सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना के दानम नागेंद्र की विधानसभा सदस्यता से जुड़ी अयोग्यता बरकरार रखी। BRS से कांग्रेस में जाने के मामले में सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने ‘आया राम, गया राम’ और ‘फिर आया राम’ टिप्पणी की।
नई दिल्ली: तेलंगाना के कांग्रेस विधायक दानम नागेंद्र के दलबदल मामले में सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार को तेलंगाना हाईकोर्ट के उस फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया, जिसमें उन्हें दलबदल विरोधी कानून के तहत विधानसभा सदस्य के रूप में अयोग्य ठहराया गया था। सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने भारतीय राजनीति में बार-बार पार्टी बदलने के लिए इस्तेमाल होने वाले मुहावरे ‘आया राम, गया राम’ का संदर्भ देते हुए कहा, ‘फिर आया राम’।
सुप्रीम कोर्ट की तीन सदस्यीय पीठ में मुख्य न्यायाधीश सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्या बागची और जस्टिस वी. मोहना शामिल थे। पीठ ने नागेंद्र की उस चुनौती पर सुनवाई की, जिसमें उन्होंने तेलंगाना हाईकोर्ट के 18 सितंबर के आदेश को चुनौती दी थी। हाईकोर्ट ने विधानसभा अध्यक्ष के उस फैसले को रद्द कर दिया था, जिसमें नागेंद्र के खिलाफ दायर अयोग्यता याचिकाएं खारिज कर दी गई थीं।
सुप्रीम कोर्ट में क्या हुआ?
दानम नागेंद्र की ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी पेश हुए। उन्होंने दलील दी कि संविधान की दसवीं अनुसूची, यानी दलबदल विरोधी कानून, किसी सदस्य के पार्टी छोड़ने के मामले में कुछ परिस्थितियों में उसे वापस आने की गुंजाइश देता है।
इसी दलील के संदर्भ में सुनवाई के दौरान जस्टिस जॉयमाल्या बागची ने ‘घर वापसी’ का उल्लेख किया। अदालत में दलबदल और दोबारा पार्टी में लौटने की स्थिति पर चर्चा के दौरान ‘आया राम, गया राम’ मुहावरे का संदर्भ भी आया।
जस्टिस बागची ने हल्के-फुल्के अंदाज में नागेंद्र की राजनीतिक स्थिति को लेकर टिप्पणी की। इसके बाद जस्टिस वी. मोहना ने स्पष्ट किया कि ‘घर वापसी’ पार्टी में हो सकती है, लेकिन इसका अर्थ विधानसभा सदस्य के रूप में स्वतः वापसी नहीं है।
सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट के आदेश में दखल नहीं दिया
सुप्रीम कोर्ट ने अंततः तेलंगाना हाईकोर्ट के फैसले में हस्तक्षेप करने से इनकार कर दिया। इसका अर्थ है कि नागेंद्र की विधानसभा सदस्यता से संबंधित हाईकोर्ट का अयोग्यता आदेश बरकरार रहेगा। हाईकोर्ट ने 18 सितंबर को विधानसभा अध्यक्ष गद्दम प्रसाद कुमार के उस आदेश को रद्द कर दिया था, जिसमें नागेंद्र के खिलाफ दलबदल संबंधी याचिकाओं को खारिज कर दिया गया था।
हाईकोर्ट ने माना था कि नागेंद्र ने संविधान की दसवीं अनुसूची के तहत अयोग्यता अर्जित की थी। मामले में अयोग्यता की प्रभावी तारीख को 23 अप्रैल 2024 माना गया था। यही वह तारीख थी जब नागेंद्र ने कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में 2024 लोकसभा चुनाव के लिए नामांकन दाखिल किया था।
BRS के टिकट पर जीते थे खैराताबाद से चुनाव
दानम नागेंद्र ने 2023 तेलंगाना विधानसभा चुनाव में खैराताबाद विधानसभा सीट से भारत राष्ट्र समिति (BRS) के टिकट पर जीत दर्ज की थी। इससे पहले भी वह 2018 में इसी सीट से विधायक चुने गए थे। 2023 में BRS के टिकट पर विधायक बनने के बाद नागेंद्र मार्च 2024 में कांग्रेस में शामिल हो गए। इसके बाद उन्होंने 2024 लोकसभा चुनाव में सिकंदराबाद लोकसभा सीट से कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में चुनाव लड़ा।
हालांकि, उस समय वह विधानसभा सदस्य बने हुए थे। लोकसभा चुनाव में उन्हें भाजपा उम्मीदवार जी. किशन रेड्डी से हार का सामना करना पड़ा। यही घटनाक्रम बाद में उनके खिलाफ दलबदल विरोधी कानून के तहत अयोग्यता विवाद का प्रमुख आधार बना।
किस आधार पर मांगी गई थी अयोग्यता?
नागेंद्र की अयोग्यता की मांग करने वाली याचिकाएं भाजपा के विधानसभा नेता अलेटी महेश्वर रेड्डी और BRS विधायक पाडी कौशिक रेड्डी ने दायर की थीं।
याचिकाकर्ताओं ने संविधान की दसवीं अनुसूची के पैराग्राफ 2(1)(a) का हवाला दिया। यह प्रावधान किसी विधायक या सांसद द्वारा स्वेच्छा से उस राजनीतिक दल की सदस्यता छोड़ने से संबंधित है, जिसके टिकट पर वह निर्वाचित हुआ था।
याचिकाकर्ताओं का तर्क था कि नागेंद्र के कांग्रेस में शामिल होने और कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में लोकसभा चुनाव लड़ने की परिस्थितियां दलबदल विरोधी प्रावधानों के तहत उनकी अयोग्यता का आधार बनती हैं।
विधानसभा अध्यक्ष ने पहले याचिकाएं खारिज की थीं
इस मामले में विधानसभा अध्यक्ष गद्दम प्रसाद कुमार ने पहले नागेंद्र के खिलाफ दायर अयोग्यता याचिकाओं को खारिज कर दिया था। यह फैसला 11 मार्च को आया था। इसके बाद याचिकाकर्ताओं ने विधानसभा अध्यक्ष के फैसले को तेलंगाना हाईकोर्ट में चुनौती दी। हाईकोर्ट ने मामले की सुनवाई के बाद 18 सितंबर को अध्यक्ष के आदेश को रद्द कर दिया और नागेंद्र को अयोग्य घोषित कर दिया।
इससे पहले भी मामले में न्यायिक हस्तक्षेप हो चुका था। जुलाई 2025 में सुप्रीम कोर्ट ने तेलंगाना विधानसभा अध्यक्ष को नागेंद्र और दो अन्य विधायकों के खिलाफ लंबित अयोग्यता याचिकाओं पर तीन महीने के भीतर फैसला लेने का निर्देश दिया था। बाद में फरवरी 2026 में सुप्रीम कोर्ट ने अध्यक्ष को मामले पर निर्णय लेने का एक और अवसर देते हुए समयसीमा के भीतर फैसला करने को कहा था।
हाईकोर्ट के आदेश के बाद सुप्रीम कोर्ट पहुंचे नागेंद्र
18 सितंबर के हाईकोर्ट आदेश के बाद नागेंद्र ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। उनके वरिष्ठ अधिवक्ता मुकुल रोहतगी ने 21 सितंबर को मामले की जल्द सुनवाई की मांग की थी।
रोहतगी ने अदालत के समक्ष यह आशंका भी जताई थी कि हाईकोर्ट के आदेश के बाद खैराताबाद विधानसभा सीट पर उपचुनाव की प्रक्रिया शुरू की जा सकती है। सुप्रीम कोर्ट ने मामले को सुनवाई के लिए सूचीबद्ध किया।
अब सुप्रीम कोर्ट द्वारा हाईकोर्ट के आदेश में हस्तक्षेप से इनकार किए जाने के बाद नागेंद्र की विधानसभा सदस्यता का विवाद उनके खिलाफ दिए गए अयोग्यता आदेश के पक्ष में आगे बढ़ा है।
‘आया राम, गया राम’ क्यों आया चर्चा में?
भारत की राजनीति में ‘आया राम, गया राम’ मुहावरा नेताओं के बार-बार दल बदलने के संदर्भ में लंबे समय से इस्तेमाल होता रहा है। सुप्रीम कोर्ट की मौजूदा सुनवाई में इसका संदर्भ नागेंद्र के BRS से कांग्रेस में जाने और फिर दलबदल के कानूनी परिणामों से जुड़ी दलीलों के दौरान आया।
सुनवाई में जस्टिस बागची ने रोहतगी की दलील के संदर्भ में ‘फिर आया राम’ टिप्पणी की। अदालत में यह भी स्पष्ट किया गया कि किसी राजनीतिक दल में वापसी और विधानसभा की सदस्यता की बहाली अलग-अलग कानूनी प्रश्न हैं।
दलबदल विरोधी कानून का महत्व
दानम नागेंद्र का मामला भारत के दलबदल विरोधी कानून के तहत विधायकों की सदस्यता और राजनीतिक दल बदलने के कानूनी परिणामों से जुड़ा है। संविधान की दसवीं अनुसूची को राजनीतिक दल बदलने के कारण निर्वाचित प्रतिनिधियों की अयोग्यता से संबंधित प्रावधानों के रूप में जाना जाता है।
नागेंद्र मामले में मुख्य सवाल यह था कि BRS के टिकट पर निर्वाचित विधायक के कांग्रेस में शामिल होने और बाद में कांग्रेस उम्मीदवार के रूप में लोकसभा चुनाव लड़ने का विधानसभा सदस्यता पर क्या प्रभाव पड़ा। तेलंगाना हाईकोर्ट ने इस मामले में अयोग्यता लागू मानी थी और सुप्रीम कोर्ट ने अब उस फैसले में हस्तक्षेप नहीं किया है।
आगे क्या होगा?
सुप्रीम कोर्ट के ताजा आदेश के बाद खैराताबाद विधानसभा सीट से जुड़ी अगली चुनावी प्रक्रिया महत्वपूर्ण होगी। हाईकोर्ट ने अपने आदेश में सीट को रिक्त घोषित करते हुए निर्वाचन क्षेत्र में नए चुनाव कराने का निर्देश भी दिया था। इस मामले ने एक बार फिर निर्वाचित प्रतिनिधियों के पार्टी बदलने, दलबदल विरोधी कानून और विधानसभा अध्यक्ष की भूमिका से जुड़े संवैधानिक सवालों को चर्चा के केंद्र में ला दिया है।
नागेंद्र की याचिका पर सुप्रीम कोर्ट का हस्तक्षेप न करना फिलहाल तेलंगाना हाईकोर्ट के अयोग्यता आदेश को कायम रखता है। मामले में अदालतों के सामने उठे सवाल अब दलबदल विरोधी कानून के अनुप्रयोग और निर्वाचित प्रतिनिधियों की राजनीतिक सदस्यता से जुड़े व्यापक कानूनी विमर्श का हिस्सा बन गए हैं।













