मध्य पूर्व में अमेरिकी नौसेना की बड़ी तैनाती के बीच तनाव फिर बढ़ता दिख रहा है। USS अब्राहम लिंकन समेत 15 युद्धपोत क्षेत्र में मौजूद हैं, जिनका मकसद रणनीतिक दबाव बनाना बताया जा रहा है। ईरान और अमेरिका के बीच परमाणु मुद्दे को लेकर बातचीत विफल होने के बाद हालात और संवेदनशील हो गए हैं।
मध्य पूर्व तनाव 2026: अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते तनाव के बीच मध्य पूर्व में अमेरिकी नौसेना की बड़ी तैनाती जारी है। रिपोर्ट्स के मुताबिक USS अब्राहम लिंकन सहित करीब 15 युद्धपोत क्षेत्र में सक्रिय हैं, जिनमें विध्वंसक और एम्फीबियस ग्रुप के जहाज शामिल हैं। यह तैनाती ईरान के बंदरगाहों पर रणनीतिक दबाव बनाने के उद्देश्य से की गई बताई जा रही है। हालिया कूटनीतिक बातचीत विफल होने के बाद परमाणु कार्यक्रम को लेकर दोनों देशों के बीच तनाव और बढ़ गया है।
USS अब्राहम लिंकन समेत 15 जहाजों की तैनाती
अमेरिकी नौसेना के बेड़े में शामिल प्रमुख जहाजों में USS बैनब्रिज, USS थॉमस हडनर, USS जॉन फिन, USS माइकल मर्फी, USS राफेल पेराल्टा और USS स्प्रुएन्स जैसे विध्वंसक शामिल हैं। इसके अलावा USS त्रिपोली, USS न्यू ऑरलियन्स और USS रशमोर जैसे एम्फीबियस ग्रुप के जहाज भी क्षेत्र में मौजूद हैं।
इन जहाजों की तैनाती को रणनीतिक तौर पर बेहद अहम माना जा रहा है, क्योंकि ये लंबी दूरी तक निगरानी और हमले की क्षमता रखते हैं। अमेरिकी अधिकारियों के मुताबिक, कुछ सहायक जहाज अभी रास्ते में हैं और जल्द क्षेत्र में शामिल हो सकते हैं।

ईरान पर दबाव और ट्रंप प्रशासन का रुख
पूर्व राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के आदेश के बाद अमेरिकी प्रशासन ने ईरान के बंदरगाहों पर नाकेबंदी जैसी स्थिति बनाने की रणनीति अपनाई है। ट्रंप का कहना है कि ईरान को परमाणु हथियार बनाने से रोकना उनकी प्राथमिकता है और किसी भी स्थिति में इसे स्वीकार नहीं किया जाएगा।
उन्होंने यह भी दावा किया कि बातचीत के बावजूद ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम पर रुख बदलने को तैयार नहीं है। उपराष्ट्रपति जेडी वेंस ने भी संकेत दिया है कि बातचीत में सबसे बड़ा मुद्दा यही बना हुआ है।
सीजफायर के बीच बढ़ता कूटनीतिक तनाव
हाल ही में पाकिस्तान में हुई लंबी बातचीत के बाद 2 सप्ताह के सीजफायर की घोषणा की गई थी, लेकिन इसके बावजूद दोनों देशों के बीच अविश्वास बना हुआ है। इस्लामाबाद में हुई वार्ता लगभग 21 घंटे चली, लेकिन कोई अंतिम समझौता नहीं निकल सका।
बातचीत विफल होने के बाद स्थिति और अधिक संवेदनशील हो गई है। अमेरिकी पक्ष का कहना है कि अगर समझौता नहीं हुआ तो दबाव और बढ़ाया जा सकता है, जबकि ईरान की ओर से अब तक कोई अंतिम सहमति नहीं दी गई है।










