रूस की ओर से मध्यस्थ बने पूर्व CJI डीवाई चंद्रचूड़, यूक्रेन के सरकारी बैंक से जुड़े निवेश विवाद की सुनवाई करेंगे

पूर्व CJI डीवाई चंद्रचूड़ रूस की ओर से ओश्चादबैंक निवेश विवाद में मध्यस्थ बने है। यूक्रेन के सरकारी बैंक ने रूस से कई सौ मिलियन डॉलर के मुआवजे का दावा किया है

पूर्व CJI डीवाई चंद्रचूड़ को रूस की ओर से यूक्रेन के सरकारी बैंक ओश्चादबैंक से जुड़े निवेश विवाद में मध्यस्थ नियुक्त किया गया है। तीन सदस्यीय ट्रिब्यूनल रूस-यूक्रेन निवेश समझौते के तहत बैंक के कई सौ मिलियन डॉलर के दावे पर सुनवाई करेगा।

नई दिल्ली: भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ को रूस की ओर से यूक्रेन के सरकारी बैंक ओश्चादबैंक से जुड़े एक अंतरराष्ट्रीय निवेश विवाद में मध्यस्थ नियुक्त किया गया है। यह मामला रूस और यूक्रेन के बीच हुए द्विपक्षीय निवेश समझौते के तहत अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता की प्रक्रिया में पहुंचा है। उपलब्ध रिपोर्टों के मुताबिक, यूक्रेन का सरकारी बैंक ओश्चादबैंक रूस पर आरोप लगा रहा है कि 2022 में यूक्रेन पर रूसी हमले के बाद उसे कई क्षेत्रों में अपनी बैंकिंग और कारोबारी संपत्तियों से हाथ धोना पड़ा। बैंक ने इस नुकसान के लिए रूस से कई सौ मिलियन डॉलर के मुआवजे का दावा किया है। इस मामले में तीन सदस्यीय ट्रिब्यूनल गठित किया गया है। रूस की ओर से पूर्व CJI डीवाई चंद्रचूड़ को मध्यस्थ बनाया गया है, जबकि ओश्चादबैंक की तरफ से अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता विशेषज्ञ स्टावरोस ब्रेकूलाकिस को नियुक्त किया गया है। दोनों पक्षों की सहमति से डायला जिमेनेज को ट्रिब्यूनल की अध्यक्ष बनाया गया है।

क्या है ओश्चादबैंक का दावा?

ओश्चादबैंक का कहना है कि रूस के यूक्रेन पर हमले और उसके बाद कुछ क्षेत्रों पर रूसी नियंत्रण के कारण बैंक को अपनी कई संपत्तियों और कारोबारी गतिविधियों का नुकसान उठाना पड़ा। बैंक के अनुसार, दोनेत्स्क, लुहांस्क, खेरसॉन और जापोरिज्जिया क्षेत्रों में उसकी शाखाएं, एटीएम, कार्यालय, जमीन और अन्य कारोबारी संसाधन मौजूद थे। इन क्षेत्रों में बदली परिस्थितियों के कारण बैंक इन संपत्तियों का सामान्य रूप से इस्तेमाल नहीं कर सका।

बैंक का दावा है कि उसकी संपत्तियों और कारोबार को हुए नुकसान से उसे भारी आर्थिक क्षति हुई। इसी आधार पर उसने रूस से कई सौ मिलियन डॉलर के मुआवजे की मांग की है। रूस की ओर से इन दावों पर अंतिम कानूनी स्थिति और ट्रिब्यूनल का फैसला अभी सामने नहीं आया है। इसलिए नुकसान और जिम्मेदारी से जुड़े आरोपों का अंतिम निर्धारण मध्यस्थता प्रक्रिया में होना बाकी है।

जुलाई 2025 में भेजा गया था विवाद का नोटिस

ओश्चादबैंक ने जुलाई 2025 में रूस को विवाद से संबंधित औपचारिक नोटिस भेजा था। बैंक के मुताबिक, रूस की ओर से अपेक्षित प्रतिक्रिया नहीं मिलने के बाद उसने अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता की प्रक्रिया शुरू करने का फैसला किया।

अब इस विवाद की सुनवाई तीन सदस्यीय अंतरराष्ट्रीय ट्रिब्यूनल करेगा। ट्रिब्यूनल दोनों पक्षों की दलीलों, दस्तावेजों और दावों की समीक्षा के बाद मामले पर निर्णय की दिशा में आगे बढ़ेगा। ऐसे मामलों में मध्यस्थों की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण होती है, क्योंकि उन्हें दोनों पक्षों द्वारा पेश किए गए कानूनी और आर्थिक दावों का मूल्यांकन करना होता है।

तीन सदस्यीय ट्रिब्यूनल में कौन-कौन?

इस मामले में तीन सदस्यीय ट्रिब्यूनल बनाया गया है। रूस की ओर से भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश डीवाई चंद्रचूड़ को मध्यस्थ नियुक्त किया गया है। ओश्चादबैंक की ओर से ग्रीस के प्रसिद्ध अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता विशेषज्ञ स्टावरोस ब्रेकूलाकिस को चुना गया है। ट्रिब्यूनल की अध्यक्षता डायला जिमेनेज करेंगी, जो कोस्टारिका की पूर्व व्यापार मंत्री रह चुकी हैं। उन्हें दोनों पक्षों की सहमति से अध्यक्ष चुना गया है। तीनों की नियुक्ति के बाद अब विवाद की औपचारिक मध्यस्थता प्रक्रिया आगे बढ़ेगी।

डीवाई चंद्रचूड़ के लिए अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता में नई भूमिका

डीवाई चंद्रचूड़ भारत के 50वें मुख्य न्यायाधीश रहे हैं। सुप्रीम कोर्ट से सेवानिवृत्ति के बाद अंतरराष्ट्रीय कानूनी और मध्यस्थता से जुड़े मामलों में उनकी विशेषज्ञता को लेकर भी रुचि रही है। इससे पहले भी रूस ने कथित तौर पर दो अलग-अलग अंतरराष्ट्रीय निवेश विवादों में चंद्रचूड़ को अपनी ओर से मध्यस्थ बनाने की कोशिश की थी। हालांकि, उन दोनों मामलों में उन्होंने यह जिम्मेदारी स्वीकार नहीं की थी।

इनमें से एक मामला जर्मनी की ऊर्जा कंपनी विंटरशाल डीया से संबंधित था। कंपनी का आरोप था कि यूक्रेन युद्ध के बाद रूस में मौजूद उसके तेल और गैस से जुड़े कारोबारी हितों को नुकसान पहुंचा या उन पर नियंत्रण बदल गया। दूसरा विवाद यूक्रेन की सरकारी बिजली ट्रांसमिशन कंपनी उक्रएनरगो से संबंधित बताया गया था। इसमें रूस के नियंत्रण वाले क्षेत्रों में बिजली से जुड़ी संपत्तियों को नुकसान पहुंचने या उन पर कब्जे का आरोप लगाया गया था। इन मामलों का अंतिम परिणाम उपलब्ध जानकारी के अनुसार अभी सामने नहीं आया है।

अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता क्या होती है?

अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता एक ऐसी कानूनी प्रक्रिया है, जिसमें दो देशों, कंपनियों या विदेशी निवेशकों के बीच व्यापार और निवेश से जुड़े विवादों को अदालत के बजाय एक स्वतंत्र ट्रिब्यूनल के सामने रखा जाता है। इस प्रक्रिया में आम तौर पर पक्षकार अपनी सहमति से मध्यस्थ नियुक्त करते हैं। मध्यस्थ संबंधित पक्षों की दलीलें, अनुबंध, निवेश से जुड़े दस्तावेज और अन्य सबूतों की समीक्षा करते हैं। इसके बाद ट्रिब्यूनल मामले पर अपना निर्णय देता है। यह व्यवस्था खास तौर पर उन मामलों में महत्वपूर्ण होती है, जिनमें किसी विदेशी निवेशक को किसी देश की नीतियों, कार्रवाई या परिस्थितियों के कारण आर्थिक नुकसान होने का दावा होता है।

अदालत और मध्यस्थता में क्या अंतर है?

सामान्य अदालतों में न्यायाधीशों की नियुक्ति संबंधित न्यायिक व्यवस्था के तहत होती है, जबकि अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता में विवाद के पक्षकार अक्सर मध्यस्थों के चयन में भूमिका निभाते हैं। मध्यस्थता की कार्यवाही कई मामलों में अदालत की सार्वजनिक सुनवाई की तुलना में अधिक निजी होती है। इसके अलावा, अंतरराष्ट्रीय निवेश विवादों के लिए विशेष कानूनी प्रावधान और द्विपक्षीय निवेश समझौते आधार बन सकते हैं। इस तरह की प्रक्रिया का उद्देश्य अंतरराष्ट्रीय निवेशकों और देशों के बीच उत्पन्न बड़े आर्थिक विवादों के लिए एक निर्धारित कानूनी मंच उपलब्ध कराना है।

भारत से जुड़े केयर्न और वोडाफोन विवाद भी रहे चर्चित

भारत में भी अंतरराष्ट्रीय निवेश मध्यस्थता के कुछ मामले काफी चर्चित रहे हैं। इनमें केयर्न एनर्जी और भारत सरकार के बीच कर विवाद प्रमुख रहा। केयर्न एनर्जी ने भारत में एक कारोबारी पुनर्गठन से जुड़े मामले के बाद लगाए गए कर दावे को चुनौती दी थी। विवाद अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता तक पहुंचा और 2020 में ट्रिब्यूनल ने कंपनी के पक्ष में फैसला सुनाते हुए भारत को बड़ी रकम लौटाने का आदेश दिया था। इसके बाद भारत सरकार ने 2021 में पूर्वव्यापी कर व्यवस्था से संबंधित विवादित प्रावधानों को वापस लेने की दिशा में कदम उठाया और मामला समाप्त करने की प्रक्रिया आगे बढ़ी।

वोडाफोन मामला भी पहुंचा था अंतरराष्ट्रीय ट्रिब्यूनल

वोडाफोन और भारत सरकार के बीच टैक्स विवाद भी अंतरराष्ट्रीय मध्यस्थता तक पहुंचा था। मामला 2007 में वोडाफोन द्वारा भारत में एक कंपनी के अधिग्रहण से जुड़े कर विवाद से संबंधित था। बाद में भारत सरकार ने इस लेनदेन पर कर दायित्व का दावा किया, जिसे वोडाफोन ने चुनौती दी। अंतरराष्ट्रीय ट्रिब्यूनल ने 2020 में फैसला वोडाफोन के पक्ष में दिया था। इसके बाद भारत सरकार ने पूर्वव्यापी कर प्रावधान को हटाने की दिशा में कदम उठाया और विवाद को समाप्त करने की प्रक्रिया आगे बढ़ी।

रूस-यूक्रेन विवाद में क्यों महत्वपूर्ण है मामला?

ओश्चादबैंक का मामला रूस-यूक्रेन संघर्ष के आर्थिक प्रभावों से जुड़े अंतरराष्ट्रीय निवेश विवादों की व्यापक श्रृंखला का हिस्सा है। युद्ध के कारण संपत्तियों, कारोबार और निवेश को हुए नुकसान को लेकर कई कंपनियों और संस्थानों ने कानूनी रास्ते अपनाए हैं। ऐसे मामलों में ट्रिब्यूनल को यह तय करना होता है कि संबंधित निवेश समझौते के तहत दावेदार को संरक्षण प्राप्त है या नहीं और कथित नुकसान के लिए प्रतिपूर्ति का कानूनी आधार बनता है या नहीं।

ओश्चादबैंक के मामले में भी अब तीन सदस्यीय ट्रिब्यूनल दोनों पक्षों के दावों और जवाबों की जांच करेगा। पूर्व CJI डीवाई चंद्रचूड़ की रूस की ओर से मध्यस्थ के रूप में नियुक्ति इस मामले को भारत के कानूनी क्षेत्र के लिए भी खास बनाती है।

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