हरियाली तीज पर मिट्टी से शिवलिंग, माता गौरी और भगवान गणेश की प्रतिमा बनाकर पूजा करने की परंपरा है। धार्मिक मान्यताओं में इसे प्रकृति, शिव-शक्ति और वैवाहिक सुख से जुड़ी आस्था का प्रतीक माना गया है।
हरियाली तीज: सावन शुक्ल पक्ष की तृतीया को मनाए जाने वाले इस पर्व पर भगवान शिव और माता पार्वती की विशेष पूजा की जाती है। कई स्थानों पर महिलाएं मिट्टी से शिवलिंग, माता गौरी और भगवान गणेश की प्रतिमाएं बनाकर उनका पूजन करती हैं। मान्यता है कि यह परंपरा माता पार्वती की तपस्या, शिव-शक्ति के मिलन और प्रकृति के प्रति श्रद्धा से जुड़ी हुई है।
हरियाली तीज पर मिट्टी का शिवलिंग क्यों बनाया जाता है?
हरियाली तीज सावन महीने का प्रमुख पर्व है। यह त्योहार वर्षा ऋतु के दौरान आता है, जब चारों ओर हरियाली और प्राकृतिक सुंदरता दिखाई देती है। इसी वजह से इस पर्व का संबंध प्रकृति और उसके संरक्षण की भावना से भी जोड़ा जाता है।

धार्मिक परंपराओं में मिट्टी को धरती और प्रकृति का प्रतीक माना गया है। हरियाली तीज पर मिट्टी से शिवलिंग बनाकर उसकी पूजा करना इसी प्राकृतिक तत्व के प्रति श्रद्धा व्यक्त करने का एक तरीका माना जाता है।
मिट्टी से बनाए गए शिवलिंग को पार्थिव शिवलिंग कहा जाता है। श्रद्धालु इसे बनाकर जलाभिषेक करते हैं और भगवान शिव की आराधना करते हैं। मान्यता के अनुसार, श्रद्धा और विधि-विधान से पार्थिव शिवलिंग की पूजा करने से भगवान शिव की कृपा प्राप्त होती है।
मिट्टी की गौरी और गणेश प्रतिमा का क्या महत्व है?
हरियाली तीज की पूजा में भगवान शिव के साथ माता पार्वती यानी गौरी की आराधना का विशेष महत्व है। सुहागिन महिलाएं माता गौरी से अखंड सौभाग्य, पति की लंबी आयु और दांपत्य जीवन में सुख-शांति की कामना करती हैं। वहीं, अविवाहित लड़कियां मनचाहे और योग्य जीवनसाथी की कामना से यह व्रत करती हैं।
इसी कारण कई जगहों पर महिलाएं मिट्टी से माता गौरी की प्रतिमा बनाती हैं। उनके साथ भगवान गणेश की प्रतिमा भी बनाई जाती है। गणेश जी को शुभता और मंगल कार्यों से जोड़ा जाता है। शिव परिवार की इन प्रतिमाओं का पूजन परिवार में सुख, समृद्धि और सौहार्द की कामना के साथ किया जाता है।
माता पार्वती की तपस्या से जुड़ी है परंपरा
हरियाली तीज की धार्मिक कथा का संबंध माता पार्वती की कठोर तपस्या से जोड़ा जाता है। मान्यता है कि माता पार्वती ने भगवान शिव को पति रूप में प्राप्त करने के लिए लंबे समय तक तपस्या की थी।
कई धार्मिक मान्यताओं में बताया गया है कि माता पार्वती ने शिव की आराधना के लिए मिट्टी से शिवलिंग बनाकर पूजा की थी। इसी वजह से हरियाली तीज पर मिट्टी से शिवलिंग बनाने और उसकी पूजा करने की परंपरा आज भी कई क्षेत्रों में निभाई जाती है।
पार्थिव शिवलिंग की पूजा में मिट्टी का विशेष महत्व है। यह परंपरा शिव और शक्ति के मिलन के साथ प्रकृति और मानव जीवन के गहरे संबंध को भी दर्शाती है।
हरियाली तीज पर मिट्टी के शिव परिवार की पूजा
हरियाली तीज के दिन महिलाएं स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करती हैं और पूजा स्थल को साफ करती हैं। इसके बाद मिट्टी से शिवलिंग, माता गौरी और भगवान गणेश की प्रतिमा तैयार की जाती है।
इन प्रतिमाओं को पूजा स्थान पर स्थापित करने के बाद जल, फूल, बेलपत्र और अन्य पूजन सामग्री अर्पित की जाती है। माता गौरी को सुहाग की सामग्री चढ़ाने की परंपरा भी कई स्थानों पर है।
इसके बाद भगवान शिव, माता पार्वती और गणेश जी की पूजा कर आरती की जाती है। महिलाएं अपने पति की दीर्घायु, परिवार की खुशहाली और दांपत्य जीवन में सुख-शांति की प्रार्थना करती हैं।
मिट्टी की प्रतिमाएं देती हैं प्रकृति से जुड़ने का संदेश
हरियाली तीज पर मिट्टी से शिव परिवार बनाना केवल धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ जुड़ाव का प्रतीक भी माना जा सकता है। मिट्टी से प्रतिमा बनाकर पूजा करना और बाद में उसे प्रकृति में वापस मिलाना जीवन के प्राकृतिक चक्र की याद दिलाता है।
इसी वजह से हरियाली तीज पर मिट्टी के शिवलिंग, गौरी और गणेश की पूजा की परंपरा धार्मिक आस्था के साथ प्रकृति, परिवार और वैवाहिक जीवन के महत्व को भी दर्शाती है।










