माउंट एवरेस्ट पर ब्रिटिश पर्वतारोही क्रिस थ्रॉल ने अपने नेपाली गाइड दावा शेरपा से बिछड़ने और उसके छह दिन बाद जीवित मिलने की कहानी बताई। ‘डेथ ज़ोन’ में लापता होने के बावजूद शेरपा ने असाधारण रूप से जीवित रहकर सभी को चौंका दिया।
काठमांडू: दुनिया की सबसे ऊँची चोटी Mount Everest पर एक हैरान कर देने वाली घटना सामने आई है, जहाँ नेपाली पर्वत गाइड दावाज़ी शेरपा उतराई के दौरान अपने साथी पर्वतारोही से अलग हो गए और बाद में छह दिनों तक “डेथ ज़ोन” में अकेले जीवित रहे। इस घटना ने एवरेस्ट की खतरनाक परिस्थितियों और पर्वतारोहण की जोखिम भरी दुनिया को फिर से चर्चा में ला दिया है।
ब्रिटिश पर्वतारोही क्रिस थ्रॉल का आखिरी संपर्क और भावनात्मक अनुभव
ब्रिटिश पूर्व सैनिक और पर्वतारोही क्रिस थ्रॉल ने बताया कि उन्होंने दावाज़ी शेरपा को अंतिम बार उतराई के दौरान आराम करते हुए देखा था। इसके बाद खराब मौसम, थकान और कठिन रास्तों के कारण दोनों का संपर्क टूट गया। थ्रॉल ने बाद में बताया कि उन्हें लगा था कि शेरपा शायद जीवित नहीं बच पाएंगे, लेकिन बाद में उनका जीवित मिलना उनके लिए अविश्वसनीय क्षण था।
एवरेस्ट का “डेथ ज़ोन” क्यों बनता है मौत का क्षेत्र
एवरेस्ट पर 8,000 मीटर से ऊपर का क्षेत्र “डेथ ज़ोन” कहलाता है, जहाँ ऑक्सीजन बेहद कम होती है और मानव शरीर तेजी से कमजोर होने लगता है। इस क्षेत्र में लंबे समय तक रहना लगभग असंभव माना जाता है, लेकिन दावाज़ी शेरपा का छह दिनों तक जीवित रहना विशेषज्ञों के लिए भी आश्चर्य का विषय है।

छह दिनों का संघर्ष और बेहद कठिन परिस्थितियाँ
रिपोर्ट्स के अनुसार, शेरपा ने इस दौरान बर्फीली हवाओं, अत्यधिक ठंड और ऑक्सीजन की भारी कमी के बीच खुद को जिंदा रखा। कई दिनों तक वे बिना पर्याप्त भोजन और सहायता के पहाड़ की खतरनाक ढलानों में फंसे रहे। उनकी यह जिजीविषा पर्वतारोहण इतिहास की सबसे असाधारण जीवित रहने की घटनाओं में गिनी जा रही है।
सागर्माथा प्रदूषण नियंत्रण समिति की खोज और बचाव अभियान
घटना के दौरान स्थानीय टीमों के साथ Sagarmatha Pollution Control Committee के खोज एवं बचाव दल ने महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। यह टीम एवरेस्ट क्षेत्र में सफाई, मार्ग प्रबंधन और पर्वतारोहियों की सुरक्षा सुनिश्चित करने का कार्य करती है और इसी टीम ने शेरपा को खोजकर सुरक्षित निकाला।
क्यों खास है यह बचाव अभियान
यह घटना इसलिए भी महत्वपूर्ण मानी जा रही है क्योंकि एवरेस्ट के “डेथ ज़ोन” में इतने लंबे समय तक किसी व्यक्ति का अकेले जीवित रहना बेहद दुर्लभ है। पर्वतारोहण विशेषज्ञ इसे मानव सहनशक्ति और अनुभव का असाधारण उदाहरण बता रहे हैं।
पर्वतारोहण की सुरक्षा व्यवस्था पर उठे सवाल
इस घटना के बाद एक बार फिर सवाल उठे हैं कि क्या एवरेस्ट अभियानों में सुरक्षा और ट्रैकिंग सिस्टम पर्याप्त हैं या नहीं। विशेषज्ञों का कहना है कि बढ़ती भीड़, सीमित संसाधन और कठिन मौसम की वजह से जोखिम लगातार बढ़ता जा रहा है।
शेरपा समुदाय की भूमिका और साहस की मिसाल
हिमालयी अभियानों में शेरपा समुदाय की भूमिका बेहद महत्वपूर्ण मानी जाती है। ऊँचाई पर काम करने की उनकी क्षमता और अनुभव उन्हें दुनिया के सबसे कठिन पर्वतीय अभियानों का आधार बनाता है। दावाज़ी शेरपा का बचना इसी साहस और सहनशक्ति का उदाहरण माना जा रहा है।












