इसरो को मिली बड़ी सफलता, तय कक्षा में पहुंचा नेविगेशन सैटेलाइट, जानें भारत को क्या फायदा होगा

इसरो का नेविगेशन सैटेलाइट सफलतापूर्वक तय कक्षा में पहुंच गया है। जानें कैसे मजबूत होगा भारत का NavIC सिस्टम और आम लोगों को क्या फायदा मिलेगा।

भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन (ISRO) का NVS-03 सैटेलाइट सफलतापूर्वक तय कक्षा में पहुंच गया है। इसरो ने चार बार उसकी कक्षा में बदलाव किया। फिलहा

बेंगलुरु: भारतीय अंतरिक्ष अनुसंधान संगठन यानी ISRO को अपने नए नेविगेशन सैटेलाइट NVS-03 मिशन में एक और सफलता मिली है। 30 अक्टूबर को लॉन्च किया गया यह सैटेलाइट अब पृथ्वी के चारों ओर निर्धारित जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट में पहुंच चुका है। इसरो ने बुधवार, 4 नवंबर 2026 को इसकी जानकारी दी। अंतरिक्ष एजेंसी के मुताबिक, सैटेलाइट की कक्षा बदलने के लिए चार बार इंजन चलाया गया और सभी प्रक्रियाएं सफल रहीं। वैज्ञानिकों ने इसकी स्थिति सामान्य बताई है।

चार बार बदली गई सैटेलाइट की कक्षा

NVS-03 को उसकी तय कक्षा तक पहुंचाने के लिए इसरो के वैज्ञानिक पिछले कुछ दिनों से काम कर रहे थे। लॉन्च के बाद सैटेलाइट सीधे अपनी अंतिम कक्षा में नहीं पहुंचा था। पहले उसे पृथ्वी के चारों ओर एक लंबी अंडाकार कक्षा में स्थापित किया गया। इसके बाद धीरे-धीरे उसकी ऊंचाई बढ़ाई गई।

इसरो को मिली बड़ी सफलता, तय कक्षा में पहुंचा नेविगेशन सैटेलाइट, जानें भारत को क्या फायदा होगा

इसरो के अनुसार, सैटेलाइट की कक्षा बदलने की चारों प्रक्रियाएं सफल रही हैं। इस दौरान उसके लिक्विड अपोजी मोटर यानी LAM इंजन को कुल 6,164 सेकंड तक चलाया गया।

अब NVS-03 पृथ्वी से लगभग 35,765 किलोमीटर से 36,196 किलोमीटर की ऊंचाई वाली कक्षा में पहुंच गया है। इसकी कक्षा का झुकाव 29.98 डिग्री है। इसरो ने बताया है कि सैटेलाइट के सभी जरूरी सिस्टम सामान्य स्थिति में हैं।

30 अक्टूबर को श्रीहरिकोटा से हुआ था लॉन्च

NVS-03 सैटेलाइट को 30 अक्टूबर 2026 की रात 11 बजकर 51 मिनट पर आंध्र प्रदेश के श्रीहरिकोटा स्थित सतीश धवन अंतरिक्ष केंद्र से लॉन्च किया गया था। इसे अंतरिक्ष में पहुंचाने के लिए GSLV-F18 रॉकेट का इस्तेमाल हुआ।

लॉन्च के बाद रॉकेट ने सैटेलाइट को 170.3 किलोमीटर से 38,080 किलोमीटर वाली शुरुआती कक्षा में स्थापित किया था। इसके अगले दिन, 31 अक्टूबर को पहली बार उसकी कक्षा बदली गई। इसके लिए इंजन को 2,174.8 सेकंड तक चलाया गया।

इसके बाद भी सैटेलाइट की कक्षा में बदलाव किया गया। चार सफल प्रक्रियाओं के बाद वह जियोसिंक्रोनस ऑर्बिट तक पहुंच गया। यह GSLV रॉकेट की 20वीं उड़ान थी।

NVS-03 सैटेलाइट का क्या काम है?

NVS-03 भारत के स्वदेशी नेविगेशन सिस्टम NavIC के लिए तैयार किया गया है। NavIC का पूरा नाम Navigation with Indian Constellation है। यह सिस्टम लोगों को किसी जगह की लोकेशन, दिशा और समय से जुड़ी जानकारी उपलब्ध कराने के लिए बनाया गया है।

आसान भाषा में समझें तो यह अमेरिका के GPS की तरह काम करने वाला भारत का अपना क्षेत्रीय नेविगेशन सिस्टम है। इसका इस्तेमाल सड़क पर रास्ता खोजने के अलावा समुद्री जहाजों की आवाजाही, परिवहन और अन्य जरूरी सेवाओं में भी किया जा सकता है।

NVS-03 नई पीढ़ी के पांच नेविगेशन सैटेलाइट की सीरीज का तीसरा सैटेलाइट है। इस सीरीज का उद्देश्य मौजूदा NavIC नेटवर्क को मजबूत करना और उसकी सेवाएं आगे भी जारी रखना है।

भारत के अलावा पड़ोसी इलाकों को भी मिलेगा फायदा

इसरो के मुताबिक, NVS-03 को भारत और उसकी सीमाओं से करीब 1,500 किलोमीटर तक के क्षेत्र में नेविगेशन सेवाएं देने के लिए तैयार किया गया है।

सैटेलाइट में L1, L5 और S-बैंड सिग्नल की सुविधा दी गई है। इसमें L1 सिग्नल को शामिल करना अहम है, क्योंकि इससे भविष्य में ज्यादा तरह के नेविगेशन उपकरणों में NavIC का इस्तेमाल आसान हो सकता है।

NVS-03 में भारत में विकसित एटॉमिक क्लॉक भी लगाई गई है। इसके साथ बाहर से खरीदी गई एटॉमिक क्लॉक भी मौजूद हैं। नेविगेशन सैटेलाइट में बेहद सटीक समय की जानकारी जरूरी होती है। इसी समय के आधार पर जमीन पर मौजूद उपकरण अपनी लोकेशन का पता लगाते हैं।

पिछले सैटेलाइट की परेशानी के बाद मिली सफलता

NVS-03 का तय कक्षा में पहुंचना इसरो के लिए इसलिए भी अहम है, क्योंकि इससे पहले NVS-02 मिशन में परेशानी आई थी।

NVS-02 को 29 जनवरी 2025 को लॉन्च किया गया था। रॉकेट ने उसे शुरुआती कक्षा में सफलतापूर्वक पहुंचाया, लेकिन बाद में सैटेलाइट की कक्षा बढ़ाने का काम पूरा नहीं हो सका।

जांच में सामने आया था कि इंजन से जुड़ी ऑक्सीडाइजर वाल्व नहीं खुल पाईं। इस वजह से सैटेलाइट को उसकी निर्धारित कक्षा तक नहीं पहुंचाया जा सका।

अब NVS-03 की कक्षा बदलने की सभी चार प्रक्रियाएं सफल होने से इसरो को बड़ी राहत मिली है। हालांकि, सैटेलाइट के कक्षा में पहुंचने और उसकी नेविगेशन सेवाएं शुरू होने में अंतर होता है। सेवाएं शुरू करने से पहले जरूरी तकनीकी जांच पूरी करनी होती है।

Leave a comment