High Court के न्यायमूर्ति Devnarayan Mishra की एकलपीठ ने पूर्व जज Giribala Singh को भोपाल कोर्ट से मिली अग्रिम जमानत निरस्त कर दी है। बुधवार को करीब पौने तीन घंटे चली बहस के बाद अदालत ने अपना फैसला सुरक्षित रख लिया था।
नई दिल्ली: मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने पूर्व न्यायाधीश गिरिबाला सिंह को बड़ा झटका देते हुए उनकी अग्रिम जमानत निरस्त कर दी है। यह फैसला गुरुवार देर रात, लगभग 1 बजे के बाद सार्वजनिक किया गया। मामला कथित दहेज प्रताड़ना और नवविवाहिता त्विषा शर्मा की संदिग्ध मौत से जुड़ा है, जिसने देशभर में कानूनी और सामाजिक बहस को तेज कर दिया है।
हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति देवनारायण मिश्रा की एकलपीठ ने भोपाल की निचली अदालत द्वारा 15 मई 2026 को दी गई अग्रिम जमानत को रद्द कर दिया। बुधवार को करीब पौने तीन घंटे तक चली विस्तृत सुनवाई के बाद अदालत ने आदेश सुरक्षित रख लिया था। कोर्ट ने उसी शाम संकेत दे दिया था कि विस्तृत आदेश बाद में जारी किया जाएगा।
क्या है पूरा मामला?
यह मामला भोपाल निवासी त्विषा शर्मा की मौत से जुड़ा है। त्विषा की शादी 9 दिसंबर 2025 को अधिवक्ता समर्थ सिंह से हुई थी, जो पूर्व जज गिरिबाला सिंह के बेटे हैं। 12 मई 2026 को त्विषा अपने घर में फांसी पर लटकी हुई पाई गई थीं। बाद में कटारा हिल्स पुलिस थाने में दहेज प्रताड़ना और संदिग्ध परिस्थितियों में मौत का मामला दर्ज किया गया।
मृतका के परिवार ने आरोप लगाया कि शादी के बाद से ही उसे मानसिक और भावनात्मक रूप से प्रताड़ित किया जा रहा था। परिवार के अनुसार, पति और ससुराल पक्ष उस पर लगातार दबाव बना रहे थे और उसके चरित्र तथा गर्भावस्था को लेकर संदेह व्यक्त करते थे।
कोर्ट में क्या दलीलें दी गईं?

सुनवाई के दौरान मृतका के पिता की ओर से व्हाट्सऐप चैट्स और अन्य डिजिटल सबूत अदालत के सामने पेश किए गए। इन चैट्स में कथित तौर पर प्रताड़ना, गर्भपात के लिए दबाव और मानसिक उत्पीड़न से जुड़ी बातें सामने आईं। अभियोजन पक्ष ने यह भी आरोप लगाया कि अग्रिम जमानत मिलने के बाद गिरिबाला सिंह ने प्रेस कॉन्फ्रेंस कर मृतका की छवि को नुकसान पहुंचाने की कोशिश की। अदालत को बताया गया कि यह व्यवहार जांच को प्रभावित करने वाला माना जा सकता है।
पोस्टमार्टम रिपोर्ट भी इस मामले में महत्वपूर्ण साबित हुई। मेडिकल रिपोर्ट के अनुसार, शरीर पर फांसी के अलावा छह अन्य चोटों के निशान पाए गए। एम्स की विशेषज्ञ रिपोर्ट में कहा गया कि ये चोटें शव को नीचे उतारने या अस्पताल ले जाने के दौरान नहीं लगी थीं।
हाई कोर्ट ने क्यों रद्द की जमानत?
सीबीआई और राज्य सरकार दोनों ने अदालत से कहा कि जांच अभी शुरुआती चरण में है और आरोपित से कस्टोडियल इंटरोगेशन यानी हिरासत में पूछताछ आवश्यक है। अदालत ने माना कि निचली अदालत ने उपलब्ध साक्ष्यों और गवाहों के बयानों पर पर्याप्त गंभीरता से विचार नहीं किया था। हाई कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि व्हाट्सऐप चैट्स, गवाहों के बयान और अन्य दस्तावेजों में गिरिबाला सिंह के खिलाफ स्पष्ट आरोप सामने आते हैं। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि जमानत मिलने के बाद आरोपित ने जांच में अपेक्षित सहयोग नहीं किया।
न्यायमूर्ति देवनारायण मिश्रा ने सुप्रीम कोर्ट के कई पूर्व फैसलों का हवाला देते हुए कहा कि यदि किसी जमानत आदेश में महत्वपूर्ण तथ्यों की अनदेखी की गई हो, तो उसे निरस्त किया जा सकता है।









