कानपुर में नगर भूमि सीलिंग विभाग के एक पूर्व अवर अभियंता और लिपिक पर 500 बीघा सरकारी सीलिंग भूमि को अवैध रूप से मुक्त करने का आरोप लगा है। करीब एक हजार करोड़ रुपये मूल्य की इस जमीन को दोबारा सीलिंग में लाने के लिए जिलाधिकारी ने शासन को पत्र भेजा है।
कानपुर: उत्तर प्रदेश के कानपुर में नगर भूमि सीलिंग विभाग से जुड़ा एक बड़ा भूमि घोटाला सामने आया है। आरोप है कि विभाग में करीब 29 वर्षों तक तैनात रहे एक अवर अभियंता (जेई) और एक लिपिक ने नियमों की अनदेखी करते हुए लगभग 500 बीघा सरकारी सीलिंग भूमि को अवैध रूप से मुक्त कर दिया। प्रारंभिक जांच में इस जमीन की मौजूदा बाजार कीमत करीब एक हजार करोड़ रुपये आंकी गई है। मामले के सामने आने के बाद जिलाधिकारी ने जमीन को दोबारा सरकारी सीलिंग में शामिल करने की प्रक्रिया शुरू करने के लिए शासन को पत्र भेजा है।
29 साल तक चलता रहा जमीन मुक्त कराने का खेल
प्रारंभिक जांच के अनुसार नगर भूमि सीलिंग विभाग के रानीघाट कार्यालय में वर्ष 1992 से 2021 तक तैनात रहे अवर अभियंता अशोक मिश्र और लिपिक संजीव सक्सेना पर सरकारी भूमि को नियमों के विपरीत सीलिंग से मुक्त करने का आरोप है। बताया जा रहा है कि जिलाधिकारी और शासन की मंजूरी के बिना ही अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) जारी किए गए, जिसके आधार पर सरकारी भूमि को दोबारा निजी खातों में दर्ज करा दिया गया।

प्रशासन का अनुमान है कि इस प्रक्रिया में लगभग 500 बीघा सरकारी भूमि प्रभावित हुई, जिसकी वर्तमान बाजार कीमत करीब एक हजार करोड़ रुपये है।
कई इलाकों की सरकारी जमीन हुई प्रभावित
जांच में सामने आया है कि नौबस्ता, नगवां, उचटी, मसवानपुर और बिनगवां जैसे क्षेत्रों की सरकारी सीलिंग भूमि को निरसन अधिनियम, 1999 की धारा 3(2) का लाभ देकर दोबारा भूमिधरों के नाम दर्ज कराया गया। आरोप है कि बाद में इन जमीनों का बड़ा हिस्सा भूमाफियाओं द्वारा बेच भी दिया गया।
प्रशासन का मानना है कि यदि समय रहते कार्रवाई नहीं होती तो सरकारी संपत्ति को और अधिक नुकसान हो सकता था।
फाइलें गायब होने से खुला पूरा मामला
इस पूरे मामले का खुलासा तब हुआ जब वर्ष 2024 में लिपिक संजीव सक्सेना के सेवानिवृत्त होने के बाद नए कर्मचारी को चार्ज सौंपने के दौरान जरूरी दस्तावेज उपलब्ध नहीं कराए गए। जांच में कई मूल फाइलें और अभिलेख गायब मिले।
इसके बाद अप्रैल 2026 में एडीएम वित्त एवं राजस्व विवेक कुमार चतुर्वेदी की शिकायत पर कोतवाली थाने में लिपिक के खिलाफ मुकदमा दर्ज कराया गया। प्रशासन अब गायब दस्तावेजों की तलाश के साथ पूरे प्रकरण की विस्तृत जांच कर रहा है।
जिलाधिकारी ने शासन को भेजा प्रस्ताव
कानपुर के जिलाधिकारी जितेंद्र प्रताप सिंह ने प्रमुख सचिव, आवास एवं शहरी नियोजन विभाग को पत्र लिखकर अवैध रूप से मुक्त की गई भूमि को दोबारा सरकारी सीलिंग में शामिल करने का आदेश जारी करने का अनुरोध किया है। अधिकारियों का कहना है कि जांच पूरी होने के बाद दोषी पाए जाने वाले सभी लोगों के खिलाफ नियमानुसार कार्रवाई की जाएगी।
प्रशासन यह भी जांच कर रहा है कि इस पूरे मामले में किन-किन लोगों की भूमिका रही और सरकारी जमीन के हस्तांतरण से किसे लाभ पहुंचा।
क्या है सीलिंग भूमि अधिनियम?
शहरी भूमि (सीलिंग एवं विनियमन) अधिनियम, 1976 के तहत शहरों में किसी व्यक्ति के पास निर्धारित सीमा से अधिक भूमि रखने की अनुमति नहीं थी। निर्धारित सीमा से अधिक जमीन सरकार अपने कब्जे में लेकर उसे सीलिंग भूमि घोषित करती थी। वर्ष 1999 में अधिनियम निरस्त होने के बाद भी पहले से सरकार में निहित भूमि पर विशेष कानूनी प्रावधान लागू रहे। इसी व्यवस्था का कथित तौर पर दुरुपयोग कर कानपुर में सरकारी भूमि को अवैध रूप से निजी स्वामित्व में दर्ज कराने का मामला सामने आया है।











