इंटरनेशनल टाइगर डे के अवसर पर उत्तराखंड का कॉर्बेट टाइगर रिजर्व एक बार फिर बाघ संरक्षण का राष्ट्रीय मॉडल बनकर उभरा है। यहां बाघों की संख्या लगातार बढ़ रही है और कॉर्बेट से राजाजी टाइगर रिजर्व में बाघों के सफल स्थानांतरण से वहां भी बाघों की आबादी में वृद्धि की उम्मीद है।
नैनीताल: इंटरनेशनल टाइगर डे के मौके पर उत्तराखंड का कॉर्बेट टाइगर रिजर्व देश में बाघ संरक्षण की सबसे सफल कहानियों में शामिल है। बेहतर प्राकृतिक आवास, प्रभावी निगरानी और वैज्ञानिक संरक्षण उपायों के कारण यहां बाघों की संख्या लगातार बढ़ी है। अब कॉर्बेट न केवल अपने जंगलों में बल्कि राजाजी टाइगर रिजर्व में भी बाघों की आबादी बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है।
कॉर्बेट में लगातार बढ़ रही है बाघों की संख्या
उत्तराखंड स्थित कॉर्बेट टाइगर रिजर्व (CTR) देश के प्रमुख बाघ संरक्षण क्षेत्रों में अपनी अलग पहचान बना चुका है। राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण (NTCA) के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2006 में यहां 150 बाघ दर्ज किए गए थे। इसके बाद यह संख्या लगातार बढ़ती रही और वर्ष 2010 में 184, 2014 में 215, 2018 में 231 तथा 2022 की गणना में 260 बाघ दर्ज किए गए।

कॉर्बेट टाइगर रिजर्व न केवल बाघों की कुल संख्या के मामले में देश के 58 टाइगर रिजर्व में अग्रणी है, बल्कि यहां बाघों का घनत्व भी सबसे अधिक माना जाता है। यहां प्रति 100 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र में लगभग 14 बाघ पाए जाते हैं, जो इस क्षेत्र की अनुकूल पारिस्थितिकी और प्रभावी संरक्षण व्यवस्था को दर्शाता है।
राजाजी टाइगर रिजर्व में भी बढ़ रही बाघों की मौजूदगी
कॉर्बेट की सफलता का प्रभाव अब राजाजी टाइगर रिजर्व पर भी दिखाई दे रहा है। हरिद्वार स्थित राजाजी टाइगर रिजर्व के पश्चिमी मोतीचूर क्षेत्र में बाघों की संख्या बढ़ाने के लिए राष्ट्रीय बाघ संरक्षण प्राधिकरण ने कॉर्बेट से बाघों का स्थानांतरण शुरू किया था।
वर्ष 2020 से 2025 के बीच पांच बाघ-बाघिनों को कॉर्बेट से राजाजी भेजा गया। वन अधिकारियों के अनुसार, ये सभी बाघ नए वातावरण में सफलतापूर्वक रह रहे हैं और वहां प्रजनन की संभावनाएं भी बढ़ी हैं। अब अगले चरण में एक नर और चार मादा सहित पांच और बाघों को राजाजी टाइगर रिजर्व भेजने की योजना है, जिससे वहां की बाघ आबादी को और मजबूती मिलने की उम्मीद है।
संरक्षण के साथ बढ़ रही नई चुनौतियां
कॉर्बेट टाइगर रिजर्व के निदेशक साकेत बडोला के अनुसार, बेहतर प्राकृतिक आवास, आधुनिक निगरानी प्रणाली और प्रभावी वन प्रबंधन ने बाघ संरक्षण को नई दिशा दी है। बाघों की सुरक्षा के लिए कैमरा ट्रैप, ड्रोन, मोटरबोट, एटीवी वाहन और हाथियों के माध्यम से नियमित गश्त की जाती है। साथ ही केंद्र सरकार ने टाइगर रिजर्व से जुड़े बाहरी वन क्षेत्रों के संरक्षण के लिए भी बजट उपलब्ध कराना शुरू किया है।
हालांकि विशेषज्ञों का कहना है कि बाघों की बढ़ती संख्या के साथ मानव-वन्यजीव संघर्ष की चुनौती भी बढ़ रही है। वन विभाग के आंकड़ों के अनुसार, वर्ष 2009 से फरवरी 2026 के बीच कॉर्बेट, रामनगर और तराई पश्चिमी वन प्रभाग क्षेत्रों में बाघों के हमलों में 45 लोगों की जान जा चुकी है।
कॉर्बेट के आसपास के वन क्षेत्रों में भी बाघों की अच्छी मौजूदगी दर्ज की गई है। एनटीसीए के अनुसार, रामनगर वन प्रभाग में 67 और तराई पश्चिमी वन प्रभाग में 53 बाघ मौजूद हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि इंटरनेशनल टाइगर डे का उद्देश्य केवल बाघों की संख्या बढ़ाना नहीं, बल्कि संरक्षण और मानव सुरक्षा के बीच संतुलन बनाए रखना भी है। कॉर्बेट टाइगर रिजर्व इस दिशा में देश के लिए एक महत्वपूर्ण उदाहरण बनकर उभरा है।










