बॉलीवुड की मुस्कान के पीछे छुपा दर्द - अभिनेत्री दुलारी की मार्मिक कहानी

बॉलीवुड की मुस्कान के पीछे छुपा दर्द - अभिनेत्री दुलारी की मार्मिक कहानी

यह कहानी है एक ऐसी शानदार अभिनेत्री की, जिनका फ़िल्मी सफ़र भले ही यादगार रहा, लेकिन जीवन का अंतिम पड़ाव बेहद अकेला और पीड़ादायक रहा। बॉलीवुड में वर्षों तक चरित्र अभिनेत्री के रूप में दर्शकों का दिल जीतने वाली दुलारी जी का बुढ़ापा पुणे के एक वृद्ध आश्रम में, अल्ज़ाइमर जैसी गंभीर बीमारी से जूझते हुए बीता।

सीधी-सादी, घरेलू महिला के किरदारों में नज़र आने वाली दुलारी जी को आज भी लोग सुनील दत्त की सुपरहिट फ़िल्म ‘पड़ोसन’ से याद करते हैं, जिसमें उन्होंने सुनील दत्त की मामी का किरदार निभाया था।

दुलारी जी का जन्म 18 अप्रैल 1928 को नागपुर में हुआ था। उनका असली नाम अम्बिका था। परिवार में उन्हें प्यार से राज दुलारी कहा जाता था और यही नाम आगे चलकर फ़िल्मी दुनिया में उनका पहचान बन गया। उनके पूर्वज उत्तर प्रदेश से आकर नागपुर में बस गए थे।

उन्होंने अपने फ़िल्मी करियर की शुरुआत 1941 में आई फ़िल्म ‘झूला’ से की थी, जिसमें वे केवल एक दृश्य में दिखाई दी थीं। इसके बाद उन्होंने लगातार फिल्मों में काम किया, लेकिन 1947 की फ़िल्म ‘शहनाई’ और उसका मशहूर गीत ‘आना मेरी जान, संडे के संडे’ ने उन्हें विशेष पहचान दिलाई। यह गीत दुलारी जी पर ही फिल्माया गया था और उनके अपोज़िट अभिनेता मुमताज़ अली थे, जो बाद में मशहूर कॉमेडियन महमूद के पिता बने।

लंबे समय तक चरित्र भूमिकाएं निभाने के बाद दुलारी जी का स्वास्थ्य गिरने लगा। विनोद खन्ना की फ़िल्म ‘सूर्या’ की शूटिंग के दौरान एक दृश्य में उन्हें लगभग 200 लोगों की भीड़ के साथ दौड़ना था। गठिया की बीमारी से पीड़ित होने के कारण वे दौड़ते-दौड़ते गिर पड़ीं। उस दिन अगर अभिनेता सलीम गौस ने उन्हें समय रहते न बचाया होता, तो बड़ा हादसा हो सकता था। संयोग से उसी फ़िल्म में सलीम गौस उनके बेटे की भूमिका निभा रहे थे।

इस घटना के बाद दुलारी जी ने फ़िल्मों से दूरी बना ली। हालांकि 1997 में आई सनी देओल की फ़िल्म ‘ज़िद्दी’ उनकी आखिरी फ़िल्म साबित हुई, जिसे उन्होंने निर्देशक गुड्डू धनोवा के काफी आग्रह पर स्वीकार किया था।

फ़िल्मी दुनिया से संन्यास लेने के बाद उनका जीवन संघर्षों से भर गया। पहले वे मुंबई में रहीं, लेकिन बाद में आर्थिक मजबूरियों के चलते अपना फ्लैट बेचकर इंदौर में अपनी इकलौती बेटी के साथ रहने लगीं। बुढ़ापे में उन्हें अल्ज़ाइमर हो गया और वे धीरे-धीरे अपनी पूरी याददाश्त खो बैठीं। पैसों की तंगी के कारण उन्हें समुचित इलाज भी नहीं मिल पा रहा था।

ऐसे कठिन समय में अभिनेत्री वहीदा रहमान के कहने पर सिने एंड टेलीविज़न आर्टिस्ट्स एसोसिएशन (CINTAA) ने दुलारी जी के इलाज के लिए कुछ आर्थिक मदद की। उनकी बेटी ही उनकी मुख्य देखभालकर्ता थीं। उनके नाती-नातिन ऑस्ट्रेलिया में रहते थे, जो कभी-कभी आर्थिक सहायता भेजते थे।

दुलारी जी के जीवन के अंतिम दिन पुणे के एक वृद्धाश्रम में बीते। वहीं अल्ज़ाइमर से लड़ते-लड़ते 18 जनवरी 2013 को, 85 वर्ष की उम्र में उन्होंने इस दुनिया को अलविदा कह दिया।

दुलारी जी की कहानी सिर्फ एक अभिनेत्री की नहीं, बल्कि उस फ़िल्मी दुनिया की भी है जहाँ चमक-दमक के पीछे कई कलाकार गुमनामी और अकेलेपन में जीवन समाप्त कर देते हैं। आज उनके जन्मदिन पर उन्हें नमन।

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