SIR के विरोध और CEC ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर INDIA ब्लॉक के 19 दल दिल्ली में ‘सेव डेमोक्रेसी मार्च’ निकालेंगे। विपक्ष संसद से चुनाव आयोग तक मार्च कर मतदाता सूची, EVM और चुनावी पारदर्शिता के मुद्दे उठाएगा।
नई दिल्ली: दिल्ली में चुनावी प्रक्रिया को लेकर विपक्ष और चुनाव आयोग के बीच टकराव एक बार फिर तेज हो गया है। विशेष गहन पुनरीक्षण (SIR) के विरोध और मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग को लेकर INDIA ब्लॉक के 19 विपक्षी दल संसद से चुनाव आयोग के मुख्यालय तक मार्च निकालने की तैयारी में हैं। विपक्ष ने इसे ‘सेव डेमोक्रेसी मार्च’ नाम दिया है।
प्रस्तावित मार्च संसद परिसर से शुरू होकर चुनाव आयोग के कार्यालय तक जाएगा। विपक्षी सांसद करीब 3 किलोमीटर की दूरी पैदल तय करेंगे। इस प्रदर्शन के केंद्र में मतदाता सूची में बदलाव, SIR की प्रक्रिया, चुनाव आयोग की पारदर्शिता और इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों (EVM) के इस्तेमाल से जुड़े सवाल हैं।
CEC के इस्तीफे की मांग पर अड़ा विपक्ष
कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे ने एक दिन पहले सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म X पर विपक्ष की प्रमुख मांगों को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा कि कांग्रेस के लिए तीन मांगें गैर-समझौतावादी हैं। इनमें मुख्य चुनाव आयुक्त ज्ञानेश कुमार का इस्तीफा, SIR को समाप्त करना और चुनाव में बैलेट पेपर की वापसी शामिल है।
विपक्ष का आरोप है कि SIR की प्रक्रिया के दौरान बड़ी संख्या में मतदाताओं के नाम मतदाता सूची से हटाए गए हैं। खड़गे ने दावा किया कि इस प्रक्रिया में करीब 13 करोड़ मतदाताओं के नाम प्रभावित हुए हैं। हालांकि, यह विपक्ष का राजनीतिक दावा है और अलग-अलग राज्यों में मतदाता सूची के पुनरीक्षण के आंकड़े निर्वाचन अधिकारियों की प्रक्रिया और रिकॉर्ड के अनुसार अलग हो सकते हैं।
19 विपक्षी दलों की एकजुटता
इस मार्च में INDIA ब्लॉक के 19 दल शामिल होने वाले हैं। इन पार्टियों के पास लोकसभा में कुल 178 और राज्यसभा में 62 सांसद होने का दावा किया गया है।
मार्च में शामिल होने वाले दलों में कांग्रेस, समाजवादी पार्टी, तृणमूल कांग्रेस, NCP (SP), शिवसेना (UBT), राष्ट्रीय जनता दल, CPI(M), CPI, नेशनल कॉन्फ्रेंस, PDP, झारखंड मुक्ति मोर्चा, CPI(ML), IUML, KC(M), MDMK, VCK, RSP, AIFB और KC(J) शामिल हैं।
विपक्षी दलों का कहना है कि चुनाव प्रक्रिया में जनता का भरोसा बनाए रखने के लिए मतदाता सूची तैयार करने से लेकर मतदान और मतगणना तक हर चरण में पारदर्शिता जरूरी है।
पहले भी चुनाव आयोग तक मार्च कर चुका है विपक्ष
यह पहली बार नहीं है जब विपक्ष ने चुनाव आयोग के खिलाफ सड़क पर उतरने का फैसला किया है। इससे पहले 11 अगस्त 2025 को INDIA गठबंधन के सांसद संसद भवन से चुनाव आयोग के कार्यालय तक मार्च कर चुके हैं।
उस प्रदर्शन में राहुल गांधी, मल्लिकार्जुन खड़गे, शरद पवार समेत कई विपक्षी नेताओं ने हिस्सा लिया था। उस समय भी विपक्ष ने मतदाता सूची और चुनावी प्रक्रिया में पारदर्शिता से जुड़े सवाल उठाए थे।
अब एक बार फिर विपक्ष ने इसी मुद्दे को लेकर संयुक्त प्रदर्शन की घोषणा की है। इससे चुनाव आयोग और विपक्षी दलों के बीच राजनीतिक बहस और तेज होने की संभावना है।
SIR को लेकर चुनाव आयुक्तों की कथित आपत्तियों का मुद्दा
विपक्ष की मांगों को उस रिपोर्ट के बाद भी बल मिला है, जिसमें चुनाव आयोग के भीतर SIR से संबंधित निर्णयों पर कथित मतभेदों का उल्लेख किया गया था।
द इंडियन एक्सप्रेस की एक रिपोर्ट के अनुसार, चुनाव आयुक्त सुखबीर सिंह संधू और विवेक जोशी ने SIR से जुड़े फैसलों और आदेशों पर रिकॉर्ड में कम से कम 14 बार आपत्ति जताई थी। रिपोर्ट में यह भी दावा किया गया कि कुछ निर्णय दोनों चुनाव आयुक्तों की जानकारी या सिफारिश के बिना जारी किए गए।
इन दावों को लेकर विपक्ष ने चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली और CEC की भूमिका पर सवाल उठाए हैं। हालांकि, ऐसे आरोपों और रिपोर्ट में किए गए दावों पर चुनाव आयोग का आधिकारिक पक्ष अंतिम रूप से महत्वपूर्ण रहेगा।
मतदाता सूची में पारदर्शिता की मांग
विपक्षी दलों की प्रमुख मांग मतदाता सूची को लेकर है। उनका कहना है कि वोटर लिस्ट में किसी व्यक्ति का नाम जोड़ने, हटाने या संशोधित करने की प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी होनी चाहिए।
विपक्ष चाहता है कि बूथ और विधानसभा स्तर पर मतदाता सूची में हुए बदलावों की विस्तृत जानकारी सार्वजनिक की जाए। इसके साथ ही किसी वैध मतदाता का नाम हटाने से पहले उसे पर्याप्त सूचना देने और आपत्ति या अपील का अवसर देने की व्यवस्था सुनिश्चित की जाए।

विपक्ष का तर्क है कि मतदाता सूची लोकतांत्रिक चुनाव की बुनियादी आधारशिला है। इसलिए इसमें होने वाला कोई भी बदलाव स्पष्ट नियमों और सार्वजनिक निगरानी के तहत होना चाहिए।
SIR प्रक्रिया पर विपक्ष के गंभीर सवाल
SIR को लेकर विपक्ष का सबसे बड़ा आरोप यह है कि व्यापक स्तर पर मतदाता सूची के पुनरीक्षण से बड़ी संख्या में पात्र मतदाता सूची से बाहर हो सकते हैं। विपक्षी दल चाहते हैं कि भविष्य के चुनावों में SIR से पहले मौजूद मतदाता सूची को भी संदर्भ के तौर पर सुरक्षित रखा जाए।
विपक्ष का कहना है कि किसी मतदाता का नाम सूची से हटने के कारण उसे चुनाव में मतदान के संवैधानिक अधिकार से वंचित नहीं किया जाना चाहिए। दूसरी ओर, मतदाता सूची को अपडेट करना और अपात्र या डुप्लीकेट प्रविष्टियों को हटाना निर्वाचन प्रक्रिया का सामान्य हिस्सा है। इसलिए विवाद का मुख्य मुद्दा प्रक्रिया, सत्यापन और पारदर्शिता को लेकर है।
EVM के बजाय बैलेट पेपर की मांग
विपक्षी दलों ने इलेक्ट्रॉनिक वोटिंग मशीनों के इस्तेमाल को लेकर भी अपनी पुरानी मांग दोहराई है। कांग्रेस अध्यक्ष मल्लिकार्जुन खड़गे की ओर से बताई गई मांगों में EVM की जगह बैलेट पेपर से चुनाव कराने की बात शामिल है।
विपक्ष का तर्क है कि बैलेट पेपर के इस्तेमाल से चुनाव प्रक्रिया को लेकर जनता का भरोसा बढ़ाया जा सकता है। हालांकि, भारत में EVM के इस्तेमाल को लेकर चुनाव आयोग लगातार इसकी सुरक्षा और चुनावी प्रक्रिया में इसके इस्तेमाल का बचाव करता रहा है।
विपक्ष ने पहली बार मतदान करने वाले युवाओं के लिए मतदाता पंजीकरण प्रक्रिया को आसान बनाने की मांग भी उठाई है।
विपक्षी दलों से एकजुट रहने की अपील
विपक्षी दलों ने INDIA ब्लॉक के घटक दलों से चुनाव प्रक्रिया में पारदर्शिता और संस्थागत जवाबदेही के मुद्दे पर एकजुट रहने की अपील की है। उनका कहना है कि लोकतंत्र में चुनावी संस्थाओं पर जनता का विश्वास सबसे महत्वपूर्ण है।
विपक्ष का दावा है कि चुनाव आयोग जैसी संवैधानिक संस्था की स्वतंत्रता और निष्पक्षता को लेकर किसी भी तरह का संदेह लोकतांत्रिक व्यवस्था के लिए गंभीर विषय है। इसी वजह से वे CEC के इस्तीफे, SIR की समीक्षा और चुनाव प्रणाली में बदलाव की मांग कर रहे हैं।
आगे बढ़ सकता है राजनीतिक टकराव
19 दलों के एक साथ सड़क पर उतरने से चुनावी प्रक्रिया को लेकर राजनीतिक विवाद और गहरा सकता है। एक ओर विपक्ष मतदाता सूची और चुनाव आयोग की कार्यप्रणाली पर सवाल उठा रहा है, वहीं चुनाव आयोग की ओर से SIR और चुनावी प्रक्रिया को नियमों के तहत संचालित किए जाने की बात कही जाती रही है।
अब सभी की नजर विपक्ष के मार्च और उसके बाद होने वाली राजनीतिक प्रतिक्रिया पर है। यह प्रदर्शन केवल SIR के खिलाफ विरोध तक सीमित नहीं है, बल्कि चुनावी संस्थाओं में भरोसा, मतदाता सूची की पारदर्शिता और भारत में चुनाव कराने की प्रक्रिया को लेकर चल रही व्यापक राजनीतिक बहस का हिस्सा बन गया है।












