दलाई लामा उत्तराधिकार विवाद पर चीन का सख्त रुख, भारत को ‘दूर रहने’ की सलाह

चीन ने भारत से दलाई लामा के उत्तराधिकारी मामले में दखल न देने को कहा। बीजिंग ने इसे अपना आंतरिक मामला बताते हुए तिब्बत मुद्दे पर बाहरी हस्तक्षेप को खारिज किया।

चीन ने भारत को दलाई लामा के उत्तराधिकारी मामले से दूर रहने की सलाह दी है। बीजिंग ने कहा कि दलाई लामा का पुनर्जन्म और उत्तराधिकारी तय करने की प्रक्रिया पूरी तरह चीन का आंतरिक मामला है।

नई दिल्ली/बीजिंग: भारत और चीन के बीच तिब्बत तथा दलाई लामा से जुड़ा मुद्दा एक बार फिर चर्चा के केंद्र में आ गया है। चीन ने स्पष्ट शब्दों में कहा है कि दलाई लामा के उत्तराधिकारी का चयन पूरी तरह उसका आंतरिक मामला है और इसमें किसी भी बाहरी देश को दखल देने का अधिकार नहीं है। बीजिंग ने भारत को भी इस मामले से दूर रहने की सलाह दी है।

यह बयान ऐसे समय सामने आया है, जब तिब्बती निर्वासित प्रशासन और दलाई लामा के उत्तराधिकार को लेकर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर चर्चाएं तेज हो रही हैं। चीन ने यह भी दोहराया कि तिब्बत से जुड़ी गतिविधियों को समर्थन देना भारत-चीन संबंधों और क्षेत्रीय स्थिरता के लिए नुकसानदायक हो सकता है।

चीन ने दलाई लामा उत्तराधिकार को बताया आंतरिक मामला

भारत में चीनी दूतावास की प्रवक्ता यू जिंग ने आधिकारिक बयान जारी करते हुए कहा कि दलाई लामा के पुनर्जन्म और उत्तराधिकारी के चयन की प्रक्रिया सदियों पुरानी धार्मिक परंपराओं और ऐतिहासिक रीति-रिवाजों के आधार पर होती है।

उन्होंने कहा कि इस प्रक्रिया को अंतिम मान्यता चीन की केंद्रीय सरकार देती है और वर्तमान 14वें दलाई लामा को भी इसी आधिकारिक प्रक्रिया के तहत मान्यता मिली थी।

चीन का कहना है कि तिब्बती बौद्ध धर्म की परंपराओं को राजनीतिक रूप से इस्तेमाल नहीं किया जाना चाहिए। बीजिंग के अनुसार दलाई लामा के उत्तराधिकारी का फैसला केवल धार्मिक प्रक्रिया नहीं, बल्कि चीन की संप्रभुता और राष्ट्रीय एकता से भी जुड़ा विषय है।

भारत को तिब्बत मुद्दे पर पुराना रुख याद दिलाया

चीनी दूतावास ने अपने बयान में भारत को तिब्बत मुद्दे पर उसके पुराने आधिकारिक रुख की भी याद दिलाई। चीन ने कहा कि भारत को ऐसी गतिविधियों के लिए मंच उपलब्ध नहीं कराना चाहिए, जो तिब्बती स्वतंत्रता या अलगाववाद को बढ़ावा देती हों।

बीजिंग का मानना है कि तिब्बत चीन का अभिन्न हिस्सा है और इस मुद्दे पर किसी भी प्रकार की राजनीतिक गतिविधि दोनों देशों के रिश्तों को प्रभावित कर सकती है।

विशेषज्ञों के अनुसार चीन का यह बयान केवल धार्मिक मुद्दे तक सीमित नहीं है, बल्कि इसके पीछे भू-राजनीतिक और रणनीतिक चिंताएं भी हैं। भारत में बड़ी संख्या में तिब्बती शरणार्थियों की मौजूदगी और निर्वासित तिब्बती प्रशासन का संचालन चीन के लिए लंबे समय से संवेदनशील विषय रहा है।

सेंट्रल तिब्बतन एडमिनिस्ट्रेशन पर चीन का हमला

चीन ने सेंट्रल तिब्बतन एडमिनिस्ट्रेशन (CTA) को लेकर भी कड़ा रुख अपनाया। यू जिंग ने कहा कि CTA को दुनिया के किसी भी संप्रभु देश की आधिकारिक मान्यता प्राप्त नहीं है और उसके नेताओं को दलाई लामा के उत्तराधिकार से जुड़े मामलों में कोई दावा करने का अधिकार नहीं है।

उन्होंने यह भी कहा कि CTA के पास पूरे तिब्बती समुदाय का प्रतिनिधित्व करने की वैधता नहीं है। चीन का यह बयान ऐसे समय आया है, जब निर्वासित तिब्बती प्रशासन के नए राजनीतिक प्रमुख शपथ लेने की तैयारी कर रहे हैं।

राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि चीन आने वाले समय में तिब्बती नेतृत्व और दलाई लामा के उत्तराधिकार पर अपनी पकड़ मजबूत करना चाहता है।

दलाई लामा पहले भी कर चुके हैं चीन का विरोध

दलाई लामा कई बार सार्वजनिक रूप से कह चुके हैं कि उनके उत्तराधिकारी का फैसला चीन नहीं करेगा। उनका कहना है कि पुनर्जन्म की प्रक्रिया धार्मिक और आध्यात्मिक परंपराओं के अनुसार तय होगी।

तिब्बती बौद्ध मान्यता के मुताबिक किसी वरिष्ठ भिक्षु की मृत्यु के बाद उसकी आत्मा पुनर्जन्म लेती है और विशेष धार्मिक संकेतों के आधार पर नए दलाई लामा की पहचान की जाती है।

हालांकि चीन इस प्रक्रिया पर सरकारी नियंत्रण चाहता है। बीजिंग का दावा है कि दलाई लामा के उत्तराधिकारी की मान्यता के लिए चीन सरकार की स्वीकृति आवश्यक है। यही कारण है कि भविष्य में दलाई लामा उत्तराधिकार को लेकर बड़ा विवाद खड़ा होने की आशंका जताई जा रही है।

वर्तमान दलाई लामा की पहचान कैसे हुई थी

वर्तमान 14वें दलाई लामा का जन्म 1935 में चीन के उत्तर-पश्चिमी क्षेत्र के ताक्तेसर गांव में हुआ था। बताया जाता है कि जब वे केवल दो वर्ष के थे, तब बौद्ध साधुओं के एक दल ने उन्हें 13वें दलाई लामा का पुनर्जन्म माना।

यह दल अपने साथ 13वें दलाई लामा की कुछ निजी वस्तुएं लेकर गया था। इनमें चश्मा, घंटी और छड़ी जैसी चीजें शामिल थीं। जब इन वस्तुओं को बच्चे के सामने रखा गया, तो उसने सही वस्तुओं की पहचान करते हुए उन्हें अपना बताया।

इसके बाद साधुओं को विश्वास हो गया कि यही 13वें दलाई लामा का पुनर्जन्म हैं। बाद में उन्हें औपचारिक रूप से दलाई लामा घोषित किया गया और कम उम्र में ही धार्मिक शिक्षा शुरू कर दी गई।

1950 में चीन द्वारा तिब्बत में सैन्य कार्रवाई के बाद उन्होंने पूर्ण राजनीतिक और धार्मिक अधिकारों के साथ नेतृत्व संभाला।

चीन से भारत तक का निर्वासन

1949 में चीन में कम्युनिस्ट शासन आने के बाद तिब्बत पर दबाव बढ़ने लगा। 1950 में चीनी सेना तिब्बत में दाखिल हुई और धीरे-धीरे उसने पूरे क्षेत्र पर नियंत्रण स्थापित कर लिया।

हालांकि शुरुआत में चीन ने तिब्बत की सांस्कृतिक और धार्मिक स्वतंत्रता बनाए रखने का आश्वासन दिया था, लेकिन अगले कुछ वर्षों में हालात लगातार बिगड़ते गए।

दलाई लामा की आत्मकथा के अनुसार मार्च 1959 में चीनी सेना उनके महल तक पहुंच गई थी। इसके बाद उन्होंने सैनिक के वेश में तिब्बत छोड़ने का फैसला किया।

करीब दो सप्ताह तक वे अलग-अलग गांवों और मठों में छिपते हुए आगे बढ़ते रहे। अंततः 31 मार्च 1959 को वे अपने परिवार और समर्थकों के साथ भारत पहुंचे।

भारत ने दिया शरण, चीन नाराज हुआ

भारत सरकार ने 2 अप्रैल 1959 को दलाई लामा का आधिकारिक स्वागत किया और तत्कालीन प्रधानमंत्री जवाहरलाल नेहरू ने उन्हें राजनीतिक शरण देने की घोषणा की।

हालांकि उस समय यह फैसला आसान नहीं था, क्योंकि इससे भारत-चीन संबंधों पर असर पड़ने की आशंका थी। कई राजनीतिक विश्लेषकों और नेताओं ने उस समय नेहरू सरकार के इस फैसले की आलोचना भी की थी।

शुरुआत में दलाई लामा को असम के तेजपुर में ठहराया गया। बाद में वे मसूरी गए और अंततः 1960 में हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में बस गए। आज धर्मशाला तिब्बती निर्वासित प्रशासन और तिब्बती समुदाय का प्रमुख केंद्र माना जाता है।

भारत-चीन संबंधों पर फिर बढ़ सकता है तनाव

विशेषज्ञों का मानना है कि दलाई लामा का उत्तराधिकार आने वाले वर्षों में भारत और चीन के बीच एक बड़ा कूटनीतिक मुद्दा बन सकता है। चीन चाहता है कि भविष्य का दलाई लामा उसकी मंजूरी से चुना जाए, जबकि तिब्बती समुदाय धार्मिक स्वतंत्रता की बात करता है।

भारत अब तक इस मुद्दे पर संतुलित रुख अपनाता रहा है, लेकिन चीन की हालिया टिप्पणी से संकेत मिलते हैं कि बीजिंग इस विषय को बेहद संवेदनशील मानता है।

दुनियाभर के रणनीतिक विशेषज्ञों के अनुसार दलाई लामा का उत्तराधिकार केवल धार्मिक मामला नहीं, बल्कि एशियाई भू-राजनीति, मानवाधिकार और भारत-चीन संबंधों से जुड़ा बड़ा अंतरराष्ट्रीय विषय बन चुका है।

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