उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश ने किशाऊ जलविद्युत एवं सिंचाई परियोजना के संशोधित डिजाइन पर सहमति बना ली है। नए स्वरूप में बांध की ऊंचाई थोड़ी कम की गई है, लेकिन जल भंडारण क्षमता और वार्षिक बिजली उत्पादन बढ़ाया गया है।
देहरादून: लंबे समय से लंबित किशाऊ जलविद्युत एवं सिंचाई परियोजना को लेकर बड़ा कदम आगे बढ़ा है। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश सरकारों ने परियोजना के नए डिजाइन पर सहमति दे दी है। संशोधित योजना के तहत बांध की ऊंचाई में मामूली कमी की गई है, जबकि जल संग्रहण क्षमता और वार्षिक बिजली उत्पादन को पहले से अधिक प्रभावी बनाया गया है।
छह दशक पुरानी परियोजना को मिली नई दिशा
करीब 60 वर्षों से विभिन्न स्तरों पर लंबित किशाऊ जलविद्युत एवं सिंचाई परियोजना अब नए स्वरूप में आगे बढ़ने की ओर बढ़ रही है। उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश के बीच परियोजना के संशोधित डिजाइन को लेकर सहमति बनने के बाद इसके क्रियान्वयन की उम्मीदें तेज हो गई हैं। यह परियोजना यमुना नदी पर विकसित की जानी है और इसे उत्तर भारत की महत्वपूर्ण बहुउद्देश्यीय परियोजनाओं में गिना जाता है।
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नई डीपीआर (विस्तृत परियोजना रिपोर्ट) में कई तकनीकी बदलाव किए गए हैं, जिनका उद्देश्य परियोजना को अधिक सुरक्षित, उपयोगी और ऊर्जा दक्ष बनाना है। केंद्रीय जल आयोग और केंद्रीय विद्युत प्राधिकरण भी इन बदलावों को मंजूरी दे चुके हैं। हालांकि संशोधित लागत और कुछ अन्य अंतिम स्वीकृतियां अभी केंद्र सरकार के स्तर पर लंबित हैं।
टिहरी के बाद दूसरा सबसे ऊंचा बांध
संशोधित डिजाइन के अनुसार किशाऊ बांध की ऊंचाई 232.6 मीटर निर्धारित की गई है। हालांकि पहले प्रस्तावित ऊंचाई 236 मीटर थी, लेकिन भूगर्भीय और भूकंपीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए इसमें कमी की गई है।
इसके बावजूद यह बांध उत्तराखंड के टिहरी बांध के बाद देश का दूसरा सबसे ऊंचा बांध होगा। टिहरी बांध की ऊंचाई 260.5 मीटर है। विशेषज्ञों का मानना है कि ऊंचाई में मामूली कमी से निर्माण संबंधी जोखिम कम होंगे और परियोजना की सुरक्षा बढ़ेगी।
जल भंडारण क्षमता में बड़ा इजाफा
परियोजना की सबसे बड़ी विशेषता इसकी बढ़ी हुई जल भंडारण क्षमता है। नई डीपीआर के अनुसार जलाशय की जीवंत भंडारण क्षमता 1324 मिलियन क्यूबिक मीटर से बढ़ाकर 1561.91 मिलियन क्यूबिक मीटर कर दी गई है। इसका मतलब है कि पहले की तुलना में लगभग 237.81 मिलियन क्यूबिक मीटर अतिरिक्त पानी संग्रहित किया जा सकेगा।
यदि इसे लीटर में देखा जाए तो परियोजना में लगभग 23,781 करोड़ लीटर अतिरिक्त पानी का भंडारण संभव होगा। इससे मानसून के दौरान अतिरिक्त जल को संरक्षित कर सूखे मौसम में सिंचाई, पेयजल आपूर्ति और नदी प्रवाह प्रबंधन के लिए उपयोग किया जा सकेगा। यमुना बेसिन के राज्यों को भी इसका सीधा लाभ मिलने की उम्मीद है।
कम क्षमता वाले प्लांट से अधिक बिजली उत्पादन
परियोजना के बिजली उत्पादन मॉडल में भी महत्वपूर्ण बदलाव किया गया है। पहले इसकी स्थापित क्षमता 660 मेगावाट प्रस्तावित थी, जिसे घटाकर 422 मेगावाट कर दिया गया है। पहली नजर में यह कमी दिखाई देती है, लेकिन तकनीकी सुधारों के कारण वार्षिक बिजली उत्पादन में वृद्धि दर्ज की गई है।
नई योजना के तहत औसत वार्षिक ऊर्जा उत्पादन 1379 मिलियन यूनिट से बढ़ाकर 1457 मिलियन यूनिट कर दिया गया है। यानी हर वर्ष लगभग 78 मिलियन यूनिट अतिरिक्त बिजली का उत्पादन होगा। विशेषज्ञों के अनुसार यह बदलाव जल संसाधनों के अधिक कुशल उपयोग और बेहतर परिचालन रणनीति का परिणाम है।
सिंचाई, पेयजल और ऊर्जा क्षेत्र को मिलेगा लाभ
किशाऊ परियोजना केवल बिजली उत्पादन तक सीमित नहीं है। इसका उद्देश्य सिंचाई सुविधाओं को मजबूत करना, पेयजल उपलब्धता बढ़ाना और यमुना बेसिन में जल प्रबंधन को बेहतर बनाना भी है। बढ़ी हुई भंडारण क्षमता के कारण भविष्य में जल संकट की स्थिति से निपटने में भी मदद मिलेगी।
विशेषज्ञों का मानना है कि परियोजना के पूरा होने के बाद उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश सहित यमुना बेसिन से जुड़े अन्य राज्यों को दीर्घकालिक लाभ मिलेगा। साथ ही यह परियोजना स्वच्छ ऊर्जा उत्पादन बढ़ाने और जल संसाधनों के बेहतर उपयोग की दिशा में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी।










