नोएडा में साइबर अपराध के एक चौंकाने वाले मामले का खुलासा हुआ है। गौतमबुद्धनगर साइबर क्राइम पुलिस ने निजी लोन ऐप के जरिए कर्ज लेने वाले लोगों को निशाना बनाकर ब्लैकमेल और ठगी करने वाले गिरोह के छह सदस्यों को गिरफ्तार किया है। पुलिस के मुताबिक आरोपी पहले लोन ऐप से जुड़े लोगों की जानकारी जुटाते थे और फिर वीडियो कॉल के जरिए उनसे संपर्क करते थे। बातचीत के दौरान पीड़ितों की तस्वीरें या वीडियो हासिल करने के बाद उन्हें एडिट कर अश्लील रूप दिया जाता था। इसके बाद इन्हीं तस्वीरों को सार्वजनिक करने की धमकी देकर पीड़ितों से पैसे वसूले जाते थे। पुलिस जांच में अब तक करीब 25 लाख रुपये की ठगी का पता चला है।
पुलिस ने यह कार्रवाई सेक्टर-141, नोएडा में की। इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों के विश्लेषण और खुफिया जानकारी के आधार पर साइबर क्राइम थाना पुलिस ने आरोपियों तक पहुंच बनाई। गिरफ्तार किए गए आरोपियों की पहचान नई दिल्ली के कापासेड़ा निवासी निशांत कुमार, याकूबपुर सेक्टर-83 निवासी अनीस अली और आदित्य कुमार, बिहार के वैशाली निवासी पंकज कुमार तथा बुलंदशहर निवासी निक्की शर्मा और शिवा शर्मा के रूप में हुई है। पुलिस के अनुसार इनकी उम्र करीब 18 से 28 वर्ष के बीच है और इनमें से कई आरोपी नोएडा-ग्रेटर नोएडा में किराये के कमरों में रह रहे थे।
पुलिस के मुताबिक गिरोह का तरीका बेहद सुनियोजित था। आरोपी निजी लोन ऐप से कर्ज लेने वाले लोगों की जानकारी जुटाते थे। इसके बाद उनसे वीडियो कॉल के माध्यम से संपर्क किया जाता था। बातचीत के दौरान पीड़ित की फोटो या वीडियो हासिल करने के बाद उसे डिजिटल तरीके से एडिट किया जाता था। पुलिस का कहना है कि तस्वीरों को अश्लील रूप देकर पीड़ितों को भेजा जाता और फिर उन्हें बदनाम करने या तस्वीरें वायरल करने की धमकी दी जाती थी। सामाजिक प्रतिष्ठा खराब होने के डर का फायदा उठाकर पीड़ितों से पैसे मांगे जाते थे।
ब्लैकमेलिंग के दौरान आरोपियों की ओर से पीड़ितों को अलग-अलग बैंक खातों में रकम जमा कराने के लिए कहा जाता था। कुछ मामलों में यूपीआई और क्यूआर कोड के माध्यम से भी भुगतान कराया गया। पुलिस जांच में सामने आया है कि जिन बैंक खातों में रकम पहुंचती थी, उनमें से कई खाते म्यूल अकाउंट के तौर पर इस्तेमाल किए जा रहे थे। यानी साइबर अपराध से हासिल रकम को सीधे आरोपियों के नाम वाले खातों में रखने के बजाय दूसरे खातों के जरिए इधर-उधर किया जाता था, जिससे पुलिस जांच को भटकाया जा सके।
पुलिस के अनुसार अभी तक आरोपियों के म्यूल बैंक खातों में करीब 25 लाख रुपये की ठगी की रकम पहुंचने के साक्ष्य मिले हैं। जांच एजेंसियां अब यह पता लगाने में जुटी हैं कि इस रकम को किन-किन खातों में ट्रांसफर किया गया और इसके बाद पैसों का इस्तेमाल कहां किया गया। पुलिस यह भी जांच कर रही है कि गिरफ्तार आरोपियों के पीछे कोई बड़ा नेटवर्क तो नहीं है और क्या इस गिरोह से जुड़े अन्य लोग भी अलग-अलग शहरों में इसी तरह लोगों को निशाना बना रहे हैं।
पुलिस ने गिरफ्तार आरोपियों के कब्जे से सात मोबाइल फोन, चार एटीएम या डेबिट कार्ड, दो पासबुक, दो ड्राइविंग लाइसेंस, दो पर्स और 810 रुपये नकद बरामद किए हैं। मोबाइल फोन और बैंकिंग दस्तावेज पुलिस की जांच में महत्वपूर्ण माने जा रहे हैं, क्योंकि इन्हीं के जरिए आरोपियों के संपर्क, लेनदेन और पीड़ितों से बातचीत की जानकारी सामने आ सकती है। इलेक्ट्रॉनिक उपकरणों की जांच के आधार पर पुलिस यह पता लगाने की कोशिश कर रही है कि गिरोह ने कितने लोगों से संपर्क किया था और कितनी रकम की वसूली की गई।
जांच में यह भी सामने आया है कि आरोपियों के खिलाफ राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल यानी एनसीआरपी पर पांच शिकायतें दर्ज हैं। इन शिकायतों में उत्तर प्रदेश, पंजाब और गुजरात से एक-एक तथा महाराष्ट्र से दो शिकायतें शामिल हैं। इससे पुलिस को आशंका है कि गिरोह का नेटवर्क केवल नोएडा तक सीमित नहीं था और अलग-अलग राज्यों में रहने वाले लोगों को निशाना बनाया जा रहा था। पुलिस अब इन शिकायतों को गिरफ्तार आरोपियों से जोड़कर जांच आगे बढ़ा रही है।
लोन ऐप के जरिए होने वाली ठगी में सबसे बड़ा खतरा लोगों की निजी जानकारी के दुरुपयोग का होता है। कई अनधिकृत ऐप इंस्टॉल करने के दौरान मोबाइल में मौजूद कॉन्टैक्ट, फोटो, फाइल और अन्य निजी जानकारी तक पहुंच मांगी जाती है। यदि कोई व्यक्ति बिना जांच किए ऐसे ऐप को अनुमति दे देता है, तो उसके फोन में मौजूद निजी जानकारी बाद में उसके खिलाफ इस्तेमाल की जा सकती है। नोएडा पुलिस ने भी लोगों से अनधिकृत और संदिग्ध लोन ऐप से दूरी बनाए रखने की अपील की है।
पुलिस ने लोगों को सलाह दी है कि तत्काल लोन देने का दावा करने वाले किसी भी अनजान ऐप को डाउनलोड करने से पहले उसकी विश्वसनीयता की जांच करें। कर्ज लेने के लिए आरबीआई से अधिकृत बैंक या वित्तीय संस्थान का ही इस्तेमाल करना चाहिए। किसी अनजान व्यक्ति को वीडियो कॉल पर निजी फोटो या वीडियो साझा नहीं करना चाहिए। इसके अलावा किसी संदिग्ध लिंक पर क्लिक करने, अनजान व्यक्ति के बताए क्यूआर कोड को स्कैन करने या बिना जांच किसी खाते में पैसा भेजने से भी बचना चाहिए।
इस तरह की साइबर ठगी में अपराधी अक्सर पीड़ित की घबराहट और सामाजिक प्रतिष्ठा की चिंता का फायदा उठाते हैं। जैसे ही किसी व्यक्ति को उसकी एडिट की गई अश्लील तस्वीर भेजकर वायरल करने की धमकी दी जाती है, वह बदनामी के डर से आरोपी की मांग पूरी करने लगता है। इसके बाद ठग एक बार रकम मिलने के बाद दोबारा और ज्यादा पैसे की मांग कर सकते हैं। ऐसे मामलों में डरकर लगातार भुगतान करते रहना समस्या को बढ़ा सकता है। पीड़ित को तुरंत पुलिस और साइबर अपराध हेल्पलाइन की मदद लेनी चाहिए।
नोएडा पुलिस की इस कार्रवाई से यह भी सामने आया है कि साइबर ठगी के मामलों में केवल ऑनलाइन लेनदेन ही नहीं, बल्कि सोशल इंजीनियरिंग और डिजिटल ब्लैकमेलिंग का इस्तेमाल भी तेजी से बढ़ रहा है। अपराधी तकनीक का उपयोग करके किसी सामान्य तस्वीर को एडिट कर उसे आपत्तिजनक रूप दे सकते हैं और फिर उसी सामग्री का इस्तेमाल वसूली के लिए करते हैं। ऐसे मामलों में पीड़ितों के लिए सबसे जरूरी कदम सबूत सुरक्षित रखना और तत्काल शिकायत करना है।
यदि किसी व्यक्ति के साथ ऐसी घटना होती है तो उसे आरोपी से बहस करने या उसकी मांग पूरी करने के बजाय बातचीत, मोबाइल नंबर, बैंक ट्रांजैक्शन, यूपीआई आईडी, क्यूआर कोड, चैट और भेजी गई तस्वीरों से संबंधित डिजिटल सबूत सुरक्षित रखने चाहिए। इन सबूतों से पुलिस को आरोपी तक पहुंचने और पैसे के लेनदेन की कड़ी जोड़ने में मदद मिल सकती है। साइबर ठगी की स्थिति में 1930 हेल्पलाइन पर तत्काल शिकायत करना और राष्ट्रीय साइबर अपराध रिपोर्टिंग पोर्टल पर शिकायत दर्ज कराना भी महत्वपूर्ण है।
पुलिस अब गिरफ्तार छह आरोपियों से पूछताछ के आधार पर गिरोह की पूरी कार्यप्रणाली और नेटवर्क का पता लगाने में जुटी है। जांच का एक अहम हिस्सा यह भी है कि 25 लाख रुपये की रकम किन-किन बैंक खातों में गई और क्या इस रकम को आगे किसी अन्य माध्यम से ट्रांसफर किया गया। पुलिस यह भी देख रही है कि बरामद मोबाइल फोन में कितने लोगों के नंबर, चैट, वीडियो कॉल और बैंकिंग गतिविधियों से संबंधित जानकारी मौजूद है।
फिलहाल छह आरोपियों की गिरफ्तारी के बाद पुलिस को इस गिरोह के बारे में कई महत्वपूर्ण सुराग मिले हैं। निजी लोन ऐप से जुड़े लोगों को निशाना बनाना, वीडियो कॉल के जरिए संपर्क करना, तस्वीरों को एडिट कर अश्लील बनाना और फिर बदनामी का डर दिखाकर रकम वसूलना इस कथित गिरोह की प्रमुख कार्यप्रणाली बताई गई है। पुलिस के अनुसार करीब 25 लाख रुपये की ठगी सामने आ चुकी है और एनसीआरपी पर दर्ज पांच शिकायतों से भी इस नेटवर्क की गतिविधियों की पुष्टि के संकेत मिले हैं। आगे की जांच में ठगी की कुल रकम और पीड़ितों की संख्या बढ़ सकती है।
नोएडा पुलिस की कार्रवाई ऐसे लोगों के लिए भी चेतावनी है जो जल्दी लोन मिलने के लालच में किसी भी ऐप को अपने मोबाइल में डाउनलोड कर लेते हैं। किसी ऐप का विज्ञापन इंटरनेट या सोशल मीडिया पर दिखाई देना उसकी विश्वसनीयता की गारंटी नहीं है। लोन लेने से पहले संबंधित कंपनी और वित्तीय संस्था की वैधता की जांच करना जरूरी है। अपनी फोटो, वीडियो, पहचान संबंधी दस्तावेज और बैंकिंग जानकारी किसी अनजान व्यक्ति के साथ साझा नहीं करनी चाहिए। अगर कोई व्यक्ति निजी तस्वीर वायरल करने की धमकी देकर पैसे मांगता है तो डरने के बजाय तुरंत पुलिस को सूचना देना सबसे सुरक्षित कदम है।







