कोलकाता: पश्चिम बंगाल की राजधानी कोलकाता में न्यू मार्केट इलाके की मिर्जा गालिब स्ट्रीट स्थित शिखा इन होटल में बुधवार तड़के लगी भीषण आग ने सुरक्षा व्यवस्था पर कई गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। पांच मंजिला इमारत में लगी आग में 9 लोगों की मौत हो गई, जबकि कई लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला गया। मरने वालों में महिलाएं और एक बच्चा भी शामिल हैं। शुरुआती जानकारी के मुताबिक कई लोगों की मौत आग की लपटों से नहीं, बल्कि धुएं में दम घुटने से हुई। करीब 80 लोगों को रेस्क्यू किए जाने की बात सामने आई है।
हादसे के बाद सबसे बड़ा सवाल यही उठ रहा है कि आखिर इन 9 लोगों की मौत के लिए जिम्मेदार कौन है? क्या यह सिर्फ एक दुर्भाग्यपूर्ण आग थी या होटल में सुरक्षा मानकों की अनदेखी ने हादसे को इतना भयावह बना दिया? फिलहाल किसी एक व्यक्ति या संस्था को अंतिम रूप से जिम्मेदार ठहराना जल्दबाजी होगी, क्योंकि मामले की जांच जारी है। मुख्यमंत्री के निर्देश पर SIT का गठन किया गया है, जो आग लगने की वजह के साथ-साथ संभावित लापरवाही और सुरक्षा व्यवस्था की जांच करेगी।
बताया गया है कि आग बुधवार तड़के करीब 1:40 से 2 बजे के बीच लगी। उस समय होटल में ठहरे ज्यादातर लोग सो रहे थे। आग लगने के बाद धुआं तेजी से कमरों और गलियारों में फैल गया। सो रहे लोगों को संभलने और बाहर निकलने का पर्याप्त समय नहीं मिल पाया। कुछ कमरों में खिड़कियां नहीं होने की बात भी सामने आई है, जिससे धुएं से बचकर निकलना और मुश्किल हो गया।
यही वजह है कि इस अग्निकांड में फायर सेफ्टी व्यवस्था सबसे बड़े सवालों में से एक बन गई है। होटल और जिस इमारत में वह संचालित हो रहा था, वहां आग से बचाव के लिए पर्याप्त इंतजाम थे या नहीं, इसकी जांच की जा रही है। क्या इमरजेंसी एग्जिट पर्याप्त थे? क्या फायर अलार्म और दूसरे सुरक्षा उपकरण काम कर रहे थे? क्या होटल में नियमित फायर ऑडिट हुआ था? इन सवालों के जवाब जांच के बाद ही सामने आएंगे।
घटना के बाद होटल मालिक की भूमिका को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। मीडिया रिपोर्टों में होटल मालिक के फरार होने की बात सामने आई है। हालांकि उसकी जिम्मेदारी और संभावित कानूनी कार्रवाई का निर्धारण जांच के आधार पर ही होगा।
इस हादसे में एक और गंभीर सवाल स्थानीय प्रशासन और लाइसेंसिंग व्यवस्था को लेकर उठ रहा है। यदि होटल को संचालित करने की अनुमति मिली थी तो क्या संबंधित विभागों ने भवन और फायर सेफ्टी मानकों का समय-समय पर निरीक्षण किया था? यदि नियमों में कमी थी तो क्या समय रहते कार्रवाई की गई? यही सवाल अब प्रशासन के सामने भी खड़े हैं।
घटना के बाद पश्चिम बंगाल सरकार ने होटल और गेस्ट हाउस की सुरक्षा व्यवस्था की जांच कराने का फैसला किया है। सरकार की ओर से पूरे राज्य में होटल और गेस्ट हाउस के फायर सेफ्टी इंतजामों का ऑडिट कराने की बात सामने आई है।
आग में मारे गए लोगों में कई बांग्लादेशी नागरिक भी शामिल थे। वे इलाज के सिलसिले में कोलकाता आए थे और होटल में ठहरे हुए थे। रिपोर्टों के अनुसार मृतकों में एक बांग्लादेशी पत्रकार, उनकी पत्नी और चार साल का बच्चा भी शामिल है।
हादसे की भयावहता का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि आग लगने के बाद इमारत के अंदर धुआं इतना भर गया कि लोगों के लिए सांस लेना मुश्किल हो गया। कुछ लोग जान बचाने के लिए छत की ओर भागे, जबकि अन्य ने बाहर निकलने का रास्ता तलाशा। प्रत्यक्षदर्शियों और बचे लोगों ने रात के उस भयावह मंजर के बारे में बताया है।
फायर ब्रिगेड की टीम ने मौके पर पहुंचकर बचाव अभियान शुरू किया। अधिकारियों के अनुसार त्वरित कार्रवाई के कारण करीब 80 लोगों को सुरक्षित बाहर निकाला जा सका। आग पर काबू पाने के लिए कई दमकल वाहनों का इस्तेमाल किया गया।
हालांकि इस रेस्क्यू के बावजूद 9 लोगों की जान नहीं बचाई जा सकी। शुरुआती जांच में धुएं के कारण दम घुटना मौत की प्रमुख वजह बताई जा रही है। आग का वास्तविक कारण अभी आधिकारिक रूप से तय नहीं हुआ है। शॉर्ट सर्किट की आशंका जताई गई है, लेकिन फॉरेंसिक जांच के बाद ही यह स्पष्ट होगा कि आग किस वजह से शुरू हुई।
इस हादसे के बाद कोलकाता में होटल और गेस्ट हाउस की सुरक्षा व्यवस्था पर व्यापक बहस शुरू हो गई है। खासकर पुराने और घनी आबादी वाले इलाकों में संचालित हो रहे होटलों को लेकर सवाल उठ रहे हैं। संकरी गलियां और आसपास की घनी इमारतें आग लगने की स्थिति में दमकल और बचाव टीम के लिए बड़ी चुनौती बन सकती हैं।
मिर्जा गालिब स्ट्रीट का इलाका व्यावसायिक गतिविधियों से भरा हुआ है। ऐसे स्थान पर यदि किसी बहुमंजिला इमारत में आग लग जाए तो आसपास की इमारतों तक आग फैलने का खतरा भी रहता है। राहत और बचाव अभियान में भीड़भाड़ और संकरी सड़कें बाधा बन सकती हैं।
अब जांच में यह भी देखा जाएगा कि होटल में रहने वाले लोगों को आपात स्थिति में बाहर निकालने के लिए पर्याप्त व्यवस्था थी या नहीं। रात के समय होटल में मौजूद कर्मचारियों को आग लगने की स्थिति से निपटने की ट्रेनिंग थी या नहीं, यह भी महत्वपूर्ण सवाल है।
सबसे बड़ा सवाल यह है कि यदि सुरक्षा नियमों में कमी थी तो उसे समय रहते क्यों नहीं पकड़ा गया? अगर होटल के पास जरूरी फायर सेफ्टी प्रमाणपत्र और अन्य अनुमतियां थीं तो उनकी नियमित जांच किस तरह हुई, और यदि नियमों का पालन नहीं हो रहा था तो संबंधित अधिकारियों ने क्या कार्रवाई की—इन सभी बिंदुओं की जांच जरूरी होगी।
राज्य सरकार की ओर से जांच और फायर सेफ्टी ऑडिट का फैसला इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि कोलकाता में इससे पहले भी बड़े अग्निकांड सुरक्षा व्यवस्था पर सवाल खड़े कर चुके हैं। ऐसे में केवल घटना के बाद कार्रवाई करने के बजाय होटल, लॉज और गेस्ट हाउस में पहले से सुरक्षा मानकों की जांच करना जरूरी है।
फिलहाल 9 मौतों की जिम्मेदारी किसी एक व्यक्ति पर तय नहीं हुई है। SIT और फॉरेंसिक जांच के बाद यह स्पष्ट होगा कि आग कैसे लगी, होटल में सुरक्षा व्यवस्था कैसी थी, क्या नियमों का उल्लंघन हुआ और किस स्तर पर लापरवाही हुई। दोष सामने आने पर संबंधित लोगों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई की जा सकती है।
यह हादसा सिर्फ एक होटल में आग लगने की घटना नहीं है, बल्कि यह सवाल भी छोड़ गया है कि भीड़भाड़ वाले इलाकों में चल रहे होटल और गेस्ट हाउस कितने सुरक्षित हैं। अगर जांच में सुरक्षा मानकों की अनदेखी सामने आती है तो जिम्मेदारी तय करने के साथ-साथ पूरे शहर में ऐसी इमारतों का सुरक्षा ऑडिट कराना जरूरी होगा।
फिलहाल मृतकों के परिवारों के लिए यह अपूरणीय क्षति है। हादसे में जान गंवाने वाले लोगों के परिजन जवाब चाहते हैं और प्रशासन से उम्मीद है कि जांच निष्पक्ष तरीके से होगी। अब सबकी नजर SIT की रिपोर्ट और फायर सेफ्टी ऑडिट के नतीजों पर है।










