गंगा किनारे बसे इस दुर्गा मंदिर की पहचान उसकी ऊंचाई, मां की प्रतिमा की परंपरा और दशकों से चली आ रही आस्था से जुड़ी है। यहां मां के दर्शन के लिए श्रद्धालु जुटते हैं, वहीं विसर्जन यात्रा भी खास आकर्षण रहती है। करीब दो किलोमीटर की दूरी तय करने में 12 घंटे लगने की बात इस आयोजन की भव्यता और इससे जुड़ी परंपरा को दर्शाती है।
दुर्गा पूजा के दौरान देश के अलग-अलग हिस्सों में मां दुर्गा की भव्य प्रतिमाएं स्थापित की जाती हैं, लेकिन कुछ स्थान ऐसे हैं जहां पूजा केवल कुछ दिनों का आयोजन नहीं, बल्कि पीढ़ियों से चली आ रही परंपरा का हिस्सा है। गंगा किनारे स्थित इस दुर्गा मंदिर को लेकर भी श्रद्धालुओं में खास आस्था है। यहां मां के एक जैसे स्वरूप में विराजमान रहने की परंपरा करीब 90 वर्षों से जुड़ी बताई जाती है। मंदिर की पहचान उसकी ऊंचाई और मां की प्रतिमा के साथ-साथ उस विसर्जन यात्रा से भी है, जिसमें श्रद्धालु बड़ी संख्या में शामिल होते हैं।
स्थानीय धार्मिक परंपराओं में मां दुर्गा की प्रतिमा का स्वरूप विशेष महत्व रखता है। प्रतिमा के दर्शन करने के लिए पूजा के दिनों में श्रद्धालु मंदिर पहुंचते हैं और मां से सुख, शांति, समृद्धि तथा परिवार की खुशहाली की कामना करते हैं। कई परिवारों के लिए यहां दर्शन करना वर्षों पुरानी परंपरा का हिस्सा है। नई पीढ़ी भी अपने बुजुर्गों के साथ मंदिर पहुंचकर पूजा-अर्चना करती है, जिससे धार्मिक आस्था के साथ स्थानीय संस्कृति की निरंतरता बनी रहती है।
इस मंदिर से जुड़ी सबसे उल्लेखनीय बात प्रतिमा विसर्जन की यात्रा है। बताया जाता है कि विसर्जन के दौरान करीब दो किलोमीटर की दूरी तय करने में लगभग 12 घंटे लग जाते हैं। इतनी कम दूरी तय करने में लंबा समय लगने के पीछे जुलूस की परंपरा, रास्ते में होने वाली धार्मिक रस्में, पूजा-अर्चना और श्रद्धालुओं की भागीदारी जैसे पहलू अहम हो सकते हैं। विसर्जन यात्रा के दौरान भक्त मां के जयकारे लगाते हुए आगे बढ़ते हैं और पूरे वातावरण में भक्ति का माहौल बना रहता है।
दुर्गा पूजा और विसर्जन की परंपराएं केवल धार्मिक आयोजन नहीं हैं, बल्कि स्थानीय समाज को जोड़ने का माध्यम भी हैं। आयोजन की तैयारी में पूजा समिति के सदस्यों, स्थानीय लोगों और श्रद्धालुओं की भागीदारी रहती है। प्रतिमा की पूजा से लेकर विसर्जन तक विभिन्न रस्में निभाई जाती हैं। इसी वजह से इस तरह के आयोजन स्थानीय पहचान और सांस्कृतिक विरासत का महत्वपूर्ण हिस्सा बन जाते हैं।
गंगा के किनारे स्थित होने के कारण मंदिर और उससे जुड़ी धार्मिक गतिविधियों का नदी के साथ भी सांस्कृतिक संबंध दिखाई देता है। हालांकि, गंगा की स्वच्छता और नदी में प्रदूषण रोकने के लिए प्रतिमा विसर्जन से संबंधित प्रशासनिक निर्देशों का पालन करना जरूरी है। स्थानीय प्रशासन की ओर से निर्धारित व्यवस्था के अनुसार ही विसर्जन किया जाना चाहिए, ताकि श्रद्धालुओं की आस्था के साथ नदी के पर्यावरण की सुरक्षा भी सुनिश्चित हो सके।
करीब नौ दशक से एक जैसे स्वरूप में मां की पूजा किए जाने की परंपरा और लंबी विसर्जन यात्रा इस मंदिर को खास पहचान देती है। श्रद्धालुओं के लिए मां के दर्शन आस्था का विषय हैं, जबकि स्थानीय लोगों के लिए यह परंपरा उनके इतिहास और सामुदायिक जीवन से जुड़ी हुई है। ऐसे धार्मिक स्थल यह भी दिखाते हैं कि समय बदलने के बावजूद कई परंपराएं लोगों के जीवन में अपना महत्व बनाए रखती हैं।








