश नीति की प्राथमिकता मानता रहा है।

फ्लेचर ने चेतावनी दी कि अगर किसी प्रशांत द्वीप देश में राजनीतिक संकट या बड़े स्तर पर अशांति पैदा होती है तो वहां चीन और ऑस्ट्रेलिया के बीच प्रभाव की प्रतिस्पर्धा और तेज हो सकती है। अगर दोनों देशों के सुरक्षा या सैन्य कर्मी किसी क्षेत्र में अलग-अलग उद्देश्यों के साथ मौजूद होते हैं, तो स्थानीय राजनीतिक संकट अंतरराष्ट्रीय रणनीतिक विवाद में बदल सकता है।

ऑस्ट्रेलिया के लिए आगे की राह चुनौतीपूर्ण

चीन के साथ रिश्तों में सुधार ऑस्ट्रेलिया के आर्थिक हितों के लिए महत्वपूर्ण है, लेकिन राष्ट्रीय सुरक्षा और रणनीतिक स्वायत्तता को लेकर कैनबरा सतर्क रहना चाहता है। यही वजह है कि दोनों देशों के बीच व्यापार और कूटनीतिक संवाद जारी रहने के बावजूद संवेदनशील क्षेत्रों में सहयोग को लेकर सीमाएं बनी हुई हैं। फ्लेचर की रिपोर्ट का मुख्य संदेश यही है कि चीन-ऑस्ट्रेलिया संबंधों में स्थिरता को स्थायी स्थिति मानना जोखिम भरा होगा। 

दोनों देशों के बीच आर्थिक हित उन्हें संवाद बनाए रखने के लिए मजबूर करते हैं, लेकिन सुरक्षा, तकनीक, क्षेत्रीय प्रभाव और वैश्विक राजनीति पर मतभेद भविष्य में तनाव पैदा कर सकते हैं। आने वाले वर्षों में ऑस्ट्रेलिया के लिए सबसे बड़ी चुनौती चीन के साथ व्यापारिक रिश्तों को बनाए रखते हुए रणनीतिक जोखिमों को नियंत्रित करना होगी। वहीं चीन के लिए भी ऑस्ट्रेलिया जैसे क्षेत्रीय साझेदारों के साथ संबंधों को बेहतर बनाए रखना महत्वपूर्ण रहेगा। ऐसे में दोनों देशों के बीच संबंध पूरी तरह टकराव या पूरी तरह निकटता की बजाय सावधानीपूर्ण सहयोग और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा के बीच आगे बढ़ते रहने की संभावना है।

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