कर्नाटक में सरकारी कार्यक्रमों में वंदे मातरम के सिर्फ दो अंतरे गाए जाएंगे

कर्नाटक CM डीके शिवकुमार ने कहा कि सरकारी कार्यक्रमों में वंदे मातरम के केवल शुरुआती दो अंतरे गाए जाएंगे। जानिए कांग्रेस का फैसला और केंद्र के नियम।

कर्नाटक के मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने कहा कि सरकारी और सार्वजनिक कार्यक्रमों में वंदे मातरम के केवल शुरुआती दो अंतरे गाए जाएंगे। उन्होंने कांग्रेस के फैसले का समर्थन करते हुए कहा कि सरकार पार्टी की विचारधारा और तय रुख के साथ मजबूती से खड़ी है।

बेंगलुरु: कर्नाटक में वंदे मातरम के पूर्ण गायन को लेकर राजनीतिक विवाद एक नए चरण में पहुंच गया है। मुख्यमंत्री डीके शिवकुमार ने स्पष्ट किया है कि राज्य के सरकारी और सार्वजनिक कार्यक्रमों में राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम के केवल शुरुआती दो अंतरे गाए जाएंगे। उन्होंने कहा कि उनकी सरकार इस मामले में कांग्रेस के फैसले और पार्टी की विचारधारा के साथ खड़ी है। शिवकुमार ने यह बयान 26 अगस्त 2026 को इंडिया टुडे के एक कार्यक्रम में दिया।

डीके शिवकुमार ने क्या कहा?

डीके शिवकुमार ने कहा कि वह अपनी पार्टी की विचारधारा में विश्वास करते हैं और पार्टी ने जो फैसला किया है, वह उस पर कायम हैं। उन्होंने बताया कि स्वतंत्रता दिवस के एक कार्यक्रम में वंदे मातरम का पूरा संस्करण उनकी जानकारी के बिना गाया गया था। उनके अनुसार, भविष्य में कर्नाटक के सरकारी कार्यक्रमों में कांग्रेस के तय रुख के अनुसार केवल शुरुआती दो अंतरे ही गाए जाएंगे।

मुख्यमंत्री ने यह भी कहा कि कर्नाटक विविधताओं वाला राज्य और भारत विविध समुदायों वाला देश है। उन्होंने भाजपा पर तुष्टीकरण की राजनीति करने का आरोप लगाया और कहा कि कांग्रेस सभी वर्गों को साथ लेकर चलने में विश्वास करती है। यह बयान ऐसे समय आया है, जब वंदे मातरम के गायन को लेकर कांग्रेस और भाजपा के बीच राजनीतिक टकराव तेज है।

कांग्रेस वर्किंग कमेटी का फैसला क्या है?

विवाद की पृष्ठभूमि में कांग्रेस वर्किंग कमेटी यानी CWC का 19 अगस्त का फैसला महत्वपूर्ण है। कांग्रेस की शीर्ष निर्णय लेने वाली संस्था ने स्पष्ट किया कि पार्टी के कार्यक्रमों में वंदे मातरम के केवल पहले दो अंतरे गाए जाएंगे। पार्टी ने अपने फैसले को 1937 में लिए गए कांग्रेस के निर्णय से जोड़ते हुए कहा कि वह ऐतिहासिक परंपरा का पालन कर रही है।

कांग्रेस नेताओं का तर्क है कि स्वतंत्रता आंदोलन के दौर में महात्मा गांधी, जवाहरलाल नेहरू, रवींद्रनाथ टैगोर, सुभाष चंद्र बोस और सरदार वल्लभभाई पटेल समेत तत्कालीन शीर्ष नेताओं के बीच वंदे मातरम के सार्वजनिक गायन को लेकर एक विशेष व्यवस्था बनी थी। कांग्रेस का कहना है कि उसके कार्यक्रमों में शुरुआती दो अंतरे गाने की परंपरा उसी ऐतिहासिक फैसले से जुड़ी है।

15 अगस्त के कार्यक्रम के बाद शुरू हुआ विवाद

वंदे मातरम को लेकर मौजूदा राजनीतिक विवाद 15 अगस्त के स्वतंत्रता दिवस कार्यक्रमों के बाद तेज हुआ। भाजपा ने कांग्रेस पर राष्ट्रीय गीत के अपमान का आरोप लगाया। भाजपा नेताओं ने कांग्रेस मुख्यालय में हुए कार्यक्रम के वीडियो को लेकर सवाल उठाए और आरोप लगाया कि पार्टी नेतृत्व पूरे गीत के गायन को लेकर असहज था।

कांग्रेस ने इन आरोपों को खारिज किया। पार्टी की ओर से कहा गया कि कांग्रेस मुख्यालय में वंदे मातरम का पूरा गायन हुआ था और इसे रोकने की कोई कोशिश नहीं की गई। कांग्रेस महासचिव जयराम रमेश ने भाजपा के आरोपों को गलत बताते हुए कहा था कि सोनिया गांधी का इशारा गीत रोकने के लिए नहीं, बल्कि लंबे समय से खड़े कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे के लिए कुर्सी की व्यवस्था कराने से संबंधित था।

इसके बाद विवाद पार्टी कार्यक्रमों से आगे बढ़कर सरकारी कार्यक्रमों में राष्ट्रीय गीत के स्वरूप और केंद्र सरकार की नई गाइडलाइन तक पहुंच गया।

केंद्र सरकार ने वंदे मातरम के लिए क्या दिशा-निर्देश दिए?

केंद्र सरकार ने 2026 में वंदे मातरम के आधिकारिक गायन को लेकर नए दिशा-निर्देश जारी किए। गृह मंत्रालय की 28 जनवरी 2026 की गाइडलाइन में राष्ट्रीय गीत के छह अंतरों वाले आधिकारिक संस्करण को लेकर प्रोटोकॉल निर्धारित किया गया। आधिकारिक पूर्ण संस्करण की अवधि लगभग 3 मिनट 10 सेकंड बताई गई है।

इसके बाद आकाशवाणी ने भी 26 मार्च 2026 से वंदे मातरम के छह-अंतरे वाले पूर्ण संस्करण का प्रसारण शुरू किया। इससे पहले आकाशवाणी के सुबह के प्रसारण में आम तौर पर शुरुआती दो अंतरे वाला लगभग 65 सेकंड का संस्करण इस्तेमाल होता था। सरकार के नए निर्देश के बाद पूर्ण संस्करण को आधिकारिक प्रसारण में शामिल किया गया।

सरकारी प्रोटोकॉल के अनुसार, जब किसी आधिकारिक समारोह में वंदे मातरम और राष्ट्रगान दोनों प्रस्तुत किए जाते हैं, तो पहले राष्ट्रीय गीत और उसके बाद राष्ट्रगान प्रस्तुत किया जाता है। सरकारी कार्यक्रमों में तय प्रोटोकॉल और आधिकारिक संस्करण के पालन पर जोर दिया गया है।

वंदे मातरम को कानूनी सुरक्षा भी मिली

वंदे मातरम से जुड़े विवाद के बीच संसद ने Prevention of Insults to National Honour (Amendment) Bill, 2026 पारित किया। विधेयक राज्यसभा से 29 जुलाई और लोकसभा से 30 जुलाई को पारित हुआ। बाद में यह संशोधन कानून बना और राष्ट्रीय गीत को भी राष्ट्रीय गान के समान कानूनी संरक्षण के दायरे में लाया गया।

कानून में यह प्रावधान किया गया है कि जो व्यक्ति जानबूझकर राष्ट्रीय गीत के गायन को रोकता है या ऐसे गायन में शामिल सभा में व्यवधान पैदा करता है, उसे तीन साल तक की जेल, जुर्माना या दोनों की सजा हो सकती है। कानून का केंद्र बिंदु जानबूझकर गायन रोकना या सभा में बाधा डालना है।

महत्वपूर्ण बात यह है कि कानून में यह स्पष्ट नहीं किया गया है कि वंदे मातरम के सभी छह अंतरे नहीं गाने मात्र से कोई व्यक्ति अपराध का दोषी हो जाएगा। कानूनी प्रावधान मुख्य रूप से गायन रोकने या गायन में बाधा डालने की कार्रवाई को दंडनीय बनाता है। इसलिए दो अंतरे गाने और जानबूझकर गायन रोकने के बीच कानूनी अंतर समझना जरूरी है।

भाजपा और कांग्रेस के बीच बढ़ी राजनीतिक खींचतान

कांग्रेस के दो अंतरे गाने के फैसले के बाद भाजपा ने पार्टी पर राजनीतिक तुष्टीकरण और राष्ट्रीय भावना से जुड़े मुद्दे पर समझौता करने का आरोप लगाया है। केंद्रीय गृह मंत्री अमित शाह ने भी कांग्रेस के फैसले की आलोचना की और इसे तुष्टीकरण की राजनीति से जोड़ा।

कांग्रेस दूसरी ओर इसे अपने ऐतिहासिक निर्णय और पार्टी की विचारधारा से जोड़ रही है। पार्टी का कहना है कि शुरुआती दो अंतरों का गायन किसी नए फैसले का परिणाम नहीं है, बल्कि 1937 में तय की गई परंपरा के अनुरूप है।

कर्नाटक के फैसले का क्या असर होगा?

डीके शिवकुमार के बयान के बाद कर्नाटक इस विवाद में एक महत्वपूर्ण राज्य बन गया है। केंद्र सरकार के आधिकारिक प्रोटोकॉल और कांग्रेस के राजनीतिक कार्यक्रमों के लिए तय दो-अंतरे वाले रुख के बीच अंतर अब सार्वजनिक बहस का प्रमुख विषय बन गया है।

फिलहाल शिवकुमार ने स्पष्ट कर दिया है कि कर्नाटक सरकार कांग्रेस के फैसले के अनुरूप सरकारी और सार्वजनिक कार्यक्रमों में वंदे मातरम के केवल शुरुआती दो अंतरे गाने के पक्ष में है। इससे आने वाले दिनों में केंद्र और कांग्रेस शासित राज्यों के बीच प्रोटोकॉल, राष्ट्रीय प्रतीकों और राजनीतिक अधिकार क्षेत्र को लेकर बहस और तेज होने की संभावना है।

वंदे मातरम भारत के स्वतंत्रता आंदोलन और राष्ट्रीय इतिहास से गहराई से जुड़ा गीत है। इसलिए इसके गायन का स्वरूप केवल सांस्कृतिक या प्रशासनिक विषय नहीं रह गया है, बल्कि अब यह राजनीतिक और कानूनी बहस का भी हिस्सा बन चुका है। कर्नाटक का ताजा फैसला इसी व्यापक राष्ट्रीय विवाद की अगली कड़ी माना जा रहा है।

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