मुजफ्फरपुर के बाजारों में सब्जी खरीदने वाले लोगों के लिए बेहद सावधान करने वाली खबर सामने आई है। बाजार में हरी, चमकदार और देखने में बिल्कुल ताजी नजर आने वाली हर सब्जी वास्तव में ताजी हो, यह जरूरी नहीं है। सामने आई जानकारी के अनुसार शहर के कुछ बाजारों में खराब और बासी हो चुकी सब्जियों को रसायनों के जरिए दोबारा चमकदार और ताजा दिखाकर बेचने का कथित मामला सामने आया है। इस पूरे मामले से आम उपभोक्ताओं की सेहत और बाजारों में खाद्य सुरक्षा की निगरानी को लेकर गंभीर सवाल खड़े हो गए हैं।
मामला तब चर्चा में आया जब सब्जियों को किसी रासायनिक घोल के जरिए हरा और चमकदार बनाए जाने से जुड़ी एक तस्वीर इंटरनेट मीडिया पर तेजी से प्रसारित होने लगी। तस्वीर सामने आने के बाद लोगों के बीच यह चिंता बढ़ गई कि कहीं बाजार में आकर्षक दिखने वाली सब्जियों को कृत्रिम तरीके से तो ताजा नहीं बनाया जा रहा। हालांकि, किसी खास दुकान, कारोबारी या व्यक्ति के खिलाफ इस मामले में दोष सिद्ध होने की बात सामने नहीं आई है और इस्तेमाल किए जा रहे रसायन की आधिकारिक पुष्टि भी प्रयोगशाला जांच के बाद ही हो सकती है।
बताया जा रहा है कि कथित तौर पर खराब या कई घंटे पुरानी सब्जियों को एक रासायनिक घोल में डुबोया जाता है। इसके बाद सब्जियों की बाहरी रंगत और चमक कुछ समय के लिए बदल जाती है और वे देखने में पहले की तुलना में अधिक हरी तथा ताजी दिखाई देने लगती हैं। यही बाहरी चमक ग्राहक को आकर्षित करती है। ग्राहक सामान्य तौर पर सब्जी की ताजगी का अनुमान उसके रंग, चमक और मजबूती से लगाता है। ऐसे में यदि किसी बासी सब्जी को कृत्रिम तरीके से ताजा जैसा दिखा दिया जाए, तो आम खरीदार के लिए वास्तविक और कृत्रिम ताजगी के बीच अंतर करना मुश्किल हो सकता है।
इस कथित तरीके से सब्जियों को दोबारा बाजार में खपाने का उद्देश्य मुनाफा कमाना बताया जा रहा है। सामान्य स्थिति में खराब होने लगी सब्जियों की कीमत कम हो सकती है या उन्हें बेचने में दुकानदार को नुकसान उठाना पड़ सकता है। लेकिन यदि उनकी बाहरी रंगत बदलकर उन्हें ताजा जैसा दिखाया जाए तो ग्राहक उन्हें सामान्य या अधिक कीमत पर खरीद सकता है। यही वजह है कि इस तरह की मिलावट को केवल खाद्य गुणवत्ता का मामला नहीं, बल्कि उपभोक्ता के साथ धोखे के रूप में भी देखा जा रहा है।
जानकारी में मैलाकाइट ग्रीन और कॉपर सल्फेट जैसे रसायनों के इस्तेमाल को लेकर भी चिंता जताई गई है। चिकित्सकीय दृष्टि से इन पदार्थों के संपर्क या सेवन से स्वास्थ्य संबंधी गंभीर जोखिम हो सकते हैं। रिपोर्ट में मैलाकाइट ग्रीन को औद्योगिक रंग बताया गया है और इसके लगातार सेवन से गंभीर स्वास्थ्य समस्याओं का खतरा बताया गया है। वहीं कॉपर सल्फेट के सेवन से पेट संबंधी परेशानी, उल्टी और शरीर के महत्वपूर्ण अंगों पर प्रतिकूल प्रभाव पड़ने की आशंका जताई गई है। हालांकि, मुजफ्फरपुर के बाजारों में वास्तव में कौन-सा रसायन इस्तेमाल किया गया है, इसकी पुष्टि वैज्ञानिक जांच और नमूने की प्रयोगशाला जांच से ही हो सकेगी।
इस मामले का सबसे गंभीर पहलू यही है कि यदि किसी सब्जी पर ऐसा रसायन इस्तेमाल किया गया हो और वह बिना उचित सफाई के भोजन में पहुंच जाए, तो उपभोक्ता को इसका पता भी नहीं चल सकता। सब्जी की बाहरी चमक देखकर खरीदार उसे सामान्य समझ सकता है और घर ले जाकर खाना बना सकता है। बच्चों, बुजुर्गों और पहले से कमजोर स्वास्थ्य वाले लोगों के लिए दूषित खाद्य पदार्थों का सेवन विशेष रूप से चिंता का विषय हो सकता है।
मुजफ्फरपुर जैसे बड़े शहर में रोजाना बड़ी संख्या में लोग स्थानीय बाजारों से सब्जियां खरीदते हैं। घरों से लेकर होटल, रेस्तरां, ढाबे और छोटे-बड़े भोजनालयों तक सब्जियों की मांग रहती है। ऐसे में यदि बाजार में किसी स्तर पर खाद्य पदार्थों के साथ इस तरह की छेड़छाड़ हो रही है तो इसका प्रभाव केवल कुछ ग्राहकों तक सीमित नहीं रहेगा। बड़ी मात्रा में सब्जियों की बिक्री होने के कारण संभावित जोखिम भी व्यापक हो सकता है।
सबसे बड़ी चुनौती यह है कि आम ग्राहक के पास सब्जी खरीदते समय किसी रासायनिक मिलावट की वैज्ञानिक जांच करने का कोई साधन नहीं होता। वह मुख्य रूप से रंग, आकार, चमक और मजबूती देखकर सब्जी का चुनाव करता है। इसी कमजोरी का फायदा उठाकर यदि किसी खराब सब्जी को बाहरी तौर पर आकर्षक बनाया जा रहा है, तो उपभोक्ता आसानी से भ्रमित हो सकता है।
ऐसे में लोगों को अत्यधिक चमकदार और अस्वाभाविक रूप से गहरे हरे रंग वाली सब्जियों को लेकर सतर्क रहने की सलाह दी जा रही है। रिपोर्ट के अनुसार प्राकृतिक सब्जियों में रंग और आकार में कुछ अंतर होना सामान्य है। यदि कोई सब्जी जरूरत से ज्यादा चमकीली, एक समान और असामान्य रूप से हरी दिखाई दे तो उसे खरीदने से पहले सावधानी बरतना बेहतर है।
कुछ घरेलू स्तर के संकेतों से भी लोग शुरुआती तौर पर सावधानी बरत सकते हैं। रिपोर्ट में हरी मिर्च, परवल और भिंडी जैसी सब्जियों को गीले कॉटन से रगड़कर देखने की बात कही गई है। यदि कॉटन पर असामान्य रूप से हरा रंग उतरता है, तो सब्जी की गुणवत्ता को लेकर सतर्क होना चाहिए। हालांकि, यह घरेलू परीक्षण किसी रसायन की वैज्ञानिक पुष्टि नहीं करता। अंतिम पुष्टि के लिए खाद्य नमूने की प्रयोगशाला जांच ही विश्वसनीय तरीका होगी।
सब्जियों को घर लाने के बाद अच्छी तरह धोना भी जरूरी है। रिपोर्ट में सब्जियों को पकाने से पहले कुछ समय तक पानी में भिगोकर रखने का सुझाव दिया गया है। हालांकि, यह समझना जरूरी है कि केवल धोने या भिगोने से हर प्रकार के रासायनिक पदार्थ के पूरी तरह हट जाने की गारंटी नहीं होती। यदि सब्जी की गुणवत्ता संदिग्ध लगे या रंग असामान्य तरीके से निकलता दिखाई दे तो उसका सेवन करने के बजाय उसे अलग कर देना अधिक सुरक्षित विकल्प हो सकता है।
इस पूरे मामले ने जिला खाद्य सुरक्षा विभाग की निगरानी व्यवस्था पर भी सवाल खड़े किए हैं। यदि वास्तव में बाजार में बासी सब्जियों को रसायन के माध्यम से ताजा दिखाकर बेचने की गतिविधि चल रही है, तो नियमित निरीक्षण और नमूना जांच की व्यवस्था की प्रभावशीलता पर सवाल उठना स्वाभाविक है। बाजार में बिकने वाले खाद्य पदार्थों की गुणवत्ता की निगरानी संबंधित विभाग की महत्वपूर्ण जिम्मेदारी है।
स्थानीय नागरिकों और सामाजिक कार्यकर्ताओं की ओर से मांग उठाई जा रही है कि शहर के प्रमुख सब्जी बाजारों में औचक जांच अभियान चलाया जाए। संदिग्ध सब्जियों के नमूने लिए जाएं और उन्हें मान्यता प्राप्त प्रयोगशाला में भेजकर जांच कराई जाए। यदि जांच में प्रतिबंधित या स्वास्थ्य के लिए हानिकारक रसायनों का इस्तेमाल साबित होता है, तो संबंधित लोगों के खिलाफ खाद्य सुरक्षा कानूनों के तहत सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए।
इस मामले में सबसे जरूरी बात यह है कि सोशल मीडिया पर प्रसारित तस्वीर या किसी आरोप को अंतिम सत्य मानने के बजाय वैज्ञानिक जांच को आधार बनाया जाए। तस्वीर से संदेह पैदा हो सकता है, लेकिन यह अपने आप में यह साबित नहीं करती कि मुजफ्फरपुर के सभी बाजारों में इसी तरीके से सब्जियां बेची जा रही हैं। इसलिए जांच एजेंसियों के लिए जरूरी होगा कि वे संदिग्ध सब्जियों के नमूने लेकर रासायनिक परीक्षण कराएं और उसके बाद ही स्पष्ट करें कि वास्तव में कौन-सा पदार्थ इस्तेमाल हुआ और उसकी मात्रा कितनी थी।
उपभोक्ताओं को भी इस मामले में जागरूक रहने की जरूरत है। सब्जी खरीदते समय केवल चमकदार रंग देखकर उसकी ताजगी तय नहीं करनी चाहिए। सब्जी की गंध, बनावट, प्राकृतिक रंग और मजबूती को भी देखना चाहिए। बहुत ज्यादा चमकदार या असामान्य रंग वाली सब्जी दिखे तो उसके स्रोत और गुणवत्ता के बारे में दुकानदार से जानकारी ली जा सकती है। यदि किसी सब्जी पर संदेह हो तो उसे खरीदने से बचना बेहतर है।
मुजफ्फरपुर में सामने आई यह चिंता ऐसे समय में महत्वपूर्ण है जब उपभोक्ता पहले से ही मिलावटी खाद्य पदार्थों को लेकर सतर्क हैं। हाल के दिनों में जिले में नकली और मिलावटी उत्पादों से जुड़ी अलग-अलग शिकायतें और कार्रवाई की खबरें सामने आती रही हैं। ऐसे में सब्जियों की गुणवत्ता पर उठे सवालों को भी गंभीरता से लेना जरूरी है। जिला उपभोक्ता संरक्षण व्यवस्था को लेकर हाल में हुई चर्चा में भी बाजार में नकली घी, पनीर, खाद-बीज और कीटनाशक जैसी चीजों से संबंधित उपभोक्ता समस्याओं का उल्लेख हुआ था।
अब जरूरत इस बात की है कि प्रशासन केवल तस्वीर या शिकायत सामने आने के बाद कार्रवाई करने के बजाय नियमित रूप से बाजारों की जांच करे। सब्जी मंडियों और खुदरा बाजारों से समय-समय पर नमूने लिए जाएं, संदिग्ध खाद्य पदार्थों की जांच कराई जाए और नियमों का उल्लंघन करने वालों पर कार्रवाई की जाए। इससे न केवल मौजूदा मामले की सच्चाई सामने आएगी बल्कि भविष्य में इस तरह की गतिविधियों पर भी रोक लगाई जा सकेगी।
फिलहाल मुजफ्फरपुर के लोगों के लिए सबसे बड़ा संदेश यही है कि सब्जी का चमकदार और गहरा हरा रंग हमेशा उसकी ताजगी की गारंटी नहीं है। बाजार में सामने आए कथित केमिकल इस्तेमाल के मामले की वैज्ञानिक जांच जरूरी है। जब तक किसी खास रसायन और उसके इस्तेमाल की आधिकारिक पुष्टि नहीं हो जाती, तब तक आरोपों को आरोप के तौर पर ही देखा जाना चाहिए। लेकिन उपभोक्ताओं की सुरक्षा के लिहाज से शिकायत की गंभीरता को नजरअंदाज भी नहीं किया जा सकता। यदि जांच में बासी सब्जियों को रसायनों के जरिए ताजा दिखाकर बेचने की पुष्टि होती है, तो यह खाद्य सुरक्षा के साथ गंभीर खिलवाड़ माना जाएगा और जिम्मेदार लोगों पर कड़ी कार्रवाई की जरूरत होगी।










