Form 6: दिल्ली की मतदाता सूची में गड़बड़ी पर 28 अक्टूबर को सुनवाई, सुप्रीम कोर्ट ने मतदाताओं को दिया भरोसा

Form 6 News: दिल्ली की मतदाता सूची में कथित गड़बड़ी को लेकर सुप्रीम कोर्ट 28 अक्टूबर को सुनवाई करेगा। कोर्ट ने मतदाताओं को भरोसा दिलाया। जानें वोटर लिस्ट विवाद

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को उन मतदाताओं को भरोसा दिलाया, जिन्होंने दिल्ली की मतदाता सूची से अपने नाम गलत तरीके से हटाए जाने की शिकायत की है। अदालत ने कहा कि वह 28 अक्टूबर को इस समस्या पर विचार करेगी।

Supreme Court on Form 6: दिल्ली की मतदाता सूची से कथित तौर पर गलत तरीके से हटाए गए मतदाताओं के नाम दोबारा जोड़ने के मामले में सुप्रीम कोर्ट ने राहत की उम्मीद जगाई है। अदालत ने संकेत दिया है कि वह इस समस्या को दूर करने के लिए उचित आदेश पारित करने पर विचार कर रही है। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने मामले में जल्द सुनवाई की मांग पर विचार करते हुए 28 अक्टूबर को इस मुद्दे पर सुनवाई करने पर सहमति जताई। विवाद का मुख्य कारण यह है कि हटाए गए नामों को दोबारा जुड़वाने के लिए मतदाताओं से फॉर्म 6 भरने को कहा जा रहा है, जिसमें पहली बार मतदाता सूची में नाम दर्ज कराने की घोषणा करनी होती है।

फॉर्म 6 को लेकर क्या है विवाद?

यह मामला दिल्ली में मतदाता सूची के विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के दौरान सामने आई कथित गड़बड़ियों से जुड़ा है। याचिकाकर्ताओं का कहना है कि जिन लोगों के नाम पहले से मतदाता सूची में शामिल थे, लेकिन बाद में मसौदा सूची से हटा दिए गए, उन्हें दोबारा नाम दर्ज कराने के लिए फॉर्म 6 भरने की प्रक्रिया अपनानी पड़ रही है।

इस फॉर्म में आवेदक को यह घोषित करना होता है कि वह पहली बार मतदाता सूची में अपना नाम शामिल कराने के लिए आवेदन कर रहा है। याचिकाकर्ताओं के मुताबिक, पहले से पंजीकृत मतदाताओं के लिए यह घोषणा तथ्यात्मक रूप से सही नहीं होगी। इसी समस्या को लेकर आरटीआई कार्यकर्ता अंजलि भारद्वाज ने सुप्रीम कोर्ट में याचिका दायर की है। उनकी ओर से वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने अदालत से मामले पर तत्काल सुनवाई करने का आग्रह किया।

सुप्रीम कोर्ट ने क्या कहा?

सुनवाई के दौरान मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और न्यायमूर्ति जॉयमाल्य बागची की पीठ ने संकेत दिया कि अदालत मतदाता सूची से जुड़े इस प्रक्रियागत विवाद को सुलझाने के लिए आदेश पारित करने पर विचार कर रही है। प्रशांत भूषण ने मामले की तात्कालिकता बताते हुए कहा कि चुनाव आयोग ने मसौदा मतदाता सूची में दावे और आपत्तियां दाखिल करने की अंतिम तारीख 30 अक्टूबर निर्धारित की है। ऐसे में प्रभावित मतदाताओं को समय रहते उचित प्रक्रिया उपलब्ध कराना जरूरी है।

याचिका में उठाए गए सवालों का संबंध उन नागरिकों के अधिकारों से है, जिनके नाम पहले मतदाता सूची में दर्ज थे, लेकिन अब उन्हें दोबारा पंजीकरण की प्रक्रिया से गुजरना पड़ सकता है। अदालत के समक्ष यह मुद्दा है कि ऐसे मतदाताओं के नाम बहाल करने के लिए उपयुक्त और तथ्यात्मक रूप से सही प्रक्रिया क्या होनी चाहिए।

दिल्ली की ड्राफ्ट वोटर लिस्ट में कितने नाम हटाए गए?

31 अगस्त को प्रकाशित मसौदा मतदाता सूची के आंकड़ों के अनुसार, विशेष गहन पुनरीक्षण शुरू होने से पहले दिल्ली की मतदाता सूची में कुल 1,45,10,299 मतदाता दर्ज थे। इनमें से 97,53,577 मतदाताओं के विवरण संबंधी फॉर्म जमा किए गए थे। वहीं, 47,56,722 मतदाताओं के नाम मसौदा सूची से हटा दिए गए। इन लोगों को अनुपस्थित, स्थायी रूप से स्थानांतरित, मृत या एक से अधिक स्थानों पर पंजीकृत होने जैसी श्रेणियों में रखा गया था।

उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक, हटाए गए मतदाताओं में लगभग 32 लाख लोगों को स्थायी रूप से स्थानांतरित माना गया। हालांकि, याचिका में उठाई गई आपत्ति विशेष रूप से उन लोगों के लिए उचित प्रक्रिया सुनिश्चित करने से संबंधित है, जो दावा करते हैं कि उनके नाम गलत तरीके से हटाए गए हैं।

फॉर्म 8 के इस्तेमाल का भी सुझाव

प्रशांत भूषण ने अदालत के सामने एक वैकल्पिक रास्ता भी सुझाया। उन्होंने कहा कि चुनाव आयोग को ऐसे मौजूदा मतदाताओं को फॉर्म 8 के माध्यम से आवेदन करने की अनुमति देने का निर्देश दिया जा सकता है, ताकि उनके नाम दोबारा मतदाता सूची में शामिल किए जा सकें। इसके अलावा, आयोग को कोई दूसरी उपयुक्त प्रक्रिया अपनाने का निर्देश देने का विकल्प भी रखा गया। 

याचिकाकर्ताओं का तर्क है कि पहले से पंजीकृत मतदाताओं को नए मतदाता के रूप में आवेदन करने के लिए बाध्य नहीं किया जाना चाहिए, खासकर तब जब वे अपने नाम हटाए जाने को गलत बता रहे हों। यह विवाद चुनावी प्रक्रिया में सही मतदाता पहचान, रिकॉर्ड की सटीकता और पात्र नागरिकों की भागीदारी सुनिश्चित करने के महत्व को भी रेखांकित करता है।

30 अक्टूबर की समय-सीमा क्यों है अहम?

चुनाव आयोग ने दावे और आपत्तियां दाखिल करने की अंतिम तारीख 30 सितंबर से बढ़ाकर 30 अक्टूबर कर दी थी। ऐसे में अदालत का संभावित आदेश प्रभावित मतदाताओं के लिए महत्वपूर्ण हो सकता है, क्योंकि समय-सीमा समाप्त होने से पहले उन्हें अपने नाम दोबारा जुड़वाने के लिए स्पष्ट प्रक्रिया की जरूरत है।

अब इस मामले में सुप्रीम कोर्ट की सुनवाई और उसके बाद जारी होने वाले निर्देशों पर नजर रहेगी। अदालत का अंतिम फैसला यह स्पष्ट कर सकता है कि कथित रूप से गलत तरीके से हटाए गए नामों को बहाल करने के लिए कौन-सा तरीका अपनाया जाए।

Leave a comment