मनरेगा का नाम बदला: 125 दिन का मिलेगा रोजगार; कैबिनेट के फैसले से ग्रामीण भारत को क्या होगा फायदा?

केंद्र की कैबिनेट ने मनरेगा का नाम बदला और 125 दिन का रोजगार देने का फैसला किया। जानें इससे ग्रामीण भारत को क्या-क्या लाभ मिलेंगे। नाम बदलने के पीछे की सोच

केंद्र सरकार ने ग्रामीण रोजगार और सामाजिक सुरक्षा को मजबूत करने की दिशा में बड़ा कदम उठाया है। केंद्रीय मंत्रिमंडल ने महात्मा गांधी राष्ट्रीय ग्रामीण रोजगार गारंटी योजना (मनरेगा) में महत्वपूर्ण बदलावों को मंजूरी दे दी है। 

नई दिल्ली: केंद्रीय मंत्रिमंडल ने सामाजिक सुरक्षा को मजबूत करने के उद्देश्य से कई महत्वपूर्ण कानूनों को मंजूरी दी है। इसमें प्रमुख बदलावों में मनरेगा (MGNREGA) के तहत श्रमिकों को काम के लिए मिलने वाले दिनों की संख्या बढ़ाना, सिविल न्यूक्लियर एनर्जी के क्षेत्र में निजी कंपनियों को भागीदारी का मौका देना, और बीमा क्षेत्र में 100% तक विदेशी निवेश की अनुमति देकर बाजार और वित्तीय क्षेत्र को मजबूत करना शामिल है। 

इन कदमों से न केवल रोजगार और निवेश को बढ़ावा मिलेगा, बल्कि आर्थिक विकास और सामाजिक सुरक्षा के क्षेत्र में भी सुधार होगा। सरकार ने मनरेगा में बड़े बदलाव करते हुए इसे अधिक प्रभावी और लाभकारी बनाने का रास्ता तैयार किया है। केंद्रीय मंत्रिमंडल की मंजूरी के बाद सरकार जल्द ही संसद में मनरेगा का नाम बदलकर 'पूज्य बापू ग्रामीण रोजगार गारंटी बिल' करने के लिए नया बिल पेश करेगी।

मनरेगा का नया नाम क्या होगा? 125 दिन के रोजगार की गारंटी

कैबिनेट की मंजूरी के बाद सरकार जल्द ही संसद में एक नया विधेयक पेश करेगी, जिसके तहत मनरेगा का नाम बदलकर “पूज्य बापू ग्रामीण रोजगार गारंटी बिल” किया जाएगा। यह नया कानून मौजूदा मनरेगा की जगह लेगा और इसमें रोजगार, पारदर्शिता और योजना से जुड़े प्रावधानों को नए सिरे से परिभाषित किया जाएगा।

सबसे बड़ा बदलाव रोजगार के दिनों को लेकर किया गया है। अभी तक ग्रामीण परिवारों को एक वित्तीय वर्ष में 100 दिन का रोजगार मिलता था, जिसे अब बढ़ाकर 125 दिन कर दिया गया है। इसके लिए केंद्र सरकार लगभग 95,600 करोड़ रुपये खर्च करेगी। सरकार का मानना है कि अतिरिक्त 25 दिन का रोजगार ग्रामीण परिवारों की सालाना आय बढ़ाने में अहम भूमिका निभाएगा।

यह फैसला क्यों है अहम?

यह फैसला सामाजिक और राजनीतिक दोनों ही दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है। विपक्षी दल लंबे समय से आरोप लगाते रहे हैं कि केंद्र सरकार मनरेगा को कमजोर कर रही है और पर्याप्त फंड नहीं दे रही। ऐसे में रोजगार के दिनों को बढ़ाना और नया कानून लाना, सरकार की ओर से इन आरोपों का जवाब माना जा रहा है।

इसके अलावा, पश्चिम बंगाल जैसे राज्यों में आगामी चुनावों के मद्देनजर भी इस फैसले को अहम माना जा रहा है। मनरेगा को लेकर केंद्र और राज्य सरकारों के बीच लंबे समय से टकराव रहा है। केंद्र ने कथित वित्तीय अनियमितताओं के चलते 2022 से पश्चिम बंगाल को मनरेगा फंड देना रोक दिया था, जिस पर राजनीतिक विवाद गहराता गया।

नाम बदलने के पीछे की सोच

मनरेगा को नया नाम देने का फैसला भी राजनीतिक और वैचारिक रूप से महत्वपूर्ण है। वर्ष 2015 में बीजेपी ने मनरेगा को यूपीए सरकार की विफलता का प्रतीक बताया था। अब सरकार इसे संशोधित और मजबूत स्वरूप में पेश कर रही है। नए बिल के तहत होने वाले सभी कार्य ‘विकसित भारत नेशनल इंफ्रास्ट्रक्चर स्टैक’ का हिस्सा होंगे, जिन्हें पीएम गति शक्ति मास्टर प्लान के जरिए लागू किया जाएगा। इसमें खासतौर पर जल सुरक्षा और टिकाऊ ग्रामीण बुनियादी ढांचे पर फोकस होगा।

नए प्रावधानों के तहत राज्यों को खेती के मौसम को ध्यान में रखते हुए कम से कम 60 दिन पहले योजना बनानी होगी, ताकि कृषि कार्य के दौरान मजदूरों की कमी न हो। अगर किसी राज्य में किसी पात्र परिवार को काम नहीं मिल पाता है, तो उसे बेरोजगारी भत्ता देने का प्रावधान भी किया गया है।

आर्थिक विशेषज्ञों के अनुसार, 25 अतिरिक्त दिनों का रोजगार ग्रामीण परिवारों की खपत क्षमता को बढ़ाएगा। जब ग्रामीण क्षेत्रों में आय बढ़ती है, तो इसका सीधा असर स्थानीय बाजार, छोटे व्यापार और सेवाओं पर पड़ता है। इससे रोजगार सृजन के नए अवसर भी पैदा होंगे और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूती मिलेगी।

 

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