रांची: झारखंड पुलिस महकमे के सामने अफसरों की कमी की चुनौती लगातार गंभीर होती जा रही है। इस साल के शुरुआती आठ महीनों में करीब 40 डीएसपी और इंस्पेक्टर स्तर के अधिकारी सेवानिवृत्त हो चुके हैं। अकेले सोमवार को 1994 बैच के पांच पुलिस अधिकारियों ने भी सेवा से विदाई ली। बड़ी संख्या में अनुभवी अधिकारियों के रिटायर होने के बाद पुलिस विभाग में खाली पदों का दबाव बढ़ गया है। इसका असर थानों से लेकर जिला पुलिस मुख्यालय और दूसरे महत्वपूर्ण पदों पर दिखाई देने लगा है। अधिकारियों की कमी के कारण मौजूदा अफसरों पर अतिरिक्त जिम्मेदारियां बढ़ रही हैं और इसका सीधा असर पुलिसिंग की गति तथा विधि-व्यवस्था संभालने की क्षमता पर पड़ने की आशंका जताई जा रही है।
पुलिस विभाग में डीएसपी और इंस्पेक्टर स्तर के अधिकारियों की भूमिका काफी महत्वपूर्ण होती है। ये अधिकारी कानून-व्यवस्था से जुड़े मामलों की निगरानी, गंभीर अपराधों की जांच, थाना स्तर के कामकाज की समीक्षा, पुलिस टीमों के समन्वय और संवेदनशील इलाकों में सुरक्षा व्यवस्था संभालने में महत्वपूर्ण जिम्मेदारी निभाते हैं। ऐसे में जब लगातार बड़ी संख्या में अनुभवी अधिकारी सेवानिवृत्त हो रहे हों और उनके स्थान पर उसी अनुपात में नई नियुक्तियां या पदस्थापन नहीं हो पाएं, तो विभाग की कार्यप्रणाली पर दबाव बढ़ना स्वाभाविक है।
झारखंड में पुलिस अफसरों की कमी का यह सिलसिला अचानक सामने नहीं आया है। जुलाई के अंत तक ही 35 पुलिस अधिकारियों के सेवानिवृत्त होने की रिपोर्ट सामने आ चुकी थी। अब अगस्त में यह संख्या बढ़कर करीब 40 तक पहुंच गई है। यानी कुछ ही महीनों के भीतर बड़ी संख्या में अधिकारी पुलिस सेवा से बाहर हो गए।
रिटायर होने वाले अधिकारियों में लंबे समय से पुलिस विभाग में काम कर चुके अनुभवी अफसर शामिल हैं। इन अधिकारियों को अपराध नियंत्रण, कानून-व्यवस्था, जांच, प्रशासन और फील्ड पुलिसिंग का लंबा अनुभव रहा है। उनके सेवानिवृत्त होने के बाद केवल पद खाली नहीं होते, बल्कि विभाग को उनके अनुभव की भी कमी महसूस होती है। नए या अपेक्षाकृत कम अनुभवी अधिकारियों को अतिरिक्त जिम्मेदारी दिए जाने की स्थिति में उन्हें एक साथ कई स्तर की जिम्मेदारियां संभालनी पड़ सकती हैं।
अधिकारियों की कमी का असर सबसे पहले फील्ड पुलिसिंग पर पड़ सकता है। जिलों में पुलिस व्यवस्था को प्रभावी बनाए रखने के लिए पर्याप्त संख्या में पर्यवेक्षण स्तर के अधिकारियों की जरूरत होती है। डीएसपी और इंस्पेक्टर स्तर के अधिकारी थाना प्रभारियों और पुलिस टीमों के कामकाज की निगरानी करते हैं। अपराध की गंभीर घटनाओं में मौके पर पहुंचकर जांच की दिशा तय करने और वरिष्ठ अधिकारियों को रिपोर्ट देने में भी इनकी भूमिका रहती है। यदि एक अधिकारी के पास पहले से अधिक क्षेत्रों या इकाइयों की जिम्मेदारी हो तो हर मामले की निगरानी करना मुश्किल हो सकता है।
इसका असर जांच व्यवस्था पर भी पड़ सकता है। गंभीर अपराधों के मामलों में जांच की गुणवत्ता बनाए रखने के लिए अनुभवी अधिकारियों की आवश्यकता होती है। हत्या, डकैती, संगठित अपराध, साइबर अपराध, आर्थिक अपराध और दूसरे संवेदनशील मामलों में जांच की कई कड़ियों को जोड़ना पड़ता है। अधिकारी कम होने की स्थिति में एक ही अफसर पर कई मामलों की निगरानी का दबाव बढ़ सकता है। इससे जांच की गति और गुणवत्ता दोनों प्रभावित होने की आशंका रहती है।
कानून-व्यवस्था के मोर्चे पर भी पुलिस विभाग को लगातार तैयार रहना पड़ता है। झारखंड में अलग-अलग जिलों में समय-समय पर धरना-प्रदर्शन, राजनीतिक कार्यक्रम, धार्मिक आयोजन, त्योहार, वीआईपी दौरे और संवेदनशील घटनाएं सामने आती रहती हैं। ऐसे मौकों पर पर्याप्त संख्या में अधिकारियों की जरूरत होती है। यदि पहले से ही अफसरों के पद खाली हों तो उपलब्ध अधिकारियों को अतिरिक्त ड्यूटी लगानी पड़ सकती है।
पुलिस विभाग के लिए यह चुनौती इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि केवल संख्या पूरी करना पर्याप्त नहीं होता। फील्ड में काम करने वाले अधिकारियों को इलाके की भौगोलिक स्थिति, स्थानीय अपराधियों, संवेदनशील क्षेत्रों और स्थानीय सामाजिक परिस्थितियों की जानकारी भी होनी चाहिए। लंबे समय तक एक क्षेत्र में काम कर चुके अधिकारी अचानक सेवानिवृत्त होते हैं तो उनके अनुभव का स्थान लेना आसान नहीं होता।
झारखंड पुलिस में अधिकारियों की कमी का असर ग्रामीण और शहरी दोनों क्षेत्रों में अलग-अलग तरीके से पड़ सकता है। ग्रामीण क्षेत्रों में एक पुलिस अधिकारी को बड़े भौगोलिक क्षेत्र की निगरानी करनी पड़ती है। कई थाने एक-दूसरे से काफी दूरी पर होते हैं। ऐसे में अधिकारी कम होने पर एक ही अफसर को कई क्षेत्रों में दौड़ना पड़ सकता है। दूसरी ओर रांची, जमशेदपुर, धनबाद जैसे बड़े शहरी इलाकों में अपराध और यातायात दोनों का दबाव अधिक रहता है। वहां भी पर्याप्त संख्या में पर्यवेक्षण अधिकारियों की जरूरत होती है।
राजधानी रांची में पुलिस व्यवस्था पर खास नजर रहती है। यहां वीआईपी गतिविधियों, सरकारी कार्यक्रमों, राजनीतिक आयोजनों और बड़े सार्वजनिक कार्यक्रमों के कारण अतिरिक्त सुरक्षा व्यवस्था करनी पड़ती है। इसके अलावा शहर में लगातार बढ़ती आबादी और वाहनों की संख्या के कारण यातायात प्रबंधन भी पुलिस के लिए बड़ी जिम्मेदारी है। ऐसे में अधिकारियों की कमी होने पर उपलब्ध पुलिस अफसरों पर काम का दबाव और बढ़ सकता है।
डीएसपी स्तर के अधिकारियों की जिम्मेदारी केवल कानून-व्यवस्था तक सीमित नहीं होती। उन्हें अपने क्षेत्र के कई थानों की निगरानी करनी पड़ सकती है। थाना स्तर पर दर्ज होने वाले गंभीर मामलों की समीक्षा, लंबित कांडों की मॉनिटरिंग, अपराध की स्थिति की समीक्षा और वरिष्ठ अधिकारियों को रिपोर्ट देना भी उनकी जिम्मेदारियों में शामिल होता है। यदि एक अधिकारी के पास अतिरिक्त क्षेत्र की जिम्मेदारी आ जाए तो हर थाने पर नियमित निगरानी रखना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
इंस्पेक्टर स्तर के अधिकारियों की कमी भी कम गंभीर समस्या नहीं है। कई थानों और महत्वपूर्ण पुलिस इकाइयों में इंस्पेक्टर स्तर के अधिकारी प्रशासनिक और जांच संबंधी महत्वपूर्ण जिम्मेदारियां संभालते हैं। अनुभवी इंस्पेक्टरों के रिटायर होने के बाद उनके स्थान पर पदस्थापन में देरी होती है तो दूसरे अधिकारियों को अतिरिक्त प्रभार दिया जा सकता है। अतिरिक्त प्रभार की व्यवस्था कुछ समय के लिए काम कर सकती है, लेकिन लंबे समय तक इसे स्थायी समाधान नहीं माना जा सकता।
अधिकारियों की कमी के बीच पुलिस विभाग को अपनी प्राथमिकताएं तय करनी पड़ सकती हैं। अपराध नियंत्रण और कानून-व्यवस्था के साथ-साथ साइबर अपराध जैसी नई चुनौतियां भी पुलिस के सामने तेजी से बढ़ रही हैं। आज अपराध के तरीके पहले की तुलना में ज्यादा तकनीकी हो चुके हैं। ऑनलाइन ठगी, डिजिटल फ्रॉड और सोशल मीडिया से जुड़े अपराधों की जांच के लिए प्रशिक्षित अधिकारियों की जरूरत होती है। ऐसे में अनुभवी अधिकारियों की सेवानिवृत्ति के बाद नई पीढ़ी के अधिकारियों को प्रशिक्षित करना भी जरूरी हो जाता है।
पुलिस विभाग में लगातार सेवानिवृत्ति के कारण आने वाले महीनों में भी पद खाली होने की स्थिति बन सकती है। यदि रिटायरमेंट की प्रक्रिया लगातार चलती रही और उसके अनुपात में पदोन्नति तथा नियुक्तियां नहीं हुईं तो अधिकारियों की कमी और बढ़ सकती है। इसलिए विभाग के सामने तत्काल खाली पदों को भरने के साथ भविष्य की मानव संसाधन जरूरतों की योजना बनाने की चुनौती भी है।
पुलिस महकमे में पदोन्नति भी अधिकारियों की कमी को दूर करने का एक महत्वपूर्ण माध्यम हो सकती है। यदि योग्य इंस्पेक्टरों को समय पर डीएसपी स्तर पर पदोन्नत किया जाए और खाली पदों पर तैनाती की जाए तो फील्ड में अधिकारियों की कमी कुछ हद तक कम की जा सकती है। इसी तरह लंबित पदोन्नति प्रक्रिया को समय पर पूरा करने से भी विभाग को अनुभवी अधिकारियों की उपलब्धता बनाए रखने में मदद मिल सकती है।
हालांकि केवल पदोन्नति से ही समस्या पूरी तरह खत्म नहीं होगी। आने वाले वर्षों में लगातार सेवानिवृत्त होने वाले अधिकारियों को ध्यान में रखते हुए भर्ती और प्रशिक्षण की प्रक्रिया भी समय पर चलानी होगी। पुलिस विभाग में किसी अधिकारी को तैयार करने में समय लगता है। फील्ड अनुभव, कानून की समझ, जांच की क्षमता और प्रशासनिक जिम्मेदारी विकसित होने में वर्षों लगते हैं। इसलिए आज खाली हुए पद को कल भर देना ही पर्याप्त नहीं है; विभाग को भविष्य के लिए भी अधिकारियों की पाइपलाइन तैयार करनी होगी।
अधिकारियों की कमी का एक और असर पुलिसकर्मियों के काम के घंटे पर पड़ सकता है। जब पर्यवेक्षण स्तर के अधिकारी कम होते हैं तो उपलब्ध अधिकारियों को अतिरिक्त बैठकें, निरीक्षण, कानून-व्यवस्था ड्यूटी और प्रशासनिक काम संभालना पड़ता है। इससे उनका फील्ड में उपलब्ध समय कम हो सकता है। दूसरी ओर थाना स्तर के पुलिसकर्मियों को भी अतिरिक्त जिम्मेदारियां मिल सकती हैं।
कानून-व्यवस्था बनाए रखने के लिए पुलिस की संख्या के साथ-साथ नेतृत्व और निगरानी भी महत्वपूर्ण है। किसी बड़े अपराध या अचानक उत्पन्न हुई स्थिति में तेजी से निर्णय लेने वाला अनुभवी अधिकारी मौजूद हो तो पुलिस की प्रतिक्रिया अधिक प्रभावी हो सकती है। अधिकारियों की कमी होने पर एक अधिकारी को एक साथ कई स्थानों की जिम्मेदारी संभालनी पड़ सकती है, जिससे प्रतिक्रिया देने में समय लगने की आशंका रहती है।
झारखंड में अधिकारियों की कमी के बीच यह भी जरूरी है कि विभाग अपनी मौजूदा मानव संसाधन क्षमता का बेहतर इस्तेमाल करे। तकनीक के इस्तेमाल, डिजिटल मॉनिटरिंग, ऑनलाइन केस ट्रैकिंग और डेटा आधारित पुलिसिंग से अधिकारियों का कुछ प्रशासनिक बोझ कम किया जा सकता है। इससे वे फील्ड और गंभीर अपराधों की निगरानी पर अधिक समय दे सकेंगे।
पुलिस अधिकारियों की लगातार सेवानिवृत्ति का मुद्दा इसलिए भी महत्वपूर्ण है क्योंकि पुलिस विभाग किसी भी राज्य की कानून-व्यवस्था की रीढ़ होता है। आम नागरिक की सुरक्षा, अपराध पर नियंत्रण और किसी घटना के बाद त्वरित कार्रवाई की जिम्मेदारी पुलिस पर ही होती है। ऐसे में अधिकारियों की कमी को लंबे समय तक नजरअंदाज करना मुश्किल हो सकता है।
फिलहाल आठ महीने में करीब 40 डीएसपी और इंस्पेक्टर स्तर के अधिकारियों के रिटायर होने के बाद विभाग के सामने तत्काल चुनौती खाली पदों को भरने और उपलब्ध अधिकारियों के बीच जिम्मेदारियों का संतुलन बनाने की है। सोमवार को 1994 बैच के पांच अधिकारियों की सेवानिवृत्ति ने भी यह दिखाया कि अनुभवी अफसरों की एक पूरी पीढ़ी धीरे-धीरे सेवा से बाहर हो रही है।
ऐसे में झारखंड पुलिस को एक साथ कई मोर्चों पर काम करना होगा। खाली पदों पर जल्द नियुक्ति, समय पर पदोन्नति, अधिकारियों का प्रशिक्षण, फील्ड पोस्टिंग में संतुलन और नई तकनीक का इस्तेमाल इसके प्रमुख हिस्से हो सकते हैं। यदि इन स्तरों पर समय रहते कदम उठाए जाते हैं तो अधिकारियों की कमी का असर कम किया जा सकता है। लेकिन यदि रिटायरमेंट की रफ्तार बनी रही और नई नियुक्तियों व पदोन्नति की प्रक्रिया धीमी रही तो आने वाले समय में पुलिस अधिकारियों पर काम का दबाव और बढ़ सकता है।
शहरों में अपराध नियंत्रण से लेकर ग्रामीण क्षेत्रों में कानून-व्यवस्था बनाए रखने तक पुलिस अफसरों की भूमिका महत्वपूर्ण है। ऐसे में 40 अधिकारियों के रिटायर होने से बने खालीपन को केवल अतिरिक्त प्रभार देकर लंबे समय तक नहीं संभाला जा सकता। विभाग को स्थायी समाधान की दिशा में तेजी से कदम उठाने होंगे। आम लोगों की सुरक्षा और राज्य में कानून-व्यवस्था को प्रभावी बनाए रखने के लिए पर्याप्त संख्या में अनुभवी पुलिस अधिकारियों की उपलब्धता जरूरी है। झारखंड पुलिस के सामने अब यही सबसे बड़ी चुनौती है कि रिटायरमेंट से पैदा हुई कमी को जल्द पूरा किया जाए, ताकि थानों से लेकर जिला स्तर तक पुलिसिंग की व्यवस्था पर इसका प्रतिकूल असर न पड़े।








