कांग्रेस सांसद पी. चिदंबरम ने बुधवार को लोकसभा की सीटों की संख्या को मौजूदा 543 पर स्थिर रखने की मांग की। उन्होंने कहा कि अगर सीटों की संख्या लगातार बढ़ाई गई तो सदन संसद के बजाय एक बड़ी सार्वजनिक सभा जैसा हो जाएगा।
नई दिल्ली: भारत में लोकसभा सीटों के संभावित परिसीमन को लेकर राजनीतिक बहस लगातार तेज होती जा रही है। कांग्रेस के वरिष्ठ नेता और राज्यसभा सांसद पी. चिदंबरम ने परिसीमन की मौजूदा चर्चा पर बड़ा बयान देते हुए कहा है कि लोकसभा की कुल सीटों को 543 पर स्थिर रखा जाना चाहिए। उनका तर्क है कि सीटों की संख्या में बड़ी बढ़ोतरी होने से लोकसभा की कार्यप्रणाली और प्रतिनिधित्व का स्वरूप प्रभावित हो सकता है।
चिदंबरम ने दक्षिण भारतीय राज्यों के प्रतिनिधित्व को लेकर भी चिंता जताई। उन्होंने कहा कि जिन राज्यों ने परिवार नियोजन कार्यक्रमों को प्रभावी तरीके से लागू किया है, उन्हें इसकी वजह से राजनीतिक प्रतिनिधित्व में नुकसान नहीं होना चाहिए। उनके मुताबिक, परिसीमन की प्रक्रिया में राज्यों के मौजूदा प्रतिनिधित्व को कम करने का सवाल ही नहीं उठना चाहिए।
लोकसभा सीटें बढ़ाने के पक्ष में नहीं चिदंबरम
कांग्रेस नेता ने परिसीमन विधेयक की जरूरत पर ही सवाल खड़ा किया। उन्होंने कहा कि लोकसभा की मौजूदा 543 सीटों को फ्रीज किया जाना चाहिए। चिदंबरम के अनुसार, अगर सीटों की संख्या बहुत अधिक बढ़ाई जाती है तो सदन की प्रकृति बदल सकती है और वह एक प्रभावी संसदीय सदन के बजाय बड़े सार्वजनिक जमावड़े जैसा नजर आने लगेगा।
उन्होंने चीन की संसद का उदाहरण देते हुए कहा कि भारत को ऐसा रास्ता नहीं अपनाना चाहिए, जिससे लोकसभा का आकार अत्यधिक बड़ा हो जाए।चिदंबरम ने तमिलनाडु के मौजूदा प्रतिनिधित्व का भी उल्लेख किया। उनके अनुसार लोकसभा में तमिलनाडु की हिस्सेदारी करीब 7.18 प्रतिशत है। उनका कहना है कि तमिलनाडु सहित अन्य दक्षिण भारतीय राज्यों के मौजूदा हिस्से को भी सुरक्षित रखा जाना चाहिए।
परिवार नियोजन को लेकर दक्षिणी राज्यों की चिंता
परिसीमन को लेकर दक्षिण भारतीय राज्यों की प्रमुख चिंता यह है कि जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण होने पर उन राज्यों का संसद में मौजूदा प्रभाव कम हो सकता है, जिन्होंने दशकों के दौरान जनसंख्या नियंत्रण में बेहतर प्रदर्शन किया है। चिदंबरम ने इसी मुद्दे को उठाते हुए कहा कि परिवार नियोजन को सफलतापूर्वक लागू करने वाले राज्यों को इसके लिए राजनीतिक तौर पर दंडित नहीं किया जाना चाहिए। उन्होंने मौजूदा प्रतिनिधित्व को सुरक्षित रखने की वकालत की।
परिसीमन की बहस इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि लोकसभा सीटों की सीमाओं और राज्यों के बीच सीटों के पुनर्वितरण का असर भविष्य के चुनावी समीकरणों पर पड़ सकता है।
परिसीमन विधेयक पर संसद में नहीं हुआ फैसला

संसद के मानसून सत्र के अंतिम चरण में परिसीमन को लेकर राजनीतिक बयानबाजी तेज रही। हालांकि, मौजूदा सत्र में परिसीमन विधेयक पेश नहीं किया गया। इसके बावजूद सत्ता पक्ष और विपक्ष के बीच इस विषय पर मतभेद सामने आते रहे। विपक्ष की मुख्य चिंता यह है कि जनसंख्या के आधार पर सीटों का पुनर्वितरण होने पर दक्षिणी राज्यों की लोकसभा में हिस्सेदारी अपेक्षाकृत घट सकती है। वहीं, परिसीमन के समर्थक पक्ष का तर्क है कि निर्वाचन क्षेत्रों का पुनर्निर्धारण लोकतांत्रिक प्रतिनिधित्व को मौजूदा जनसंख्या के अनुरूप बनाने के लिए जरूरी है।
झारखंड में छात्रों के प्रदर्शन पर भी बोले चिदंबरम
पी. चिदंबरम ने झारखंड में भर्ती परीक्षाओं को लेकर चल रहे छात्रों के विरोध प्रदर्शन पर भी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने विधानसभा घेराव मार्च के दौरान पुलिस की कार्रवाई की आलोचना करते हुए कहा कि छात्रों के खिलाफ बल प्रयोग उचित नहीं था। उन्होंने कहा कि राहुल गांधी सहित कांग्रेस के कई नेताओं ने पुलिस कार्रवाई की निंदा की है। चिदंबरम ने पुलिस और प्रशासन की कार्रवाई पर सवाल उठाते हुए इसे दुर्भाग्यपूर्ण बताया।
JPSC-JSSC परीक्षाओं को लेकर प्रदर्शन जारी
झारखंड में झारखंड लोक सेवा आयोग (JPSC) और झारखंड कर्मचारी चयन आयोग (JSSC) की भर्ती परीक्षाओं में कथित अनियमितताओं को लेकर छात्रों का विरोध भी जारी रहा। प्रदर्शनकारियों के अनुसार, अभ्यर्थियों को लंबे समय से परीक्षा प्रक्रिया और कथित अनियमितताओं से जुड़ी समस्याओं का सामना करना पड़ रहा है।
प्रदर्शन स्थल पर मौजूद छात्रों ने अपनी मांगों के साथ-साथ वहां लंबे समय से बैठे अभ्यर्थियों के स्वास्थ्य को लेकर भी चिंता जताई। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि आंदोलन लंबा खिंचने के कारण कई छात्रों की तबीयत प्रभावित हो रही है।













