हिमाचल में चीनी के दाम 20 रुपए तक बढ़े: आम आदमी के साथ दवा उद्योग भी परेशान, एथेनॉल की बढ़ती मांग से बढ़ा लागत का दबाव

हिमाचल में चीनी के दाम में 20 रुपए तक की बढ़ोतरी से आम लोगों के साथ BBN के फार्मा उद्योग पर भी लागत का दबाव बढ़ा है। एथेनॉल मांग ने सप्लाई प्रभावित की।
हिमाचल में चीनी के दाम 20 रुपए तक बढ़े: आम आदमी के साथ दवा उद्योग भी परेशान, एथेनॉल की बढ़ती मांग से बढ़ा लागत का दबाव
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हिमाचल प्रदेश। चीनी की बढ़ती कीमतों ने आम उपभोक्ताओं की चिंता बढ़ाने के साथ-साथ हिमाचल प्रदेश के फार्मा उद्योग के सामने भी नई चुनौती खड़ी कर दी है। प्रदेश में चीनी के दाम में 20 रुपए प्रति किलो तक का उछाल आने की बात सामने आई है। इसका सीधा असर घरेलू बजट पर पड़ रहा है, वहीं बद्दी-बरोटीवाला-नालागढ़ (BBN) औद्योगिक क्षेत्र में दवा निर्माण से जुड़े उद्यमियों की उत्पादन लागत को लेकर चिंता बढ़ गई है।

चीनी की कीमतों में अचानक तेजी के पीछे सप्लाई पर दबाव, उत्पादन में कमी और एथेनॉल निर्माण के लिए गन्ने तथा चीनी के इस्तेमाल को प्रमुख कारणों में माना जा रहा है। देशभर में चीनी की उपलब्धता और कीमतों को लेकर बाजार पर दबाव बना हुआ है। अगस्त की शुरुआत से ही थोक कीमतों में तेज वृद्धि दर्ज की गई है। सरकार भी बढ़ती कीमतों को नियंत्रित करने के लिए स्टॉक लिमिट और अन्य उपायों पर काम कर रही है।

हिमाचल में इसका असर केवल घरों की रसोई तक सीमित नहीं है। BBN देश के प्रमुख फार्मा मैन्युफैक्चरिंग हब में शामिल है, जहां बड़ी संख्या में दवा कंपनियां काम करती हैं। दवा निर्माण की कुछ प्रक्रियाओं में चीनी और उससे जुड़े कच्चे माल का इस्तेमाल होने के कारण कीमत बढ़ने पर कंपनियों की लागत प्रभावित हो सकती है।

फार्मा उद्यमियों की चिंता इसलिए भी बढ़ी है क्योंकि दवा उद्योग पहले से ही कच्चे माल, पैकेजिंग, ऊर्जा, परिवहन और अन्य इनपुट लागत के दबाव से गुजरता है। ऐसे में किसी महत्वपूर्ण इनपुट की कीमत में अचानक वृद्धि होने पर उत्पादन लागत बढ़ना स्वाभाविक है। अगर कीमतें लंबे समय तक ऊंची बनी रहती हैं तो कंपनियों के मार्जिन पर भी असर पड़ सकता है।

देश के चीनी बाजार में इस समय सप्लाई और कीमतों को लेकर स्थिति चुनौतीपूर्ण बनी हुई है। हालिया रिपोर्टों के अनुसार, जुलाई के अंत तक कई प्रमुख बाजारों में चीनी की थोक कीमतों में तेज बढ़ोतरी हुई थी। कुछ बाजारों में एक्स-मिल कीमतें 4,400-4,500 रुपए प्रति क्विंटल तक पहुंच गई थीं, जबकि दिल्ली में थोक कीमत करीब 4,750-4,800 रुपए प्रति क्विंटल बताई गई।

वहीं अगस्त में कीमतों में तेजी और बढ़ी है। सरकारी आंकड़ों के आधार पर रिपोर्ट में बताया गया कि अखिल भारतीय औसत चीनी कीमत एक महीने में करीब 17 प्रतिशत बढ़कर 4,620 रुपए प्रति क्विंटल तक पहुंच गई थी। त्योहारी सीजन में मांग बढ़ने के कारण आगे भी कीमतों पर दबाव बने रहने की आशंका जताई गई है।

एथेनॉल की बढ़ती मांग ने भी बाजार का समीकरण बदला है। सरकार लंबे समय से पेट्रोल में एथेनॉल ब्लेंडिंग को बढ़ावा दे रही है। इसके लिए चीनी उद्योग गन्ने के रस और विभिन्न प्रकार के मोलासेस से एथेनॉल तैयार करता है। इससे गन्ने और चीनी का एक हिस्सा एथेनॉल उत्पादन की ओर चला जाता है और बाजार में उपलब्ध चीनी की मात्रा प्रभावित हो सकती है।

मौजूदा सीजन में करीब 3 मिलियन टन चीनी के बराबर उत्पादन एथेनॉल की ओर डायवर्ट होने का अनुमान है। विशेषज्ञों के अनुसार, उत्पादन में कमी और एथेनॉल के लिए डायवर्जन ने घरेलू बाजार में उपलब्धता पर दबाव बढ़ाया है।

इसी वजह से चीनी की कीमतों और एथेनॉल नीति के बीच संतुलन सरकार के लिए भी चुनौती बन गया है। अगर ज्यादा गन्ना एथेनॉल में जाता है तो घरेलू बाजार में चीनी की उपलब्धता कम हो सकती है और कीमतें बढ़ सकती हैं। दूसरी ओर, एथेनॉल उत्पादन कम करने पर पेट्रोल में 20 प्रतिशत एथेनॉल मिश्रण यानी E20 लक्ष्य को बनाए रखने के लिए दूसरे स्रोतों पर निर्भरता बढ़ानी पड़ सकती है।

बढ़ती कीमतों का असर आम परिवारों पर भी दिखाई देने लगा है। चाय, मिठाई, बेकरी और अन्य खाद्य उत्पादों की लागत में चीनी एक महत्वपूर्ण हिस्सा है। चीनी महंगी होने पर इसका अप्रत्यक्ष असर ऐसे उत्पादों की कीमतों पर भी पड़ सकता है। आने वाले त्योहारों के दौरान मिठाई और अन्य खाद्य पदार्थों की मांग बढ़ने के साथ यह दबाव और बढ़ सकता है।

सरकार ने कीमतों को नियंत्रित करने के लिए चीनी के स्टॉक पर भी नियंत्रण लगाया है। 1 अगस्त से लागू व्यवस्था के तहत डीलरों को सीमित मात्रा में चीनी रखने की अनुमति है और स्टॉक की अवधि पर भी प्रतिबंध लगाया गया है। यह व्यवस्था 30 नवंबर 2026 तक लागू रहने वाली है।

इसके अलावा केंद्र सरकार घरेलू बाजार में उपलब्धता बढ़ाने के लिए सीमित मात्रा में शुल्क-मुक्त चीनी आयात जैसे विकल्पों पर भी विचार कर रही है। हालिया रिपोर्ट के मुताबिक सरकार लगभग 10 लाख टन तक चीनी के आयात की संभावना पर विचार कर रही है, जबकि बंदरगाह आधारित रिफाइनरियों से कुछ स्टॉक घरेलू बाजार में जारी कराने का विकल्प भी देखा जा रहा है।

चीनी की कीमतों में बढ़ोतरी का एक बड़ा कारण इस साल उत्पादन में कमी भी है। भारतीय चीनी एवं जैव-ऊर्जा निर्माताओं के संगठन के अनुमान के अनुसार 2025-26 सीजन में भारत का चीनी उत्पादन करीब 27.9 मिलियन टन रह सकता है, जबकि घरेलू खपत करीब 28.5 मिलियन टन रहने का अनुमान है। यानी उत्पादन और खपत के बीच अंतर रहने की संभावना है।

महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे प्रमुख गन्ना उत्पादक राज्यों में मौसम और फसल से जुड़ी चुनौतियों ने भी अगले सीजन की उपलब्धता को लेकर चिंता बढ़ाई है। अगर नई फसल आने तक बाजार में पर्याप्त आपूर्ति नहीं बढ़ती है तो कीमतों पर दबाव बना रह सकता है।

हिमाचल के फार्मा सेक्टर के लिए यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि BBN क्षेत्र में दवा निर्माण से जुड़ी गतिविधियां बड़े पैमाने पर होती हैं। कंपनियों को कच्चे माल की कीमतों के साथ-साथ उत्पादन और लॉजिस्टिक्स की लागत का भी सामना करना पड़ता है। ऐसे में चीनी जैसी सामग्री की कीमत में तेज वृद्धि से लागत गणित प्रभावित हो सकता है।

उद्योग से जुड़े लोगों की नजर अब इस बात पर है कि केंद्र सरकार चीनी की कीमतों को नियंत्रित करने के लिए क्या कदम उठाती है और अगले सीजन में गन्ने का कितना हिस्सा चीनी तथा कितना एथेनॉल उत्पादन के लिए इस्तेमाल किया जाता है।

अगर सरकार चीनी की उपलब्धता बढ़ाने के लिए एथेनॉल के लिए गन्ने के डायवर्जन में कटौती करती है तो घरेलू बाजार में चीनी की सप्लाई बढ़ सकती है। इससे कीमतों पर कुछ राहत आने की संभावना रहेगी। हालांकि इससे एथेनॉल उत्पादन और E20 कार्यक्रम के लिए वैकल्पिक फीडस्टॉक की जरूरत बढ़ सकती है।

दूसरी तरफ, यदि चीनी की कीमतें लगातार बढ़ती रहती हैं तो इसका असर केवल उपभोक्ताओं तक सीमित नहीं रहेगा। मिठाई, खाद्य प्रसंस्करण, पेय पदार्थ और फार्मा जैसे कई उद्योगों की लागत प्रभावित हो सकती है। BBN जैसे बड़े औद्योगिक क्षेत्र में इसका असर कंपनियों के उत्पादन खर्च और मुनाफे पर पड़ने की संभावना है।

फिलहाल चीनी की कीमतों में तेजी ने हिमाचल के आम लोगों और उद्योग दोनों की चिंता बढ़ा दी है। एक तरफ घरेलू बजट पर अतिरिक्त बोझ पड़ रहा है, वहीं दूसरी तरफ फार्मा उद्यमी उत्पादन लागत को लेकर सतर्क हैं। आने वाले महीनों में सरकार के चीनी स्टॉक, आयात और एथेनॉल नीति से जुड़े फैसले यह तय करने में अहम भूमिका निभाएंगे कि कीमतों में राहत कब तक मिलती है।

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