NASA का Moon Base Programme क्या है, भारत को इसमें शामिल करने की जरूरत क्यों महसूस हुई?

NASA ने ISRO को Moon Base Programme में शामिल होने का न्योता दिया है। जानें चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव पर मानव बेस बनाने की योजना और भारत की भूमिका।

NASA ने ISRO को Moon Base Programme में शामिल होने का न्योता दिया है। इसका लक्ष्य चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास मानव उपस्थिति कायम करना है, जहां वैज्ञानिक रिसर्च और भविष्य के अंतरिक्ष मिशनों की तैयारी होगी।

NASA Moon Base Programme: अमेरिका ने भारत को अपने महत्वाकांक्षी चंद्रमा मिशन में साझेदार बनने का प्रस्ताव दिया है। NASA का कार्यक्रम चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास एक स्थायी मानव आउटपोस्ट विकसित करने पर केंद्रित है। 5-6 अगस्त 2026 को बेंगलुरु में हुई India-US Civil Space Joint Working Group की बैठक के दौरान ISRO को इसमें शामिल होने का औपचारिक निमंत्रण दिया गया।

NASA का Moon Base Programme क्या है?

NASA का Moon Base Programme सिर्फ चंद्रमा पर जाकर कुछ दिनों तक रहने वाले मिशनों तक सीमित नहीं है। इसका मकसद चंद्रमा पर लंबे समय तक मानव उपस्थिति के लिए जरूरी ढांचा तैयार करना है। इसके तहत अलग-अलग चरणों में रोबोटिक और मानव मिशनों के जरिए चंद्र सतह पर लैंडिंग, वैज्ञानिक अध्ययन, जरूरी उपकरण और रहने की सुविधाएं विकसित की जाएंगी।

इस कार्यक्रम का मुख्य केंद्र चंद्रमा का दक्षिणी ध्रुव होगा। NASA के अनुसार यहां ऐसी जगहें मौजूद हैं जहां लंबे समय तक सूर्य की रोशनी रहती है, जबकि कुछ क्रेटर हमेशा छाया में रहते हैं। इन permanently shadowed regions में पानी की बर्फ मौजूद होने की संभावना है। यह पानी भविष्य में पीने, ऑक्सीजन बनाने और रॉकेट ईंधन तैयार करने के लिए महत्वपूर्ण संसाधन बन सकता है।

चंद्रमा के South Pole पर ही क्यों फोकस?

चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव को भविष्य की मानव अंतरिक्ष गतिविधियों के लिए रणनीतिक क्षेत्र माना जा रहा है। यहां मौजूद पानी की बर्फ लंबे समय तक रहने वाले मिशनों के लिए बेहद उपयोगी हो सकती है। पृथ्वी से हर जरूरी संसाधन ले जाना महंगा और तकनीकी रूप से कठिन है। इसलिए स्थानीय संसाधनों का इस्तेमाल Moon Base को अधिक टिकाऊ बनाने में मदद कर सकता है।

भारत के लिए इस क्षेत्र का महत्व इसलिए भी बढ़ जाता है क्योंकि Chandrayaan-3 ने अगस्त 2023 में चंद्रमा के दक्षिणी ध्रुव के पास सफल सॉफ्ट लैंडिंग की थी। इस उपलब्धि ने भारत को इस क्षेत्र में महत्वपूर्ण अनुभव दिया है।

NASA का लक्ष्य चंद्रमा को भविष्य के गहरे अंतरिक्ष अभियानों के लिए एक तरह के टेस्टिंग ग्राउंड के रूप में इस्तेमाल करना भी है। यहां विकसित तकनीक, जीवन-समर्थन प्रणाली और स्थानीय संसाधनों के इस्तेमाल का अनुभव आगे चलकर Mars missions में काम आ सकता है।

भारत को क्यों मिला NASA का निमंत्रण?

NASA और ISRO के बीच अंतरिक्ष सहयोग पहले से जारी है। भारत ने 2023 में Artemis Accords पर हस्ताक्षर किए थे, जिसके तहत शांतिपूर्ण और सहयोगात्मक तरीके से चंद्रमा तथा अन्य अंतरिक्ष अभियानों में भागीदारी का ढांचा तैयार होता है। Moon Base Programme में ISRO को शामिल करने का प्रस्ताव इसी सहयोग को अगले स्तर पर ले जाने की दिशा में देखा जा रहा है।

5 और 6 अगस्त 2026 को बेंगलुरु में हुई नौवीं India-US Civil Space Joint Working Group बैठक में NASA ने ISRO को Moon Base Programme से जुड़ने का औपचारिक निमंत्रण दिया। बैठक में दोनों देशों के बीच नागरिक और वाणिज्यिक अंतरिक्ष सहयोग के विस्तार पर भी चर्चा हुई।

भारत और अमेरिका के बीच NISAR मिशन और Axiom-4 मिशन जैसी उपलब्धियां पहले ही सहयोग की मजबूत नींव तैयार कर चुकी हैं। ऐसे में Moon Base Programme में भारत की संभावित भागीदारी ISRO को अंतरराष्ट्रीय चंद्र अन्वेषण के बड़े प्रयास में नई भूमिका दे सकती है।

Moon Base की वैश्विक होड़ में भारत की भूमिका

चंद्रमा पर लंबे समय तक मानव उपस्थिति स्थापित करने की कोशिश केवल अमेरिका तक सीमित नहीं है। चीन और रूस भी International Lunar Research Station के जरिए चंद्रमा पर एक स्थायी शोध केंद्र विकसित करने की दिशा में काम कर रहे हैं। इससे आने वाले वर्षों में चंद्रमा अंतरिक्ष विज्ञान के साथ-साथ वैश्विक अंतरिक्ष सहयोग और रणनीतिक प्रतिस्पर्धा का भी महत्वपूर्ण केंद्र बन सकता है।

भारत की Chandrayaan-3 उपलब्धि, Artemis Accords में भागीदारी और मानव अंतरिक्ष उड़ान कार्यक्रम जैसी पहलों को देखते हुए NASA के Moon Base Programme में संभावित साझेदारी ISRO के लिए महत्वपूर्ण अवसर हो सकती है। इससे भारत को चंद्रमा पर भविष्य की वैज्ञानिक रिसर्च, तकनीकी विकास और मानव अंतरिक्ष अभियानों में अपनी भूमिका मजबूत करने का मौका मिल सकता है।

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