पाली नगर निगम कमिश्नर का ऑफिस कोर्ट आदेश न मानने पर सील कर दिया गया और सरकारी वाहन जब्त किया गया। कोर्ट ने कुर्सी, एसी और संपत्ति कुर्क करने के आदेश दिए। कमिश्नर अब लेखाधिकारी ऑफिस से काम करेंगे।
पाली: राजस्थान के पाली शहर में उस समय प्रशासनिक और राजनीतिक हलचल तेज हो गई जब नगर निगम आयुक्त के कार्यालय को अदालत के आदेश की अवहेलना के चलते सील कर दिया गया। इस कार्रवाई के तहत न केवल आयुक्त का कार्यालय बंद किया गया, बल्कि उनका सरकारी वाहन भी जब्त कर लिया गया। यह कदम न्यायालय के स्पष्ट निर्देशों के बाद उठाया गया, जिसमें नगर निगम पर लंबे समय से लंबित आदेशों की अनदेखी का आरोप था।
इस पूरे मामले ने न केवल स्थानीय प्रशासन में खलबली मचा दी है, बल्कि यह भी सवाल खड़े किए हैं कि सरकारी संस्थाएं न्यायालय के आदेशों के प्रति कितनी गंभीर हैं।
मामला क्या है: पट्टा जारी न करने से शुरू हुआ विवाद
इस पूरे विवाद की जड़ एक भूमि पट्टा से जुड़ा मामला है। सोजत रोड क्षेत्र के नया गांव निवासी विनोद तेजी पुत्र गोपाल ने अपने प्लॉट (नंबर 615) का पट्टा प्राप्त करने के लिए नगर निगम पाली में आवेदन किया था। उनका कहना था कि सभी आवश्यक दस्तावेज और औपचारिकताएं पूरी होने के बावजूद उन्हें वर्षों तक पट्टा जारी नहीं किया गया।
लगातार देरी और अनदेखी के बाद, विनोद तेजी ने वर्ष 2022 में जिला न्यायालय पाली का रुख किया और नगर निगम के खिलाफ याचिका दायर की।
न्यायालय का आदेश और दो बार दी गई समय सीमा
मामले की सुनवाई के बाद जिला न्यायालय ने 6 सितंबर 2025 को स्पष्ट आदेश जारी करते हुए नगर निगम को एक महीने के भीतर परिवादी के पक्ष में भूमि पट्टा जारी करने का निर्देश दिया था।
हालांकि, निर्धारित समय सीमा बीत जाने के बावजूद नगर निगम द्वारा आदेश का पालन नहीं किया गया। इसके बाद अदालत ने एक और अवसर देते हुए 5 मई 2026 को पुनः आदेश जारी किया और 7 मई 2026 तक हर हाल में पट्टा जारी करने का निर्देश दिया।
इसके बावजूद नगर निगम ने आदेश की पालना नहीं की, जिससे मामला और गंभीर हो गया।
इजराय याचिका के बाद बढ़ी कार्रवाई
नगर निगम की ओर से आदेश की अनदेखी के बाद परिवादी विनोद तेजी ने अदालत में निष्पादन याचिका (Execution Petition) दाखिल की। इसमें उन्होंने नगर निगम की संपत्ति कुर्क करने की मांग की।
इस पर अदालत ने सख्त रुख अपनाते हुए नगर निगम के खिलाफ कार्रवाई के आदेश जारी कर दिए। आदेश में स्पष्ट रूप से कहा गया कि नगर निगम आयुक्त के कार्यालय की कुर्सियां, टेबल, एसी और सरकारी वाहन जब्त किए जाएं।
कोर्ट के आदेश पर मौके पर पहुंची टीम
न्यायालय के निर्देशों के बाद सेल अमीन रवि गहलोत अपनी टीम के साथ नगर निगम कार्यालय पहुंचे। दोपहर करीब 2 बजे कार्रवाई शुरू की गई और नगर निगम आयुक्त के कार्यालय को विधिवत रूप से सील कर दिया गया।
कार्रवाई के दौरान कार्यालय में मौजूद सामान को सूचीबद्ध किया गया और उसे न्यायालय की अभिरक्षा में लेने की प्रक्रिया पूरी की गई।

इसके साथ ही नगर निगम आयुक्त का सरकारी वाहन भी जब्त कर लिया गया और उसे कोर्ट परिसर में सुरक्षित रखा गया।
आयुक्त का कार्यालय सील, लेकिन काम जारी रखने की व्यवस्था
कार्यालय सील होने के बाद नगर निगम आयुक्त नवीन भारद्वाज ने अपना काम बाधित नहीं होने दिया। उन्हें लेखाधिकारी (Accounts Officer) के कार्यालय में स्थानांतरित कर दिया गया, जहां से वे प्रशासनिक कार्यों का संचालन कर रहे हैं।
हालांकि, इस स्थिति ने नगर निगम प्रशासन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं, क्योंकि एक वरिष्ठ अधिकारी को अपने ही कार्यालय के बाहर बैठकर काम करना पड़ रहा है।
कोर्ट की सख्ती क्यों बढ़ी?
इस मामले में अदालत की सख्ती इसलिए बढ़ी क्योंकि पहले दिए गए आदेशों का लगातार उल्लंघन किया गया था। न्यायालय ने इसे गंभीर अवमानना मानते हुए सीधे संपत्ति कुर्क करने का आदेश जारी किया।
कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार, जब कोई सरकारी निकाय अदालत के आदेशों का पालन नहीं करता है, तो अदालत के पास कठोर कार्रवाई करने का अधिकार होता है ताकि न्यायिक व्यवस्था का सम्मान बना रहे।
प्रशासनिक हलकों में मचा हड़कंप
इस कार्रवाई के बाद नगर निगम और प्रशासनिक गलियारों में हड़कंप मच गया है। पहली बार किसी नगर निगम आयुक्त के कार्यालय को इस तरह सील किया गया है, जिससे यह मामला चर्चा का विषय बन गया है।
स्थानीय अधिकारियों के अनुसार, यह कार्रवाई एक सख्त संदेश है कि न्यायालय के आदेशों की अनदेखी किसी भी स्तर पर स्वीकार नहीं की जाएगी, चाहे वह कितना भी बड़ा अधिकारी क्यों न हो।
आयुक्त को 11 मई को अदालत में पेश होने का आदेश
अदालत ने नगर निगम आयुक्त नवीन भारद्वाज को 11 मई 2026 को व्यक्तिगत रूप से अदालत में उपस्थित होने का निर्देश दिया है। तब तक उनका कार्यालय सील रहेगा।
यह सुनवाई मामले की आगे की दिशा तय करेगी और यह भी स्पष्ट करेगी कि नगर निगम की ओर से आदेशों का पालन न करने के पीछे क्या कारण रहे।
कानूनी विशेषज्ञों की राय
कानूनी जानकारों का मानना है कि यह मामला प्रशासनिक लापरवाही का गंभीर उदाहरण है। यदि किसी भी सरकारी संस्था द्वारा अदालत के आदेशों की लगातार अनदेखी की जाती है, तो यह न्याय व्यवस्था पर सीधा प्रभाव डालता है।
विशेषज्ञों का यह भी कहना है कि इस तरह की कार्रवाई भविष्य में अन्य सरकारी निकायों के लिए चेतावनी का काम करेगी।
स्थानीय लोगों की प्रतिक्रिया
स्थानीय लोगों में इस कार्रवाई को लेकर मिश्रित प्रतिक्रियाएं देखने को मिल रही हैं। कुछ लोग इसे न्यायिक व्यवस्था की मजबूती मान रहे हैं, जबकि कुछ का कहना है कि यह प्रशासनिक विफलता का संकेत है, जिसे समय रहते सुधारा जाना चाहिए था।











