मसूरी में ‘प्लिंथ सर्टिफिकेट’ विवाद: कंक्रीट के जंगल में बदलती पहाड़ों की रानी पर मंडराया संकट

मसूरी में ‘प्लिंथ सर्टिफिकेट’ विवाद: कंक्रीट के जंगल में बदलती पहाड़ों की रानी पर मंडराया संकट

उत्तराखंड की पहचान और विश्व प्रसिद्ध पर्यटन स्थल मसूरी, जिसे “पहाड़ों की रानी” कहा जाता है, आज गंभीर पर्यावरणीय और प्रशासनिक संकट से जूझ रही है। प्राकृतिक सुंदरता, हरियाली और शांत वातावरण के लिए जानी जाने वाली मसूरी अब तेज़ी से कंक्रीट के जंगल में तब्दील होती जा रही है।

मसूरी: पहाड़ों की रानी मसूरी इन दिनों अपने सबसे कठिन दौर से गुजर रही है। प्राकृतिक सौंदर्य के लिए विश्वभर में पहचानी जाने वाली यह हिल स्टेशन अब तेजी से कंक्रीट के जंगल में तब्दील होती जा रही है। इसकी सबसे बड़ी वजह प्लिंथ सर्टिफिकेट के नाम पर चल रहा कथित खेल है, जिसने पूरे निर्माण तंत्र पर गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

आरोप है कि मसूरी में निर्माण की नींव अब जमीन पर नहीं, बल्कि कागजों पर रखी जा रही है। नगर पालिका परिषद द्वारा धड़ल्ले से प्लिंथ सर्टिफिकेट जारी किए जा रहे हैं, जिनके आधार पर पहाड़ों को काटकर बहुमंजिला इमारतें खड़ी की जा रही हैं। बताया जा रहा है कि पूर्व नगर पालिका बोर्ड के कार्यकाल में प्लिंथ सर्टिफिकेट जारी करने के दौरान नियमों की अनदेखी की गई, जिससे मसूरी की प्राकृतिक संरचना और पर्यावरण को गंभीर खतरा पैदा हो गया है।

क्या होता है प्लिंथ सर्टिफिकेट?

प्लिंथ सर्टिफिकेट किसी भी भवन निर्माण की शुरुआती स्वीकृति होती है, जिसके तहत नींव (plinth level) तक निर्माण की अनुमति दी जाती है। मसूरी में आरोप है कि नगर पालिका परिषद द्वारा नियमों की अनदेखी करते हुए बड़े पैमाने पर प्लिंथ सर्टिफिकेट जारी किए गए, जिनके आधार पर पहाड़ियों को काटकर बहुमंजिला इमारतें खड़ी की जा रही हैं।

स्थानीय लोगों और पर्यावरण कार्यकर्ताओं का दावा है कि पूर्व नगर पालिका बोर्ड के कार्यकाल में यह प्रक्रिया सबसे ज्यादा अनियंत्रित रही, जहां संवेदनशील और अधिसूचित क्षेत्रों में भी अनुमति दे दी गई।

वन विभाग और एमडीडीए की भूमिका पर सवाल

विवाद का एक बड़ा पहलू वन विभाग और मसूरी-देहरादून विकास प्राधिकरण (MDDA) की भूमिका को लेकर है। आरोप है कि:

  • बिना स्थलीय निरीक्षण के वन विभाग द्वारा एनओसी (No Objection Certificate) जारी की गई
  • उसी एनओसी के आधार पर एमडीडीए ने नक्शों को मंजूरी दे दी
  • खड़ी ढलानों, भूस्खलन संभावित क्षेत्रों और हरित पट्टियों में भी निर्माण को हरी झंडी मिल गई

इस कथित मिलीभगत ने मसूरी के पारिस्थितिकी तंत्र को गंभीर खतरे में डाल दिया है।

डोमेस्टिक नक्शे, लेकिन कमर्शियल इस्तेमाल

सूत्रों के अनुसार, अधिकांश भवनों के नक्शे डोमेस्टिक (आवासीय) श्रेणी में पास किए गए हैं, लेकिन ज़मीनी हकीकत इससे बिल्कुल अलग है। इन इमारतों में:

  • होटल
  • होमस्टे
  • कैफे
  • गेस्ट हाउस

जैसी व्यावसायिक गतिविधियां संचालित की जा रही हैं। यह न केवल भवन नियमों का उल्लंघन है, बल्कि मसूरी की कैरींग कैपेसिटी (Carrying Capacity) के साथ भी गंभीर खिलवाड़ है।

NGT की चेतावनी भी बेअसर

राष्ट्रीय हरित अधिकरण (NGT) पहले ही मसूरी में बढ़ते निर्माण और पर्यावरणीय दबाव को लेकर चेतावनी दे चुका है। बावजूद इसके:

  • दिन-रात जेसीबी मशीनों से पहाड़ काटे जा रहे हैं
  • प्रशासनिक निगरानी बेहद कमजोर दिख रही है
  • पर्यावरणीय मंजूरियों का खुलेआम उल्लंघन हो रहा है

इससे यह सवाल उठता है कि क्या NGT के निर्देश केवल कागज़ों तक सीमित रह गए हैं?

11 मीटर ऊंचाई नियम सिर्फ फाइलों में?

नियमों के अनुसार मसूरी में 11 मीटर से अधिक ऊंचाई का निर्माण प्रतिबंधित है। लेकिन वास्तविकता यह है कि इससे कहीं ऊंची इमारतें खड़ी हो चुकी हैं। यह साफ संकेत देता है कि या तो:

  • नियमों का पालन नहीं हो रहा
  • या फिर नियमों को नजरअंदाज करने वालों को संरक्षण मिल रहा है
  • खनन विभाग और प्रशासन की चुप्पी

स्थानीय नागरिकों का आरोप है कि खनन विभाग, जिला प्रशासन और संबंधित एजेंसियां इस पूरे मामले में मौन साधे हुए हैं। कई अधिकारियों पर भ्रष्टाचार और आंख मूंदकर अनुमति देने के आरोप भी लगाए जा रहे हैं।

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