जीवन में अक्सर ऐसा होता है कि हमें सफलता पाने के लिए जिस रास्ते पर चलना होता है, वह बहुत कठिन और कांटों भरा लगता है। कई बार लोग हमारे सपनों का मजाक उड़ाते हैं और हमें रोकने की कोशिश करते हैं। लेकिन इतिहास गवाह है कि जिसने भी अपनी धुन और मेहनत पर भरोसा रखा है, उसने पत्थर को भी पिघलाकर पानी बना दिया है। यह कहानी हमें सिखाती है कि कैसे 'दृढ़ संकल्प' और 'नजरिया' किसी भी साधारण चीज को असाधारण बना सकते हैं।
कहानी
बहुत समय पहले की बात है, भारतवर्ष के एक प्राचीन राज्य 'विजयनगर' में मूर्तिकला की एक बड़ी प्रतियोगिता आयोजित की गई। राजा ने घोषणा की कि जो भी मूर्तिकार राज्य के लिए सबसे जीवंत और अद्भुत मूर्ति बनाएगा, उसे शाही मूर्तिकार नियुक्त किया जाएगा और मुंहमांगी धनराशि दी जाएगी।
दूर-दूर से बेहतरीन कलाकार राजमहल के मैदान में जमा हुए। वहां कई प्रकार के कीमती पत्थर रखे गए थे—सफेद संगमरमर, काले ग्रेनाइट और चमकदार स्फटिक। सभी कलाकारों ने दौड़कर सबसे अच्छे, चिकने और बेदाग पत्थर चुन लिए।
उसी भीड़ में एक युवा मूर्तिकार था जिसका नाम था 'सोमेश'। सोमेश गरीब था और उसके पास महंगे औजार भी नहीं थे, लेकिन उसकी आंखों में एक चमक थी। जब उसकी बारी आई, तो वहां कोई भी अच्छा पत्थर नहीं बचा था। कोने में एक बहुत ही भद्दा, टेढ़ा-मेढ़ा और खुरदरा पत्थर पड़ा था, जिसे देखकर लग रहा था कि वह किसी चट्टान से टूटकर गिरा है। बाकी कलाकारों ने उस पत्थर को बेकार समझकर छोड़ दिया था।
सोमेश ने उस पत्थर को ध्यान से देखा, उसके चारों ओर घूमा और मुस्कुराते हुए कहा, "मैं इसी पत्थर पर काम करूँगा।"
बाकी कलाकार जोर-जोर से हंसने लगे। एक ने कहा, "अरे मूर्ख! इस पत्थर में इतनी दरारें हैं और यह इतना कठोर है कि तेरी छेनी टूट जाएगी, पर मूर्ति नहीं बनेगी। हार मान ले!" लेकिन सोमेश ने किसी की नहीं सुनी।
काम शुरू हुआ। जहाँ दूसरे कलाकार आसानी से अपने मुलायम पत्थरों को तराश रहे थे, वहीं सोमेश को उस कठोर पत्थर से एक छोटा सा टुकड़ा हटाने में भी घंटों पसीना बहाना पड़ रहा था। कई बार उसके हाथों में छाले पड़े, कई बार उसकी छेनी फिसली और उसे चोट लगी। रात को जब सब सो जाते, सोमेश तब भी मशाल की रोशनी में काम करता रहता।
दिन बीतते गए। अन्य कलाकारों की मूर्तियां तैयार हो गईं। किसी ने सुंदर नर्तकी बनाई थी, तो किसी ने वीर योद्धा। वे सब बहुत सुंदर थीं। लेकिन सोमेश की मूर्ति अभी भी एक कपड़े से ढकी हुई थी।
प्रतियोगिता का अंतिम दिन आया। राजा ने एक-एक करके सभी मूर्तियों को देखा और उनकी प्रशंसा की। अंत में वे सोमेश के पास पहुंचे। राजा ने पूछा, "सुना है तुमने सबसे बेकार पत्थर चुना था? दिखाओ तुमने क्या बनाया है?"
सोमेश ने जैसे ही कपड़ा हटाया, पूरा दरबार शांत हो गया।
वहां कोई साधारण राजा या देवता की मूर्ति नहीं थी। सोमेश ने उस टेढ़े-मेढ़े पत्थर की स्वाभाविक बनावट का उपयोग करके एक 'वृद्ध किसान' की मूर्ति बनाई थी। पत्थर की खुरदरी सतह को उसने किसान की झुर्रियों वाली त्वचा में बदल दिया था। पत्थर का जो हिस्सा काला और कठोर था, उसे उसने किसान के मेहनती और फटे हुए पैरों का रूप दे दिया था। और उस किसान के कंधे पर एक छोटा सा बच्चा बैठा था जो आसमान की तरफ देख रहा था।
मूर्ति इतनी जीवंत थी कि लग रहा था वह किसान अभी बोल पड़ेगा। उस मूर्ति में उस खुरदरे पत्थर का हर दोष एक 'विशेषता' बन गया था।
सोमेश ने हाथ जोड़कर कहा, 'महाराज, लोग पत्थर की चिकनाई देखते हैं, मैंने उसके भीतर छिपी कहानी देखी। यह खुरदरापन ही संघर्ष है, और यह बच्चा भविष्य की उम्मीद है।'
राजा की आँखों में आँसू आ गए। उन्होंने कहा, "बाकी कलाकारों ने पत्थर को अपने हिसाब से बदला, लेकिन तुमने पत्थर की कमियों को ही उसकी ताकत बना दिया।"
सोमेश को प्रतियोगिता का विजेता घोषित किया गया। जिस पत्थर को दुनिया ने कचरा समझकर ठुकरा दिया था, सोमेश की मेहनत और नजरिए ने उसे राज्य की सबसे कीमती धरोहर बना दिया।
कहानी से सीख
इस कहानी से हमें तीन बहुत महत्वपूर्ण सीख मिलती हैं:
नजरिया ही सब कुछ है: दुनिया जिसे 'कमी' या 'कमजोरी' कहती है (जैसे वह खुरदरा पत्थर), एक पारखी नजर उसे 'ताकत' में बदल सकती है। हमें संसाधनों के अभाव का रोना रोने के बजाय उपलब्ध साधनों का सर्वश्रेष्ठ उपयोग करना चाहिए।
मेहनत का कोई विकल्प नहीं: सोमेश जानता था कि उसका पत्थर कठिन है, इसलिए उसने दूसरों से दोगुनी मेहनत की। जब परिस्थितियां कठिन हों, तो मेहनत भी दोगुनी करनी पड़ती है।
भीड़ से अलग सोचना: जब सब आसान रास्ता (चिकने पत्थर) चुन रहे थे, सोमेश ने मुश्किल रास्ता चुना क्योंकि वह जानता था कि साधारण रास्ते से असाधारण मंजिल नहीं मिलती।












