वाराणसी में आयोजित संस्कृति संसद के दौरान शंकराचार्य नरेंद्रानंद सरस्वती ने भगवान श्रीकृष्ण को लेकर की गई टिप्पणी पर कड़ी नाराजगी जताई। उन्होंने कहा कि भगवान श्रीकृष्ण पर इस तरह की टिप्पणी करने वाला व्यक्ति मूर्ख है। किसी भी कथावाचक को धार्मिक मंच से अनर्गल और अमर्यादित बातें बोलने का अधिकार नहीं है। धर्म और आस्था से जुड़े विषयों पर बोलते समय हर व्यक्ति को अपनी भाषा और मर्यादा का ध्यान रखना चाहिए।
शंकराचार्य नरेंद्रानंद सरस्वती ने कहा कि कथावाचन केवल लोगों को कथा सुनाने तक सीमित नहीं है बल्कि इसके माध्यम से समाज को धार्मिक और नैतिक शिक्षा भी दी जाती है। ऐसे में कथावाचकों की जिम्मेदारी और बढ़ जाती है। उन्हें अपने शब्दों का चयन सोच-समझकर करना चाहिए ताकि किसी की धार्मिक भावनाएं आहत न हों। उन्होंने स्पष्ट किया कि भगवान श्रीकृष्ण जैसे आराध्य के बारे में बिना उचित समझ और मर्यादा के टिप्पणी करना स्वीकार नहीं किया जा सकता।
उनका यह बयान भगवान श्रीराम और श्रीकृष्ण को लेकर हाल में की गई एक कथावाचक की टिप्पणी के बाद सामने आया है। इस टिप्पणी को लेकर धार्मिक जगत में प्रतिक्रिया देखने को मिली है। विवाद बढ़ने के बाद संबंधित कथावाचक की ओर से माफी भी मांगी गई है। इसके बावजूद संत समाज के कुछ लोगों ने धार्मिक मंचों पर इस्तेमाल की जाने वाली भाषा और कथावाचकों की जिम्मेदारी को लेकर सवाल उठाए हैं।
काशी के सिगरा स्थित रुद्राक्ष अंतरराष्ट्रीय सहयोग एवं कन्वेंशन सेंटर में 3 से 5 नवंबर तक संस्कृति संसद का आयोजन किया जा रहा है। इस कार्यक्रम में देशभर से संतों और धर्माचार्यों के साथ विद्वानों वैज्ञानिकों कलाकारों और युवाओं के शामिल होने की जानकारी दी गई है। आयोजन का उद्देश्य भारतीय संस्कृति सनातन परंपरा और सामाजिक मूल्यों से जुड़े विषयों पर विचार-विमर्श करना है।
संस्कृति संसद में इस बार युवाओं की भागीदारी पर भी विशेष जोर दिया गया है। कार्यक्रम के तहत जेन-जी कॉन्क्लेव आयोजित किया जा रहा है जिसमें युवा अपनी जिज्ञासाएं और सवाल रख सकेंगे। संतों और विशेषज्ञों के माध्यम से नई पीढ़ी को भारतीय संस्कृति और परंपराओं से जुड़े विषयों पर जानकारी देने की योजना है। आयोजन में सांस्कृतिक प्रस्तुतियों के साथ कला और फोटोग्राफी से जुड़ी प्रदर्शनियां भी रखी गई हैं।
संस्कृति संसद में धार्मिक परंपराओं के साथ बदलते सामाजिक परिवेश और नई पीढ़ी की सोच पर भी चर्चा हो रही है। इस दौरान शंकराचार्य नरेंद्रानंद सरस्वती का बयान कथावाचकों की जिम्मेदारी और धार्मिक मंचों की मर्यादा को लेकर चर्चा का विषय बन गया है। उनका कहना है कि धर्म से जुड़े लोगों को अपनी बात रखते समय संयम और जिम्मेदारी का परिचय देना चाहिए।











