नालंदा सदर अस्पताल में बच्चे की मौत के बाद बवाल: डॉक्टर-स्टाफ से मारपीट, 11 घंटे ठप रही OPD-इमरजेंसी; इलाज के लिए भटके मरीज

नालंदा सदर अस्पताल में बच्चे की मौत के बाद परिजनों ने हंगामा और तोड़फोड़ की। डॉक्टर-स्टाफ से मारपीट के बाद OPD-इमरजेंसी करीब 11 घंटे ठप रही।
नालंदा सदर अस्पताल में बच्चे की मौत के बाद बवाल: डॉक्टर-स्टाफ से मारपीट, 11 घंटे ठप रही OPD-इमरजेंसी; इलाज के लिए भटके मरीज
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बिहार के नालंदा जिले के बिहारशरीफ सदर अस्पताल में तीन साल के बच्चे की इलाज के दौरान मौत के बाद बुधवार देर रात जमकर हंगामा हुआ। बच्चे की मौत से नाराज परिजनों ने डॉक्टर पर ड्यूटी के दौरान मौजूद नहीं रहने का आरोप लगाते हुए अस्पताल में हंगामा और तोड़फोड़ शुरू कर दी। देखते ही देखते स्थिति इतनी बिगड़ गई कि इमरजेंसी में तैनात डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी खुद अपनी जान बचाने के लिए इधर-उधर छिपने को मजबूर हो गए। आरोप है कि आक्रोशित लोगों ने डॉक्टर को खदेड़कर पीटा और महिला स्वास्थ्यकर्मियों के साथ भी मारपीट और अभद्रता की। घटना के बाद अस्पताल में काम कर रहे डॉक्टरों और कर्मचारियों में भारी आक्रोश फैल गया।

घटना के विरोध में डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों ने रात करीब 2 बजे से अस्पताल की OPD और इमरजेंसी सेवाएं बंद कर दीं। करीब 11 घंटे तक मरीजों को इलाज के लिए परेशान होना पड़ा। अस्पताल पहुंचने वाले कई मरीजों और उनके परिजनों को बिना इलाज के लौटना पड़ा, जबकि गंभीर मरीजों के सामने भी परेशानी खड़ी हो गई। कुछ मरीजों को मजबूरी में निजी अस्पताल और क्लीनिकों का रुख करना पड़ा।

मिली जानकारी के मुताबिक बिहारशरीफ के छोटी पहाड़ी मोहल्ले से परिजन तीन वर्षीय बच्चे को लेकर रात करीब 12 बजे सदर अस्पताल पहुंचे थे। बच्चा डिहाइड्रेशन की समस्या से पीड़ित था। अस्पताल में शिशु वार्ड के प्रभारी डॉ. अजय कुमार ने बच्चे की प्राथमिक जांच के बाद इलाज शुरू किया। बताया गया कि डॉक्टर इसके बाद एसएनसीयू में भर्ती दूसरे बच्चों को देखने चले गए थे। इस दौरान स्वास्थ्यकर्मी बच्चे का इलाज कर रहे थे, लेकिन इसी बीच उसकी मौत हो गई। बच्चे की मौत की जानकारी मिलते ही परिजन आक्रोशित हो गए।

परिजनों का आरोप था कि बच्चे की हालत गंभीर होने के बावजूद समय पर उचित इलाज नहीं मिल सका और डॉक्टर मौके पर मौजूद नहीं थे। इसी बात को लेकर अस्पताल में विवाद बढ़ गया। पहले परिजनों ने डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों से सवाल-जवाब शुरू किए, लेकिन कुछ ही देर में स्थिति हंगामे में बदल गई। अस्पताल परिसर में तोड़फोड़ शुरू होने के बाद वहां मौजूद मरीजों और उनके परिजनों में भी अफरा-तफरी मच गई।

आरोप है कि आक्रोशित लोगों ने इमरजेंसी वार्ड में पहुंचकर वहां मरीजों का इलाज कर रहे डॉ. अमित कुमार के साथ मारपीट की। बताया गया कि डॉक्टर को भीड़ ने खदेड़ा और उनके साथ मारपीट की गई। अस्पताल में मौजूद महिला स्वास्थ्यकर्मियों के साथ भी गाली-गलौज और अभद्रता किए जाने का आरोप है। स्थिति बिगड़ने के बाद कई कर्मचारियों ने खुद को कमरों में बंद कर लिया और वहीं छिपकर अपनी जान बचाई।

हंगामे और तोड़फोड़ के दौरान अस्पताल के कुछ हिस्सों में नुकसान भी हुआ। दरवाजे टूटने और कांच बिखरने की तस्वीरें सामने आई हैं। घटना के बाद अस्पताल का माहौल पूरी तरह तनावपूर्ण हो गया। इलाज कराने आए मरीज और उनके परिजन भी इस घटनाक्रम से घबरा गए। मेडिकल स्टाफ के बीच यह सवाल उठने लगा कि अगर अस्पताल में ड्यूटी के दौरान उनकी सुरक्षा सुनिश्चित नहीं है, तो वे गंभीर परिस्थितियों में मरीजों का इलाज कैसे कर पाएंगे।

घटना की जानकारी मिलने के बाद बिहारशरीफ और लहेरी थाने की पुलिस मौके पर पहुंची। पुलिस ने स्थिति को नियंत्रित करने की कोशिश की और अस्पताल परिसर में बढ़ते तनाव को शांत कराया। इसके बाद भी डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों में घटना को लेकर नाराजगी बनी रही। सुरक्षा को लेकर डॉक्टरों ने काम बंद करने का फैसला लिया और रात करीब 2 बजे से OPD तथा इमरजेंसी सेवाएं बाधित हो गईं।

अस्पताल में सेवाएं बंद होने का सबसे ज्यादा असर मरीजों पर पड़ा। सुबह से ही सदर अस्पताल में इलाज और जांच के लिए आने वाले मरीजों की संख्या कम नहीं हुई, लेकिन डॉक्टरों के काम बंद करने से मरीजों को परेशानी उठानी पड़ी। दूर-दराज के इलाकों से आए मरीजों और उनके परिजनों को काफी देर तक इंतजार करना पड़ा। कई लोग अस्पताल की स्थिति देखकर दूसरे अस्पतालों की ओर चले गए।

सदर अस्पताल नालंदा का प्रमुख सरकारी अस्पताल है, जहां जिले के अलग-अलग हिस्सों से मरीज इलाज के लिए पहुंचते हैं। ऐसे में OPD और इमरजेंसी जैसी सेवाओं के ठप होने से बड़ी संख्या में लोगों को परेशानी का सामना करना पड़ा। सामान्य इलाज के लिए आने वाले मरीजों के अलावा गंभीर स्थिति वाले मरीजों और उनके परिजनों की चिंता भी बढ़ गई। अस्पताल परिसर में लंबे समय तक इलाज की व्यवस्था प्रभावित रहने से लोगों को वैकल्पिक अस्पतालों की तलाश करनी पड़ी।

इस पूरे घटनाक्रम ने अस्पतालों में डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की सुरक्षा को लेकर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। अस्पताल प्रबंधन की ओर से बताया गया कि परिसर में 100 से अधिक गार्ड और होमगार्ड जवानों की तैनाती है। इसके बावजूद जिस समय हंगामा और मारपीट हुई, उस दौरान सुरक्षा व्यवस्था प्रभावी तरीके से काम क्यों नहीं कर सकी, इसे लेकर सवाल उठ रहे हैं।

मेडिकल स्टाफ का कहना है कि मरीज की मौत के बाद परिजनों को दुख और गुस्सा होना स्वाभाविक है, लेकिन डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मियों के साथ मारपीट या अस्पताल में तोड़फोड़ किसी समस्या का समाधान नहीं है। स्वास्थ्यकर्मियों के मुताबिक ऐसे माहौल में डॉक्टर खुद को असुरक्षित महसूस करते हैं और इसका सीधा असर अस्पताल की सेवाओं पर पड़ता है। उनका कहना है कि अस्पताल में इलाज व्यवस्था के साथ-साथ डॉक्टरों और कर्मचारियों की सुरक्षा की पुख्ता व्यवस्था भी जरूरी है।

दूसरी तरफ बच्चे के परिजनों का आरोप है कि अगर समय पर डॉक्टर उपलब्ध रहते और बच्चे को बेहतर इलाज मिलता तो शायद उसकी जान बच सकती थी। हालांकि बच्चे की मौत के वास्तविक कारण और इलाज में किसी तरह की लापरवाही हुई या नहीं, इसका अंतिम निष्कर्ष जांच के बाद ही सामने आएगा। फिलहाल दोनों पक्षों के आरोपों के बीच अस्पताल प्रशासन ने मामले की जांच की बात कही है।

अस्पताल के उपाधीक्षक डॉ. राजीव रंजन ने मामले की जांच कर डॉक्टरों और संबंधित स्वास्थ्यकर्मियों से बात कर समाधान निकालने की बात कही है। प्रशासन की कोशिश है कि विवाद को शांत कराया जाए और अस्पताल में चिकित्सा सेवाएं जल्द से जल्द सामान्य की जाएं। डॉक्टरों की सुरक्षा और घटना के लिए जिम्मेदार लोगों पर कार्रवाई को लेकर भी चर्चा चल रही है।

इस घटना के बाद एक बड़ा सवाल यह भी है कि अस्पताल जैसे संवेदनशील स्थान पर सुरक्षा व्यवस्था कितनी प्रभावी है। सदर अस्पताल में बड़ी संख्या में सुरक्षाकर्मियों की तैनाती के बावजूद अगर भीड़ इमरजेंसी वार्ड तक पहुंचकर डॉक्टर और कर्मचारियों के साथ मारपीट कर सकती है, तो सुरक्षा व्यवस्था की समीक्षा की जरूरत है। मेडिकल स्टाफ के बीच यह मांग उठ रही है कि अस्पताल के संवेदनशील हिस्सों में सुरक्षा कर्मियों की स्थायी मौजूदगी सुनिश्चित की जाए और किसी भी विवाद की स्थिति में तुरंत हस्तक्षेप हो।

घटना ने मरीजों और स्वास्थ्यकर्मियों के बीच भरोसे के सवाल को भी सामने ला दिया है। मरीज और उनके परिजन चाहते हैं कि उन्हें समय पर और बेहतर इलाज मिले, जबकि डॉक्टर और स्वास्थ्यकर्मी चाहते हैं कि इलाज के दौरान उन्हें सुरक्षित माहौल मिले। दोनों पक्षों के बीच भरोसा बनाए रखना अस्पताल की व्यवस्था के लिए बेहद जरूरी है। किसी मरीज की मौत के बाद अगर जांच और संवाद के बजाय हिंसा शुरू हो जाती है, तो इसका नुकसान अंततः दूसरे मरीजों को भी उठाना पड़ता है।

नालंदा सदर अस्पताल में हुए इस घटनाक्रम का असर कई घंटे तक स्वास्थ्य सेवाओं पर दिखाई दिया। बच्चे की मौत से शुरू हुआ विवाद डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों के साथ मारपीट, तोड़फोड़ और फिर OPD-इमरजेंसी बंद होने तक पहुंच गया। करीब 11 घंटे तक मरीजों को परेशानियों का सामना करना पड़ा। बाद में प्रशासन की पहल के बाद इमरजेंसी सेवाएं बहाल की गईं। फिलहाल अस्पताल प्रशासन और पुलिस पूरे मामले की जांच में जुटे हैं

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