El Niño Effect: 1,000 साल पुराने कोरल रिकॉर्ड ने बढ़ाई चिंता, शक्तिशाली अल नीनो से भारत समेत दुनिया पर मंडरा सकता है खतरा

El Nino का बढ़ता असर समुद्र और जलवायु के लिए बड़ी चिंता बन रहा है। 1,000 साल के रिकॉर्ड में असामान्य बदलाव और मूंगों के सफेद पड़ने से भारत पर भी खतरा बढ़ा है।

समुद्र के भीतर नजर आने वाली रंग-बिरंगी पत्थरों जैसी संरचनाएं दरअसल प्रवाल भित्तियां यानी कोरल रीफ होती हैं। ये समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र का बेहद अहम हिस्सा हैं और हजारों समुद्री जीवों को रहने और भोजन का आधार प्रदान करती हैं।

नई दिल्ली: दुनिया भर में बढ़ते तापमान और बदलते मौसम पैटर्न के बीच अल नीनो (El Niño) को लेकर वैज्ञानिकों की चिंता लगातार बढ़ रही है। खासतौर पर समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र पर इसके संभावित प्रभाव को गंभीर माना जा रहा है। एक हजार साल पुराने कोरल रिकॉर्ड और प्रशांत महासागर के तापमान से जुड़े अध्ययनों से संकेत मिले हैं कि शक्तिशाली अल नीनो घटनाएं पिछले कुछ दशकों में अधिक बार देखने को मिली हैं।

वैज्ञानिकों का मानना है कि मानव गतिविधियों से बढ़ रही ग्लोबल वार्मिंग समुद्र के सामान्य तापमान को पहले ही ऊंचा कर चुकी है। ऐसे में यदि एक मजबूत अल नीनो विकसित होता है, तो समुद्री गर्मी और बढ़ सकती है। इसका सबसे बड़ा असर दुनिया की नाजुक कोरल रीफ यानी मूंगा चट्टानों पर पड़ने की आशंका है।

अल नीनो क्या है और यह क्यों महत्वपूर्ण है?

अल नीनो, एल नीनो-दक्षिणी दोलन (ENSO) नामक प्राकृतिक जलवायु प्रणाली का गर्म चरण है। इस दौरान मध्य और पूर्वी उष्णकटिबंधीय प्रशांत महासागर का सतही जल सामान्य से अधिक गर्म हो जाता है। इसका प्रभाव केवल प्रशांत महासागर तक सीमित नहीं रहता। अल नीनो दुनिया के कई हिस्सों में वर्षा, तापमान, सूखा और बाढ़ के पैटर्न को प्रभावित कर सकता है। 

दक्षिण एशिया और भारत जैसे क्षेत्रों के लिए इसका संबंध मानसून से भी महत्वपूर्ण माना जाता है। हालांकि हर अल नीनो का प्रभाव समान नहीं होता और इसके परिणाम क्षेत्र तथा उसकी तीव्रता के अनुसार अलग-अलग हो सकते हैं।

समुद्र की गर्मी से सफेद पड़ जाते हैं कोरल

कोरल रीफ समुद्री जैव विविधता के सबसे महत्वपूर्ण इकोसिस्टम में शामिल हैं। कोरल सूक्ष्म शैवाल के साथ सहजीवी संबंध में रहते हैं, जिनसे उन्हें ऊर्जा और पोषण मिलता है। जब समुद्र का तापमान लंबे समय तक असामान्य रूप से अधिक रहता है, तो कोरल इन शैवालों को बाहर निकाल सकते हैं। इससे उनका रंग खत्म होने लगता है और वे सफेद दिखाई देने लगते हैं। इस प्रक्रिया को कोरल ब्लीचिंग कहा जाता है।

ब्लीचिंग का अर्थ यह नहीं है कि कोरल तुरंत मर गया है। यदि तापमान सामान्य हो जाए तो कुछ कोरल रिकवर कर सकते हैं। लेकिन अत्यधिक या लंबे समय तक बने रहने वाले गर्मी के तनाव से उनकी मृत्यु हो सकती है। लगातार होने वाली ब्लीचिंग घटनाएं उनकी पुनर्जीवित होने की क्षमता को भी कमजोर करती हैं।

El Niño Effect: 1,000 साल पुराने कोरल रिकॉर्ड ने बढ़ाई चिंता, शक्तिशाली अल नीनो से भारत समेत दुनिया पर मंडरा सकता है खतरा

1,000 साल पुराने कोरल रिकॉर्ड से मिले अहम संकेत

पैलियोक्लाइमेट वैज्ञानिक पुराने कोरल के ढांचों का अध्ययन करके हजारों साल पुराने समुद्री तापमान और जलवायु पैटर्न को समझते हैं। कोरल की परतों में दर्ज रासायनिक बदलाव महीने-दर-महीने समुद्री परिस्थितियों की जानकारी दे सकते हैं। पूर्वी प्रशांत क्षेत्र और गैलापागोस द्वीप समूह के कोरल रिकॉर्ड के अध्ययन से वैज्ञानिकों को ENSO और शक्तिशाली अल नीनो घटनाओं के ऐतिहासिक पैटर्न को समझने में मदद मिली है।

मिशिगन यूनिवर्सिटी की पैलियोक्लाइमेटोलॉजिस्ट जूलिया कोल और अन्य वैज्ञानिकों के शोध ने इस बहस को मजबूत किया है कि जलवायु परिवर्तन शक्तिशाली अल नीनो घटनाओं के पैटर्न को प्रभावित कर सकता है। हालांकि वैज्ञानिक यह भी स्पष्ट करते हैं कि ENSO प्रणाली बेहद जटिल है और भविष्य में हर घटना की सटीक तीव्रता का अनुमान लगाना आसान नहीं है।

2024 की ग्लोबल कोरल ब्लीचिंग बनी बड़ी चेतावनी

हाल के वर्षों में समुद्रों में असाधारण गर्मी के कारण बड़े पैमाने पर कोरल ब्लीचिंग दर्ज की गई। 2023 से शुरू हुई और 2024 में गंभीर हुई वैश्विक ब्लीचिंग की घटनाओं ने वैज्ञानिकों को चिंतित किया। विशेषज्ञों के अनुसार, जो कोरल रीफ पहले ही गर्मी के लगातार झटके झेल चुकी हैं, वे भविष्य में समुद्री तापमान बढ़ने पर अधिक संवेदनशील हो सकती हैं। उन्हें दोबारा स्वस्थ होने के लिए पर्याप्त समय नहीं मिल पाता।

भारत के लिए क्यों अहम है अल नीनो?

भारत के लिए अल नीनो की गतिविधियां विशेष महत्व रखती हैं, क्योंकि प्रशांत महासागर में बदलाव भारतीय मानसून के पैटर्न को प्रभावित कर सकते हैं। कई अल नीनो वर्षों में मानसून कमजोर रहने की संभावना देखी गई है, हालांकि हर बार ऐसा होना जरूरी नहीं है। यदि मानसून कमजोर पड़ता है तो इसका असर कृषि, जल संसाधनों और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर पड़ सकता है। धान, मक्का और अन्य खरीफ फसलों के साथ-साथ जल उपलब्धता पर भी प्रभाव पड़ने की आशंका रहती है।

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