चंद्रशेखर आजाद को देखने पेड़ पर चढ़े समर्थक: पंचायत सहायकों की मांगों पर बोले- जब तक भाइयों की मांग पूरी नहीं होगी

लखनऊ में पंचायत सहायकों के प्रदर्शन में चंद्रशेखर आजाद पहुंचे तो समर्थक पेड़ पर चढ़ गए। कर्मचारी 30 हजार मानदेय, स्थायी सेवा और समान वेतन की मांग कर रहे हैं।
चंद्रशेखर आजाद को देखने पेड़ पर चढ़े समर्थक: पंचायत सहायकों की मांगों पर बोले- जब तक भाइयों की मांग पूरी नहीं होगी
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खनऊ में पंचायत सहायकों के प्रदर्शन के दौरान उस समय अलग ही नजारा देखने को मिला, जब आजाद समाज पार्टी के नेता चंद्रशेखर आजाद को देखने और उनका भाषण सुनने के लिए समर्थक पेड़ों पर चढ़ गए। राजधानी में अपनी मांगों को लेकर जुटे पंचायत सहायकों के बीच चंद्रशेखर आजाद की मौजूदगी ने माहौल को और गर्म कर दिया। प्रदर्शनकारी लंबे समय से मानदेय बढ़ाने, सेवा को स्थायी करने और समान काम के लिए समान वेतन जैसी मांगें उठा रहे हैं। उपलब्ध रिपोर्टों के अनुसार पंचायत सहायकों का मौजूदा मानदेय करीब 6 हजार रुपये है, जिसे बढ़ाकर 30 हजार रुपये प्रतिमाह करने की मांग की जा रही है।

प्रदर्शन के दौरान बड़ी संख्या में कर्मचारी और उनके समर्थक अपनी मांगों को लेकर आवाज बुलंद करते नजर आए। चंद्रशेखर आजाद के पहुंचने की खबर के बाद उनके समर्थकों में भी उत्साह बढ़ गया। भीड़ में मौजूद कुछ लोग नेता को करीब से देखने और उनकी बात सुनने के लिए पेड़ों पर चढ़ गए। इससे मौके पर मौजूद लोगों का ध्यान भी उनकी ओर गया। आंदोलन से जुड़े लोगों का कहना है कि उनकी लड़ाई सिर्फ मानदेय बढ़ाने तक सीमित नहीं है, बल्कि पंचायत स्तर पर लंबे समय से काम कर रहे कर्मचारियों को सेवा सुरक्षा और सम्मानजनक वेतन दिलाने की भी है।

पंचायत सहायकों की सबसे प्रमुख मांगों में अनुबंध व्यवस्था को समाप्त कर स्थायी सेवा प्रदान करना शामिल है। उनका कहना है कि पंचायत स्तर पर सरकारी योजनाओं और प्रशासनिक कार्यों में उनकी महत्वपूर्ण भूमिका रहती है, लेकिन इसके बावजूद उन्हें बेहद कम मानदेय पर काम करना पड़ रहा है। प्रदर्शनकारियों का तर्क है कि जिम्मेदारियां लगातार बढ़ती जा रही हैं, जबकि भुगतान उस अनुपात में नहीं बढ़ा है। ऐसे में परिवार चलाना और बढ़ती महंगाई का सामना करना उनके लिए मुश्किल होता जा रहा है।

लखनऊ में हुए प्रदर्शन के दौरान प्रदर्शनकारियों ने सरकार से स्पष्ट नीति बनाने की मांग की। उनका कहना है कि यदि उनसे लगातार नियमित कर्मचारियों की तरह काम लिया जा रहा है तो उन्हें भी काम के अनुरूप वेतन और सेवा सुरक्षा मिलनी चाहिए। समान काम के लिए समान वेतन का मुद्दा भी आंदोलन के केंद्र में है। पंचायत सहायकों का कहना है कि गांवों में सरकारी योजनाओं की जानकारी लोगों तक पहुंचाने, विभिन्न प्रशासनिक कामों में सहयोग करने और पंचायत स्तर की व्यवस्थाओं में भूमिका निभाने के बावजूद उनके मानदेय में अपेक्षित वृद्धि नहीं हुई है।

उपलब्ध रिपोर्ट के मुताबिक प्रदर्शनकारी 6 हजार रुपये के मौजूदा मानदेय से नाराज हैं और इसे बढ़ाकर 30 हजार रुपये प्रतिमाह करने की मांग कर रहे हैं। इसके अलावा अनुबंध प्रणाली समाप्त करने और स्थायी सेवा देने की मांग भी आंदोलन का अहम हिस्सा है।

इस आंदोलन का एक राजनीतिक पहलू भी सामने आया है। चंद्रशेखर आजाद के प्रदर्शन स्थल पर पहुंचने से पंचायत सहायकों के बीच उत्साह बढ़ा। उनके समर्थकों ने जिस तरह पेड़ों पर चढ़कर उन्हें देखने की कोशिश की, उससे यह साफ दिखाई दिया कि मौके पर राजनीतिक समर्थन और जनसमर्थन का माहौल भी बन गया था। हालांकि आंदोलन की मूल मांगें पंचायत सहायकों के रोजगार, वेतन और सेवा शर्तों से जुड़ी हैं।

प्रदर्शनकारियों के बीच चंद्रशेखर आजाद की मौजूदगी के दौरान नारों और मांगों का दौर चलता रहा। इसी बीच उनके समर्थकों की भीड़ बढ़ने लगी। पेड़ों पर चढ़े लोगों का वीडियो और तस्वीरें भी सोशल मीडिया पर चर्चा का विषय बन सकती हैं। बड़े राजनीतिक नेताओं के किसी आंदोलन स्थल पर पहुंचने के दौरान अक्सर समर्थकों में उत्साह बढ़ता है और लखनऊ की इस घटना में भी ऐसा ही देखने को मिला।

पंचायत सहायकों का कहना है कि उनकी सेवाएं गांवों में प्रशासनिक व्यवस्था की सबसे निचली लेकिन महत्वपूर्ण कड़ी से जुड़ी हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में सरकार की कई योजनाओं को लागू करने और लोगों तक पहुंचाने में पंचायत स्तर के कर्मचारियों की भूमिका रहती है। इसी आधार पर प्रदर्शनकारी अपने मानदेय और सेवा शर्तों में सुधार की मांग कर रहे हैं। उनका कहना है कि कम आय के बावजूद काम का दबाव और जिम्मेदारी लगातार बढ़ती जा रही है।

मानदेय बढ़ाने की मांग के पीछे महंगाई भी एक बड़ा मुद्दा है। आज के समय में घर का किराया, बच्चों की पढ़ाई, इलाज, रोजमर्रा का खर्च और आने-जाने का खर्च लगातार बढ़ रहा है। ऐसे में 6 हजार रुपये के मानदेय में परिवार का खर्च चलाना मुश्किल होने की बात प्रदर्शनकारी कह रहे हैं। उनका कहना है कि यदि सरकार पंचायत सहायकों से नियमित रूप से काम ले रही है तो उनकी आर्थिक स्थिति को भी ध्यान में रखना चाहिए।

पंचायत सहायकों की मांग है कि सरकार उनके लिए ऐसा ढांचा तैयार करे जिसमें नियुक्ति, वेतन, सेवा अवधि और भविष्य की सुरक्षा स्पष्ट हो। अनुबंध व्यवस्था को लेकर कर्मचारियों की सबसे बड़ी चिंता नौकरी की स्थिरता है। अनुबंध आधारित काम में कर्मचारियों को भविष्य को लेकर अनिश्चितता बनी रहती है। प्रदर्शनकारी चाहते हैं कि उनकी सेवा को स्थायी करने की दिशा में ठोस कदम उठाया जाए।

समान काम के लिए समान वेतन की मांग भी इसी असंतोष से जुड़ी है। कर्मचारियों का कहना है कि जिम्मेदारी और कार्यभार के हिसाब से उन्हें पर्याप्त पारिश्रमिक मिलना चाहिए। उनका मानना है कि केवल कम मानदेय देकर लंबे समय तक काम कराना उचित नहीं है। इसलिए वे सरकार से नीति स्तर पर फैसला लेने की मांग कर रहे हैं।

इससे पहले भी पंचायत सहायकों ने अपनी मांगों को लेकर आवाज उठाई है। लखनऊ में प्रदर्शन के दौरान पुलिस ने प्रदर्शनकारियों को हजरतगंज से हटाया था, लेकिन इसके बावजूद उनका आंदोलन अपनी मांगों को लेकर जारी रहा। अब कर्मचारियों की नजर सरकार के अगले कदम पर है।

राजधानी लखनऊ में किसी कर्मचारी संगठन का प्रदर्शन केवल स्थानीय मुद्दा नहीं रहता। यहां होने वाले आंदोलनों का सीधा संदेश सरकार और संबंधित विभाग तक जाता है। पंचायत सहायक भी इसी उम्मीद के साथ राजधानी पहुंचे हैं कि उनकी मांगों पर सरकार गंभीरता से विचार करे। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि वे अपनी मांगों को लेकर शांतिपूर्ण तरीके से आवाज उठाते रहेंगे और जब तक उनकी समस्याओं पर ठोस निर्णय नहीं होता, तब तक आंदोलन जारी रखने का रास्ता अपनाया जा सकता है।

चंद्रशेखर आजाद के पहुंचने के बाद प्रदर्शन को राजनीतिक समर्थन मिलने की चर्चा भी तेज हुई। समर्थकों ने जिस तरह उन्हें देखने के लिए पेड़ों का सहारा लिया, वह मौके की भीड़ और उत्साह को दिखाता है। हालांकि कर्मचारियों के लिए सबसे महत्वपूर्ण सवाल यही है कि उनकी मांगों पर सरकार क्या निर्णय लेती है और क्या मानदेय बढ़ाने तथा सेवा को स्थायी करने के संबंध में कोई ठोस कदम उठाया जाता है।

पंचायत सहायकों का कहना है कि वे ग्रामीण स्तर पर सरकारी व्यवस्था के साथ काम कर रहे हैं और जनता से सीधे जुड़े कार्यों में योगदान देते हैं। ऐसे में उनकी आर्थिक और सेवा संबंधी समस्याओं का समाधान किया जाना जरूरी है। उनका कहना है कि केवल आश्वासन से समस्या का समाधान नहीं होगा, बल्कि लिखित और स्पष्ट निर्णय की जरूरत है।

आंदोलन के दौरान उठाई जा रही 30 हजार रुपये मासिक मानदेय की मांग फिलहाल कर्मचारियों की प्रमुख मांगों में शामिल है। इसके साथ स्थायी नियुक्ति और समान काम के लिए समान वेतन का मुद्दा भी जुड़ा हुआ है। सरकार यदि इन मांगों पर कोई निर्णय लेती है तो उसका असर प्रदेश के हजारों पंचायत सहायकों पर पड़ सकता है। फिलहाल प्रदर्शनकारी सरकार की ओर से किसी ठोस घोषणा का इंतजार कर रहे हैं।

लखनऊ की इस तस्वीर में एक तरफ अपनी आर्थिक और सेवा सुरक्षा को लेकर संघर्ष कर रहे पंचायत सहायक हैं, तो दूसरी तरफ उनके बीच पहुंचे चंद्रशेखर आजाद और उन्हें देखने के लिए उमड़े समर्थक हैं। पेड़ पर चढ़कर नेता को देखने की तस्वीर ने प्रदर्शन को अलग दृश्य जरूर दिया, लेकिन आंदोलन का मूल मुद्दा कर्मचारियों की नौकरी, मानदेय और भविष्य की सुरक्षा ही है। आने वाले दिनों में सरकार की ओर से इन मांगों पर क्या रुख अपनाया जाता है, इसी पर आंदोलन की अगली दिशा निर्भर करेगी।

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