मणिपुर के चंदेल जिले में भारत-म्यांमार सीमा के प्रस्तावित पुनर्निर्धारण के खिलाफ हजारों लोगों ने प्रदर्शन किया। प्रभावित कुकी प्रमुखों ने सीमा स्तंभों में बदलाव का विरोध करते हुए ancestral जमीन, खेतों, कब्रिस्तानों और सामुदायिक भूमि के प्रभावित होने की आशंका जताई।
इंफाल: मणिपुर के चंदेल जिले में भारत-म्यांमार अंतरराष्ट्रीय सीमा के प्रस्तावित पुनर्निर्धारण को लेकर विवाद मंगलवार को और गहरा गया। खेंगजॉय सेक्टर में सीमा स्तंभों की demarcation और संभावित रियलाइन्मेंट के विरोध में हजारों लोग सड़कों पर उतरे। प्रभावित सीमा क्षेत्र के कुकी समुदाय के प्रमुखों के नेतृत्व में खेंगजांग और मोलचाम गांवों में बड़े स्तर पर प्रदर्शन किया गया। प्रदर्शनकारियों ने प्रस्तावित सीमा प्रक्रिया पर कड़ी आपत्ति जताते हुए इसे स्थानीय समुदायों की सहमति के बिना किया जा रहा कदम बताया।
लोगों ने "हमारी जमीन का एक इंच भी नहीं जाएगा" जैसे नारों के साथ अपनी नाराजगी जाहिर की। प्रभावित समुदायों का कहना है कि प्रस्तावित सीमा परिवर्तन से उनके पारंपरिक आवास, कृषि भूमि, कब्रिस्तान और सामुदायिक जमीन प्रभावित हो सकती है।
सीमा स्तंभों के पुनर्निर्धारण पर विवाद
विवाद मुख्य रूप से सीमा स्तंभ संख्या 65 से 68 के आसपास केंद्रित है। प्रभावित कुकी प्रमुखों के अनुसार, मोलचाम में सीमा स्तंभ 65, जांगंगौलेन में स्तंभ 66, खुमकोट में स्तंभ 67 और जोलडाम में स्तंभ 68 के आसपास की सीमा स्थिति को लेकर स्थानीय स्तर पर असहमति है।
प्रदर्शनकारियों का दावा है कि जिन इलाकों में सीमा स्तंभों के स्थान या सीमा रेखा में बदलाव की बात कही जा रही है, वहां स्थानीय समुदायों के पूर्वज पीढ़ियों से रहते और खेती करते आए हैं। उनका कहना है कि इन जमीनों का महत्व केवल संपत्ति के रूप में नहीं, बल्कि उनकी सामाजिक पहचान, परंपरा और सामुदायिक इतिहास से भी जुड़ा है।
स्थानीय नेताओं ने कहा कि सीमा निर्धारण को केवल नक्शों और प्रशासनिक दस्तावेजों के आधार पर नहीं देखा जाना चाहिए। उनके अनुसार, जमीन पर मौजूद पारंपरिक कब्जे, लोगों के निवास और समुदायों की ऐतिहासिक गतिविधियों को भी प्रक्रिया में शामिल किया जाना चाहिए।
गृह मंत्रालय के निर्देश का किया गया हवाला
प्रदर्शन से जुड़े लोगों ने दावा किया कि केंद्रीय गृह मंत्रालय की ओर से सीमा निर्धारण की प्रक्रिया को आगे बढ़ाने के निर्देश दिए गए हैं। उनके अनुसार, 11 मई को केंद्रीय गृह मंत्री की अध्यक्षता में हुई बैठक के बाद संबंधित सीमा निर्धारण प्रक्रिया को तीन महीने के भीतर पूरा करने की बात कही गई थी।
हालांकि, इस दावे और प्रस्तावित रियलाइन्मेंट के सभी प्रशासनिक पहलुओं पर स्वतंत्र आधिकारिक स्पष्टीकरण का इंतजार है। प्रदर्शनकारियों का कहना है कि स्थानीय लोगों को पर्याप्त जानकारी और परामर्श दिए बिना इतनी महत्वपूर्ण सीमा प्रक्रिया आगे बढ़ाना उचित नहीं होगा।
उनका आरोप है कि सरकार सीमा क्षेत्र से जुड़े महत्वपूर्ण फैसले में सीधे प्रभावित होने वाले गांवों और समुदायों की चिंताओं को पर्याप्त महत्व नहीं दे रही है।
ancestral land को लेकर चिंता
सीमा क्षेत्र में रहने वाले समुदायों के लिए जमीन का सवाल बेहद संवेदनशील है। प्रभावित कुकी प्रमुखों का कहना है कि विवादित क्षेत्र में केवल कृषि भूमि ही नहीं, बल्कि पूर्वजों के घर, कब्रिस्तान और सामुदायिक उपयोग की जमीन भी मौजूद है।
उनका कहना है कि यदि सीमा की स्थिति बदली जाती है तो इसका सीधा असर ग्रामीणों के दैनिक जीवन पर पड़ सकता है। कृषि भूमि के प्रभावित होने से लोगों की आजीविका पर असर पड़ने की आशंका है, जबकि पारंपरिक और धार्मिक स्थलों पर किसी भी बदलाव से समुदाय की सांस्कृतिक विरासत प्रभावित हो सकती है।
प्रदर्शनकारियों ने इसी आधार पर प्रस्तावित प्रक्रिया को स्वीकार करने से इनकार किया है। उनका कहना है कि सीमा निर्धारण के दौरान स्थानीय समुदायों के अधिकारों और ऐतिहासिक संबंधों को नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
'एक इंच जमीन भी नहीं देंगे' का नारा
खेंगजांग और मोलचाम में हुए प्रदर्शन के दौरान लोगों ने अपनी जमीन की रक्षा का संकल्प दोहराया। प्रदर्शनकारियों ने स्पष्ट किया कि वे सीमा रेखा में किसी भी ऐसे बदलाव को स्वीकार नहीं करेंगे, जिससे उनके अनुसार पारंपरिक जमीन का नुकसान हो।
कुकी प्रमुखों ने कहा कि सीमा स्तंभों का मुद्दा केवल तकनीकी या प्रशासनिक प्रक्रिया नहीं है। उनके लिए यह जमीन, विरासत, आजीविका और सामुदायिक पहचान से जुड़ा विषय है।
उन्होंने केंद्र सरकार और मणिपुर सरकार से अपील की कि सीमा क्षेत्र के प्रभावित गांवों की चिंताओं को गंभीरता से सुना जाए और किसी भी संभावित रियलाइन्मेंट से पहले स्थानीय स्तर पर व्यापक बातचीत की जाए।
सरकार से बातचीत की मांग
प्रदर्शनकारियों ने मांग की है कि भारत-म्यांमार सीमा से संबंधित किसी भी प्रक्रिया को आगे बढ़ाने से पहले प्रभावित समुदायों के प्रतिनिधियों के साथ चर्चा की जाए। उनका कहना है कि सीमा क्षेत्र में रहने वाले लोगों की वास्तविक स्थिति को समझे बिना प्रशासनिक स्तर पर लिया गया फैसला विवाद को और बढ़ा सकता है।

कुकी प्रमुखों ने केंद्र और राज्य सरकार से यह भी आग्रह किया कि मौजूदा सीमा स्थिति और जमीन पर मौजूद पारंपरिक उपयोग की स्वतंत्र जांच कराई जाए। उनका तर्क है कि यदि सीमा निर्धारण में बदलाव से ग्रामीणों के घर, खेती या सामुदायिक जमीन प्रभावित होती है, तो इसके सामाजिक और आर्थिक प्रभावों का आकलन भी किया जाना चाहिए।
मणिपुर की राजनीति में नया संवेदनशील मुद्दा
भारत-म्यांमार सीमा को लेकर उठा यह विवाद ऐसे समय सामने आया है जब मणिपुर पहले से ही भूमि, पहचान, सुरक्षा और स्थानीय समुदायों के अधिकारों से जुड़े संवेदनशील मुद्दों से गुजर रहा है।
राज्य में जमीन और समुदायों की पहचान से जुड़े विषय लंबे समय से राजनीतिक और सामाजिक बहस का हिस्सा रहे हैं। ऐसे में अंतरराष्ट्रीय सीमा से संबंधित किसी भी प्रस्तावित बदलाव का स्थानीय स्तर पर संवेदनशील होना स्वाभाविक है।
खेंगजॉय क्षेत्र में हुआ प्रदर्शन इस बात का संकेत है कि सीमा निर्धारण का मुद्दा केवल प्रशासनिक प्रक्रिया तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका सीधा संबंध स्थानीय समुदायों की सामाजिक और राजनीतिक चिंताओं से भी जुड़ गया है।
अंतरराष्ट्रीय सीमा और स्थानीय समुदायों के हित
भारत और म्यांमार के बीच सीमा का मुद्दा दोनों देशों की सुरक्षा और प्रशासनिक व्यवस्था से जुड़ा हुआ है। सीमा निर्धारण में आधिकारिक मानचित्र, सीमा स्तंभ और द्विपक्षीय समझौते महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं। लेकिन सीमा क्षेत्र में रहने वाले स्थानीय समुदायों के लिए यह जमीन उनके दैनिक जीवन और पीढ़ियों पुराने संबंधों से जुड़ी होती है।
यही कारण है कि किसी भी संभावित बदलाव को लेकर स्थानीय स्तर पर प्रतिक्रिया सामने आ सकती है। प्रभावित कुकी प्रमुखों का कहना है कि सरकारी नक्शे में सीमा की स्थिति निर्धारित होने के बावजूद जमीन से जुड़े ऐतिहासिक और सामाजिक संबंधों को प्रशासनिक प्रक्रिया के दौरान नजरअंदाज नहीं किया जाना चाहिए।
प्रदर्शनकारियों के मुताबिक, यदि किसी सीमा प्रक्रिया से स्थानीय आबादी की जमीन या आजीविका प्रभावित होती है तो सरकार को पहले उनके साथ संवाद करना चाहिए।
आगे की प्रक्रिया पर रहेगी नजर
खेंगजॉय क्षेत्र में बड़े पैमाने पर हुए प्रदर्शन के बाद अब प्रस्तावित सीमा निर्धारण और सीमा स्तंभों के संभावित पुनर्निर्धारण की प्रक्रिया पर सबकी नजर रहेगी। स्थानीय समुदायों ने साफ कर दिया है कि वे अपनी पारंपरिक जमीन से जुड़े किसी भी बदलाव का विरोध करेंगे। फिलहाल प्रदर्शनकारियों की मुख्य मांग यही है कि केंद्र और मणिपुर सरकार स्थानीय लोगों की आपत्तियों को सुने और उनकी सहमति तथा चिंताओं को ध्यान में रखे बिना कोई कदम आगे न बढ़ाया जाए।
आने वाले दिनों में सरकार और प्रभावित समुदायों के बीच बातचीत इस विवाद को शांत करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है। यदि दोनों पक्षों के बीच संवाद स्थापित होता है, तो सीमा निर्धारण से जुड़े तकनीकी और स्थानीय हितों के बीच संतुलन बनाने की संभावना बढ़ सकती है।
भारत-म्यांमार सीमा से जुड़ा यह विवाद अब मणिपुर के राजनीतिक और सामाजिक परिदृश्य में एक नया संवेदनशील विषय बन गया है। स्थानीय लोगों की जमीन और विरासत से जुड़ी चिंताओं तथा राष्ट्रीय सीमा प्रबंधन की जरूरतों के बीच संतुलन बनाना आने वाले समय में सरकार के लिए महत्वपूर्ण चुनौती होगी।












