किडनी गैंग के 15 चेहरे बेनकाब, 8वीं पास दलाल से लेकर IMA पदाधिकारी तक शामिल, ऐसे चलता था पूरा सिंडिकेट

कानपुर में किडनी रैकेट का बड़ा खुलासा। 15 आरोपी सामने आए, जिनमें IMA से जुड़ी प्रीति आहूजा भी शामिल। जानिए कैसे काम करता था पूरा सिंडिकेट।
किडनी गैंग के 15 चेहरे बेनकाब, 8वीं पास दलाल से लेकर IMA पदाधिकारी तक शामिल, ऐसे चलता था पूरा सिंडिकेट
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कानपुर में सामने आए किडनी रैकेट ने पूरे स्वास्थ्य तंत्र और समाज को झकझोर कर रख दिया है। इस मामले में अब तक 15 ऐसे चेहरे सामने आए हैं, जो इस अवैध कारोबार का हिस्सा थे। हैरान करने वाली बात यह है कि इस गिरोह में एक तरफ जहां महज 8वीं पास दलाल शामिल था, वहीं दूसरी ओर समाज में प्रतिष्ठित मानी जाने वाली Indian Medical Association से जुड़ी पदाधिकारी प्रीति आहूजा का नाम भी सामने आया है। इस खुलासे के बाद पूरे मामले ने और भी सनसनीखेज रूप ले लिया है।

जांच में पता चला है कि यह सिंडिकेट बेहद सुनियोजित और संगठित तरीके से काम करता था। इस गिरोह के सदस्य अलग-अलग भूमिकाओं में बंटे हुए थे, जिसमें दलाल, डॉक्टर, अस्पताल से जुड़े लोग और अन्य सहयोगी शामिल थे। सबसे निचले स्तर पर काम करने वाले दलाल गरीब और जरूरतमंद लोगों को निशाना बनाते थे। उन्हें पैसों का लालच देकर किडनी बेचने के लिए तैयार किया जाता था। कई मामलों में लोगों को पूरी सच्चाई तक नहीं बताई जाती थी और उन्हें झूठे बहानों से ऑपरेशन के लिए राजी किया जाता था।

इस पूरे नेटवर्क का सबसे खतरनाक पहलू यह था कि इसमें शामिल कुछ लोग समाज में अच्छी छवि रखते थे, जिससे किसी को भी उन पर आसानी से शक नहीं होता था। प्रीति आहूजा जैसी पदाधिकारी का नाम सामने आने से यह साफ हो गया है कि यह रैकेट कितनी गहराई तक फैला हुआ था। बताया जा रहा है कि नेटवर्क में शामिल लोग मरीजों और डोनर के बीच कड़ी का काम करते थे और पूरे ऑपरेशन को बेहद गोपनीय तरीके से अंजाम दिया जाता था।

सिंडिकेट के काम करने का तरीका भी काफी चौंकाने वाला था। पहले दलाल संभावित डोनर की तलाश करते थे, जो आर्थिक रूप से कमजोर होते थे। इसके बाद उन्हें बेहतर जीवन का सपना दिखाकर और मोटी रकम का लालच देकर तैयार किया जाता था। फिर मेडिकल जांच के नाम पर उन्हें अस्पताल ले जाया जाता था, जहां पहले से ही सेटिंग के तहत प्रक्रिया पूरी की जाती थी। ऑपरेशन के बाद डोनर को तय रकम से कम पैसा देकर छोड़ दिया जाता था, जबकि इस पूरे सौदे में लाखों रुपए का लेन-देन होता था।

जांच एजेंसियों को यह भी पता चला है कि इस रैकेट में फर्जी दस्तावेजों का इस्तेमाल किया जाता था। डोनर और रिसीवर के बीच रिश्तेदारी दिखाने के लिए नकली कागजात तैयार किए जाते थे, ताकि कानूनी प्रक्रिया को आसानी से पार किया जा सके। इसके लिए अलग से लोगों की टीम काम करती थी, जो कागजों को वैध दिखाने का काम करती थी।

इस पूरे मामले के सामने आने के बाद स्वास्थ्य विभाग और प्रशासन में हड़कंप मच गया है। पुलिस और जांच एजेंसियां अब इस नेटवर्क की जड़ तक पहुंचने की कोशिश कर रही हैं। कई आरोपियों को हिरासत में लेकर पूछताछ की जा रही है और उनके मोबाइल, बैंक ट्रांजैक्शन और अन्य रिकॉर्ड खंगाले जा रहे हैं। माना जा रहा है कि यह रैकेट सिर्फ एक शहर तक सीमित नहीं था, बल्कि इसका नेटवर्क कई अन्य शहरों और राज्यों तक फैला हो सकता है।

इस खुलासे ने यह भी साबित कर दिया है कि अवैध अंग व्यापार जैसे गंभीर अपराध को अंजाम देने के लिए अपराधी किस हद तक जा सकते हैं और कैसे समाज के अलग-अलग स्तरों के लोग इसमें शामिल हो जाते हैं। अब सभी की नजर इस बात पर टिकी है कि जांच एजेंसियां इस मामले में और किन-किन लोगों को बेनकाब करती हैं और इस पूरे सिंडिकेट को किस हद तक तोड़ा जा सकता है।

फिलहाल पुलिस का कहना है कि यह जांच अभी शुरुआती चरण में है और आने वाले दिनों में और भी बड़े खुलासे हो सकते हैं। इस मामले ने एक बार फिर स्वास्थ्य व्यवस्था की निगरानी और पारदर्शिता पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, साथ ही जरूरतमंद लोगों की सुरक्षा को लेकर भी चिंता बढ़ा दी है।

 

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