हिमालय में सल्फेट एरोसोल घटने से बढ़ रही गर्मी, अध्ययन में हर साल 0.0127°C तापमान बढ़ने का दावा

हिमालय में सल्फेट एरोसोल घटने से गर्मी बढ़ने का संकेत मिला है। अध्ययन के अनुसार, 1980 से 2023 तक तापमान 0.0127°C सालाना बढ़ा।

उत्तर-पश्चिमी हिमालय में सल्फेट एरोसोल की घटती मात्रा और बढ़ते तापमान के बीच संबंध सामने आया है। 1980 से 2023 तक के आंकड़ों पर आधारित अध्ययन के अनुसार, 4,000 मीटर से अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में तापमान औसतन 0.0127°C प्रतिवर्ष बढ़ा।

देहरादून: हिमालय के ऊंचाई वाले क्षेत्रों में तापमान बढ़ने के पीछे वायुमंडलीय सल्फेट कणों की घटती मात्रा भी एक संभावित कारण हो सकती है। सितंबर 2026 में Atmospheric Pollution Research जर्नल में प्रकाशित अध्ययन में लेह, कारगिल और केलांग जैसे क्षेत्रों के आंकड़ों का विश्लेषण किया गया। शोध में सल्फेट एरोसोल की मात्रा में गिरावट और सतह के पास तापमान में वृद्धि के बीच संबंध दर्ज किया गया है।

हिमालय में तापमान बढ़ने के पीछे क्या है सल्फेट कणों की भूमिका?

हिमालय के ऊंचाई वाले इलाकों में जलवायु परिवर्तन को समझने के लिए वैज्ञानिक वायुमंडल में मौजूद सूक्ष्म कणों की भूमिका का अध्ययन कर रहे हैं। एक नए शोध में उत्तर-पश्चिमी हिमालय के उन क्षेत्रों पर ध्यान दिया गया है, जो समुद्र तल से 4,000 मीटर से अधिक ऊंचाई पर स्थित हैं। अध्ययन में लेह, कारगिल और केलांग जैसे इलाकों के वायुमंडलीय आंकड़ों का विश्लेषण किया गया।

शोधकर्ताओं ने 1980 से 2023 तक के 44 वर्षों के आंकड़ों का इस्तेमाल किया। अध्ययन के अनुसार, इस अवधि में सल्फेट एरोसोल ऑप्टिकल डेप्थ (AOD) में औसतन प्रति वर्ष 0.0002 की गिरावट दर्ज की गई। इसी दौरान सतह के निकट तापमान में औसतन 0.0127 डिग्री सेल्सियस प्रतिवर्ष की वृद्धि देखी गई।

यह शोध सितंबर 2026 में Atmospheric Pollution Research जर्नल में प्रकाशित हुआ। इसके लिए NASA के MERRA-2 रीएनालिसिस डेटा का उपयोग किया गया। हालांकि, सल्फेट कणों में कमी और तापमान में वृद्धि के बीच संबंध सामने आने का अर्थ यह नहीं है कि तापमान बढ़ने का यही एकमात्र कारण है।

सल्फेट एरोसोल कैसे पैदा करते हैं ठंडक का प्रभाव?

सल्फेट एरोसोल वायुमंडल में मौजूद बेहद छोटे कण होते हैं। इनका निर्माण मुख्य रूप से सल्फर डाइऑक्साइड गैस की रासायनिक प्रक्रियाओं से होता है। सल्फर डाइऑक्साइड विभिन्न प्राकृतिक और मानवीय गतिविधियों से वायुमंडल में पहुंच सकती है।

ये कण सूर्य के प्रकाश को बिखेरते हैं। इस प्रक्रिया में सूर्य की ऊर्जा का कुछ हिस्सा अंतरिक्ष की ओर वापस चला जाता है, जिससे पृथ्वी की सतह तक पहुंचने वाली ऊर्जा कम हो सकती है। इसका प्रभाव स्थानीय और क्षेत्रीय तापमान पर पड़ सकता है।

सल्फेट एरोसोल बादलों के निर्माण और उनकी विशेषताओं को भी प्रभावित करते हैं। ये बादलों में पानी की बूंदों के बनने में मदद कर सकते हैं, जिससे सूर्य के प्रकाश को परावर्तित करने की उनकी क्षमता बदल सकती है। इस तरह वायुमंडल में इन कणों की मात्रा में बदलाव पृथ्वी के ऊर्जा संतुलन को प्रभावित कर सकता है।

जब सल्फेट एरोसोल की मात्रा घटती है, तो सूर्य के प्रकाश को वापस बिखेरने वाला प्रभाव कमजोर पड़ सकता है। ऐसी स्थिति में सतह तक अधिक सौर ऊर्जा पहुंचने की संभावना रहती है। हालांकि, वास्तविक प्रभाव बादलों, नमी, अन्य एरोसोल और स्थानीय मौसम की परिस्थितियों पर भी निर्भर करता है।

ऊंचाई वाले इलाकों में क्यों घट रहे सल्फेट कण?

शोधकर्ताओं ने ऊंचाई वाले हिमालयी क्षेत्रों में सल्फेट एरोसोल की कमी के पीछे कुछ संभावित कारणों की ओर संकेत किया है। इनमें स्थानीय स्तर पर सल्फर डाइऑक्साइड के स्रोतों का सीमित होना और निचले वायुमंडल से इन कणों का ऊंचाई तक पहुंचने की प्रक्रिया शामिल है।

तलहटी वाले क्षेत्रों में औद्योगिक गतिविधियों, ईंधन के इस्तेमाल और अन्य स्रोतों से सल्फर डाइऑक्साइड का उत्सर्जन अधिक हो सकता है। इसके विपरीत, ऊंचाई वाले इलाकों में स्थानीय उत्सर्जन स्रोत अपेक्षाकृत कम हैं। इसके अलावा, वायुमंडलीय परिसंचरण और नमी की स्थिति भी इस बात को प्रभावित कर सकती है कि सल्फेट कण कितनी मात्रा में ऊंचाई तक पहुंचते हैं और कितने समय तक वातावरण में बने रहते हैं।

इसी कारण हिमालय की तलहटी और अधिक ऊंचाई वाले क्षेत्रों में सल्फेट एरोसोल की मात्रा के रुझान अलग हो सकते हैं। इस अंतर को समझना क्षेत्रीय जलवायु परिवर्तन के आकलन के लिए महत्वपूर्ण है।

क्या हिमालय के लिए खतरे की घंटी है यह बदलाव?

हिमालय का तापमान बढ़ना ग्लेशियरों, बर्फबारी, जल स्रोतों और स्थानीय पारिस्थितिकी के लिए चिंता का विषय है। यदि तापमान में वृद्धि लंबे समय तक जारी रहती है, तो इसका असर ग्लेशियरों के पिघलने, मौसमी जल उपलब्धता और पहाड़ी क्षेत्रों के पर्यावरण पर पड़ सकता है।

हालांकि, इस अध्ययन के आंकड़ों से यह निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता कि सल्फेट एरोसोल में गिरावट ही हिमालय में बढ़ती गर्मी का मुख्य कारण है। ग्रीनहाउस गैसें, बर्फ और सतह की परावर्तन क्षमता में बदलाव, बादलों की स्थिति तथा क्षेत्रीय मौसम प्रणालियां भी तापमान को प्रभावित करती हैं।

शोध के निष्कर्ष हिमालयी जलवायु में हो रहे बदलावों को समझने के लिए एक महत्वपूर्ण संकेत देते हैं। भविष्य में अलग-अलग ऊंचाइयों पर लंबे समय तक किए जाने वाले मापन और अन्य जलवायु कारकों के विश्लेषण से यह स्पष्ट करने में मदद मिल सकती है कि सल्फेट एरोसोल में कमी क्षेत्रीय तापमान वृद्धि में कितनी भूमिका निभा रही है।

Leave a comment