हमारी आकाशगंगा मिल्की वे के बनने की कहानी धीरे-धीरे सामने आ रही है। वैज्ञानिकों को पुराने तारों की जांच से पता चला है कि अरबों साल पहले कई छोटी आकाशगंगाएं मिल्की वे में समा गई थीं। अब उन्हीं तारों की मदद से इसके करीब 12 अरब साल पुराने इतिहास को समझा जा रहा है।
Milky Way Galaxy: रात में साफ आसमान पर नजर आने वाली मिल्की वे का इतिहास जितना पुराना है, उतना ही दिलचस्प भी है। हमारी पृथ्वी और सूरज इसी आकाशगंगा का हिस्सा हैं। आज मिल्की वे में अरबों तारे मौजूद हैं, लेकिन शुरुआत से इसका आकार इतना बड़ा नहीं था। वैज्ञानिकों की मानें तो अरबों साल के दौरान कई छोटी आकाशगंगाएं इसके करीब आईं और इसमें मिलती चली गईं। उनके तारे भी मिल्की वे का हिस्सा बन गए। अब इन्हीं तारों को देखकर वैज्ञानिक यह जानने में जुटे हैं कि हमारी आकाशगंगा का शुरुआती दौर कैसा रहा होगा।
दूसरी आकाशगंगाओं के तारे भी हैं मिल्की वे में
मिल्की वे में मौजूद सभी तारों का जन्म यहीं नहीं हुआ था। कुछ तारे दूसरी आकाशगंगाओं से आए हैं। दरअसल, अंतरिक्ष में आकाशगंगाएं भी एक-दूसरे के गुरुत्वाकर्षण से प्रभावित होती हैं। जब कोई छोटी आकाशगंगा किसी बड़ी आकाशगंगा के काफी करीब पहुंच जाती है, तो उसके तारों की चाल बदलने लगती है।
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कई बार छोटी आकाशगंगा अपना अलग अस्तित्व खो देती है और उसके तारे बड़ी आकाशगंगा में फैल जाते हैं। यह सब अचानक नहीं होता। इस पूरी प्रक्रिया में करोड़ों से लेकर अरबों साल तक लग सकते हैं।
मिल्की वे ने भी अपने लंबे सफर में कई छोटी आकाशगंगाओं को अपने भीतर समाया है। उन आकाशगंगाओं के कुछ तारे आज भी हमारे आसपास के अंतरिक्ष में मौजूद हैं। फर्क सिर्फ इतना है कि अब वे मिल्की वे का हिस्सा बन चुके हैं।
तारों की चाल से मिल रहे पुराने इतिहास के सुराग
वैज्ञानिकों के सामने सबसे बड़ा सवाल यह है कि कौन-सा तारा मिल्की वे में पैदा हुआ और कौन बाहर से आया। इसका जवाब खोजने के लिए वे तारों की गति और उनमें मौजूद रासायनिक तत्वों का अध्ययन कर रहे हैं।
मिल्की वे के कई तारे आकाशगंगा के केंद्र के चारों ओर घूमते हैं। हालांकि, सभी तारों का रास्ता एक जैसा नहीं होता। कुछ तारे अलग दिशा में चलते हैं, तो कुछ की रफ्तार और कक्षा दूसरे तारों से काफी अलग होती है।
ऐसे तारों पर वैज्ञानिक खास ध्यान देते हैं। वे यह भी देखते हैं कि उनमें लोहा और दूसरे रासायनिक तत्व कितनी मात्रा में मौजूद हैं। एक जैसी परिस्थितियों में जन्मे तारों की रासायनिक बनावट में समानताएं मिल सकती हैं।
इन दोनों तरह की जानकारियों को मिलाकर शोधकर्ता अंदाजा लगाते हैं कि कौन-से तारे कभी एक ही समूह का हिस्सा रहे होंगे। अंतरिक्ष विज्ञान में इस तरीके को 'गैलेक्टिक आर्कियोलॉजी' कहा जाता है। आसान भाषा में समझें तो वैज्ञानिक पुराने तारों को पढ़कर आकाशगंगा का बीता हुआ इतिहास जानने की कोशिश करते हैं।
Gaia मिशन ने पुराने तारों तक पहुंचाया
मिल्की वे की इस कहानी को समझने में यूरोपीय अंतरिक्ष एजेंसी के Gaia मिशन की बड़ी भूमिका रही है। इस मिशन ने बड़ी संख्या में तारों की स्थिति, दूरी और उनकी गति से जुड़ी अहम जानकारी जुटाई है।
पहले इतने अधिक तारों की चाल का बारीकी से अध्ययन करना आसान नहीं था। लेकिन Gaia से मिले आंकड़ों ने वैज्ञानिकों के लिए यह काम काफी आसान कर दिया।
इन्हीं आंकड़ों की मदद से शोधकर्ताओं ने तारों के दो पुराने समूहों की पहचान की, जिन्हें 'शक्ति' और 'शिव' नाम दिया गया। इन समूहों से जुड़े तारे करीब 12 से 13 अरब साल पुराने माने जाते हैं।
इनकी खास बात यह है कि इनके तारों की गति और रासायनिक बनावट में कुछ समानताएं पाई गई हैं। वैज्ञानिक अब यह समझने की कोशिश कर रहे हैं कि इन समूहों का मिल्की वे के शुरुआती विकास से क्या संबंध रहा होगा।
इन खोजों से यह भी साफ हो रहा है कि हमारी आकाशगंगा का इतिहास सिर्फ नए तारों के बनने तक सीमित नहीं है। दूसरी आकाशगंगाओं के साथ हुए मेल-मिलाप ने भी इसके विकास में अहम भूमिका निभाई है।









