झारखंड के कोडरमा के मरकच्चो प्रखंड के कारी पहाड़ी और चटनिया दह गांवों में करीब 100 लोग 20 वर्षों से दूषित पानी पीने को मजबूर हैं। महिलाएं आधा किलोमीटर दूर जाकर चुआं से पानी लाती हैं, लेकिन अब तक कोई स्थायी समाधान नहीं हुआ।
कोडरमा: झारखंड के कोडरमा जिले के मरकच्चो प्रखंड अंतर्गत डगरनवां पंचायत के कारी पहाड़ी और चटनिया दह गांवों में बुनियादी सुविधाओं का गंभीर संकट सामने आया है। यहां करीब 100 ग्रामीण पिछले दो दशकों से पीने के स्वच्छ पानी, बिजली और स्वास्थ्य जैसी मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। स्थिति इतनी गंभीर है कि लोग आज भी दूषित पानी पीने को मजबूर हैं।
20 साल से नहीं बदली हालात, जंगलों के बीच बसे गांव
कारी पहाड़ी और चटनिया दह गांव घने जंगलों और पहाड़ी इलाके में बसे हुए हैं। यहां लगभग 10 परिवार वर्षों से रह रहे हैं, लेकिन विकास की रोशनी अब तक नहीं पहुंच सकी है।
ग्रामीणों का कहना है कि आजादी के 75 साल से अधिक समय बीत जाने के बावजूद वे अब भी “ढिबरी युग” में जी रहे हैं।
आधा किलोमीटर दूर जाकर जुटाना पड़ता है पानी
गांव की महिलाएं रोजाना कठिन रास्तों से गुजरकर करीब आधा किलोमीटर दूर स्थित सोती नाला तक पानी लेने जाती हैं। यह रास्ता चढ़ाई-उतराई वाला और बेहद कठिन है।
पानी भरने की प्रक्रिया भी बेहद असुरक्षित है। महिलाएं पहले गंदे पानी से बर्तन साफ करती हैं और फिर छोटे गड्ढों (चुआं) में जमा पानी को निकालकर घरेलू उपयोग में लाती हैं।
यह पानी पूरी तरह से दूषित होता है, लेकिन ग्रामीणों के पास कोई और विकल्प नहीं है।

चुआं का दूषित पानी ही एकमात्र सहारा
गांव में पीने के पानी का कोई स्थायी स्रोत नहीं है। ग्रामीण जमीन में बने छोटे गड्ढों से पानी इकट्ठा करते हैं, जिसे स्थानीय भाषा में “चुआं” कहा जाता है।
यह पानी अक्सर जानवरों द्वारा भी इस्तेमाल किया जाता है, जिससे इसकी गुणवत्ता और भी खराब हो जाती है।
गांव के लोग मजबूरी में इसी पानी को पीते हैं, जिससे स्वास्थ्य पर गंभीर असर पड़ रहा है।
बरसात में हालात और भी खराब
ग्रामीणों के अनुसार गर्मियों में पानी की समस्या चरम पर होती है, लेकिन बरसात के मौसम में स्थिति और विकराल हो जाती है।
बारिश के दौरान चुआं खोदना मुश्किल हो जाता है, ऐसे में लोग नदी के गंदे पानी को छानकर पीने को मजबूर हो जाते हैं। यह पानी भी सुरक्षित नहीं होता, जिससे बीमारियों का खतरा बढ़ जाता है।
दूषित पानी से बीमारियां फैलने का खतरा
स्थानीय महिला शकुंतला मुर्मू ने बताया कि दूषित पानी के कारण गांव में बच्चे और बुजुर्ग अक्सर बीमार पड़ते हैं।
उन्होंने कहा कि लगातार गंदा पानी पीने से पेट संबंधी बीमारियां, त्वचा रोग और अन्य स्वास्थ्य समस्याएं आम हो चुकी हैं। स्वास्थ्य सुविधाओं की अनुपलब्धता के कारण ग्रामीणों को इलाज के लिए दूर जाना पड़ता है।
आजीविका का संकट: मजदूरी और सीमित खेती पर निर्भर लोग
ग्रामीण लखन मुर्मू के अनुसार गांव के लोग मुख्य रूप से मजदूरी और थोड़ी बहुत खेती पर निर्भर हैं।
गांव तक पहुंचने के लिए पक्की सड़क तक नहीं है, जिससे जीवन और भी कठिन हो जाता है। बारिश के दिनों में आवाजाही लगभग बंद हो जाती है।
प्रशासन तक कई बार पहुंची शिकायतें, लेकिन समाधान नहीं
ग्रामीणों ने कई बार जिला प्रशासन को अपनी समस्याओं से अवगत कराया है, लेकिन अब तक कोई ठोस समाधान नहीं निकला है।
लोगों का कहना है कि हर बार आश्वासन तो मिलता है, लेकिन जमीनी स्तर पर स्थिति जस की तस बनी रहती है।
वन क्षेत्र होने से विकास कार्यों में बाधा
प्रशासनिक अधिकारियों के अनुसार यह क्षेत्र वन भूमि के अंतर्गत आता है, जिसके कारण यहां ट्यूबवेल या बोरिंग करने के लिए वन विभाग से अनापत्ति प्रमाण पत्र (NOC) नहीं मिल पा रहा है।
मरकच्चो के बीडीओ हुलास महतो ने बताया कि मामले की जानकारी वरिष्ठ अधिकारियों को दी जा रही है और समाधान की कोशिश जारी है।
बुनियादी सुविधाओं के अभाव पर उठते सवाल
कारी पहाड़ी और चटनिया दह गांव की स्थिति देश के ग्रामीण विकास मॉडल पर गंभीर सवाल खड़े करती है। एक ओर सरकार हर घर जल और ग्रामीण विकास योजनाओं की बात करती है, वहीं दूसरी ओर ऐसे गांव अब भी स्वच्छ पानी जैसी मूलभूत सुविधा से वंचित हैं।










