NEET छात्रा मौत मामला: 90 दिन में चार्जशीट नहीं, मुख्य आरोपी को जमानत, CBI की जांच पर उठे सवाल

बिहार की राजधानी पटना में NEET छात्रा की मौत मामले में CBI 90 दिन में भी चार्जशीट दाखिल नहीं कर सकी। कोर्ट ने मुख्य आरोपी मनीष रंजन को जमानत दे दी है ।

पटना में NEET छात्रा की संदिग्ध मौत मामले में CBI समय पर चार्जशीट दाखिल नहीं कर सकी। 90 दिन की समयसीमा पूरी होने पर कोर्ट ने मुख्य आरोपी मनीष रंजन को जमानत दे दी, जिससे जांच पर सवाल उठे हैं।

पटना: बिहार की राजधानी Patna में एक NEET छात्रा की संदिग्ध मौत से जुड़े बहुचर्चित मामले में बड़ा कानूनी मोड़ आया है। मामले के मुख्य आरोपी मनीष कुमार रंजन को अदालत से जमानत मिल गई है, क्योंकि जांच एजेंसी समयसीमा के भीतर चार्जशीट दाखिल नहीं कर सकी। इस घटनाक्रम ने न केवल मामले की दिशा बदल दी है, बल्कि Central Bureau of Investigation (CBI) की जांच प्रक्रिया पर भी गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं।

यह मामला उस छात्रा की संदिग्ध मौत से जुड़ा है, जो मेडिकल प्रवेश परीक्षा NEET की तैयारी कर रही थी और पटना के एक गर्ल्स हॉस्टल में रह रही थी। छात्रा की मौत के बाद मामला संवेदनशील बन गया था और जनदबाव के चलते जांच स्थानीय पुलिस से लेकर CBI को सौंप दी गई थी। अब चार्जशीट दाखिल करने में देरी के कारण मुख्य आरोपी को मिली जमानत ने पीड़ित परिवार और आम लोगों की चिंता बढ़ा दी है।

क्या है पूरा मामला?

यह मामला पटना के शम्भू गर्ल्स हॉस्टल से जुड़ा है, जहां NEET की तैयारी कर रही छात्रा की संदिग्ध परिस्थितियों में मौत हुई थी। शुरुआती जांच में कई सवाल उठे थे—मौत के कारण, हॉस्टल प्रशासन की भूमिका, सुरक्षा इंतजाम और छात्रा के साथ कथित दुर्व्यवहार जैसे पहलुओं को लेकर परिवार ने गंभीर आरोप लगाए थे।

मामले में हॉस्टल संचालक मनीष कुमार रंजन को मुख्य आरोपी बनाया गया। Manish Kumar Ranjan को 14 जनवरी 2026 को पटना पुलिस ने गिरफ्तार किया था। बाद में बढ़ते दबाव और मामले की गंभीरता को देखते हुए जांच CBI को सौंप दी गई।

CBI से उम्मीद थी कि वह तकनीकी साक्ष्यों, फॉरेंसिक रिपोर्ट, हॉस्टल रिकॉर्ड और गवाहों के बयानों के आधार पर तेज और निष्पक्ष जांच करेगी। लेकिन अब जांच एजेंसी तय कानूनी समयसीमा में आरोपपत्र दाखिल नहीं कर सकी।

90 दिन की समयसीमा क्यों अहम है?

भारतीय दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) के तहत गंभीर अपराधों में जांच एजेंसी को एक निश्चित समयसीमा के भीतर चार्जशीट दाखिल करनी होती है। ऐसे मामलों में यह अवधि आमतौर पर 90 दिन होती है। यदि जांच एजेंसी इस अवधि में आरोपपत्र दाखिल नहीं करती, तो आरोपी को ‘डिफॉल्ट बेल’ यानी वैधानिक जमानत का अधिकार मिल जाता है।

यही इस मामले में भी हुआ।

मनीष कुमार रंजन की ओर से अदालत में यह दलील दी गई कि गिरफ्तारी के 90 दिन बीत चुके हैं, लेकिन CBI ने अभी तक चार्जशीट दाखिल नहीं की। इस आधार पर पॉक्सो अदालत ने कानून के प्रावधानों के तहत उन्हें जमानत दे दी।

कानूनी विशेषज्ञों का कहना है कि डिफॉल्ट बेल का मतलब आरोपी का बरी होना नहीं है, बल्कि यह जांच एजेंसी की प्रक्रिया में देरी का परिणाम है। केस की सुनवाई आगे भी जारी रहेगी।

CBI की जांच पर क्यों उठ रहे सवाल?

इस मामले में CBI की भूमिका को लेकर कई स्तरों पर सवाल उठ रहे हैं। सबसे बड़ा सवाल यह है कि इतने संवेदनशील और चर्चित मामले में जांच एजेंसी समयसीमा का पालन क्यों नहीं कर सकी।

लेकिन इस मामले में चार्जशीट दाखिल न कर पाना जांच की गति और प्राथमिकता दोनों पर सवाल खड़े करता है।

कई कानूनी जानकारों का मानना है कि अगर समयसीमा के भीतर आरोपपत्र दाखिल नहीं होता, तो इससे न सिर्फ आरोपी को राहत मिलती है, बल्कि पीड़ित पक्ष का भरोसा भी कमजोर होता है।

पीड़ित परिवार और समाज में नाराजगी

मुख्य आरोपी को जमानत मिलने के बाद पीड़ित परिवार में नाराजगी और निराशा का माहौल है। परिवार का कहना है कि वे शुरू से निष्पक्ष जांच और सख्त कार्रवाई की मांग कर रहे थे, लेकिन अब प्रक्रिया में हुई देरी ने न्याय की राह कठिन बना दी है।

स्थानीय लोगों और छात्र संगठनों ने भी चिंता जताई है कि छात्राओं की सुरक्षा से जुड़े मामलों में जांच में ढिलाई गंभीर संदेश देती है।

यह मामला इसलिए भी संवेदनशील है क्योंकि, पीड़िता एक प्रतियोगी परीक्षा की तैयारी कर रही छात्रा थी, और  मामला छात्रावास सुरक्षा से जुड़ा है। 

विशेषज्ञों का कहना है कि ऐसे मामलों में सिर्फ जांच नहीं, बल्कि समयबद्ध न्याय भी उतना ही महत्वपूर्ण है।

आगे क्या होगा?

हालांकि आरोपी को जमानत मिल गई है, लेकिन इससे मामला खत्म नहीं होता। अदालत में आगे की सुनवाई जारी रहेगी और CBI अभी भी चार्जशीट दाखिल कर सकती है। यदि जांच में आरोपी के खिलाफ पर्याप्त सबूत मिलते हैं, तो मुकदमा आगे बढ़ेगा।

यदि जांच में लापरवाही या साक्ष्य छिपाने जैसे तथ्य सामने आते हैं, तो अन्य लोगों पर भी कार्रवाई हो सकती है।

छात्र सुरक्षा पर बड़ा सवाल

यह मामला भारत में छात्रावासों और कोचिंग शहरों में रहने वाली छात्राओं की सुरक्षा को लेकर गंभीर चिंता पैदा करता है। देशभर में लाखों छात्र-छात्राएं प्रतियोगी परीक्षाओं की तैयारी के लिए दूसरे शहरों में रहते हैं। ऐसे में हॉस्टल प्रशासन, स्थानीय पुलिस और नियामक संस्थाओं की जवाबदेही बेहद महत्वपूर्ण हो जाती है।

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