पाक सेना से विद्रोह कर बनाई BNP, राष्ट्रपति रहते मारे गए; कौन थे जिया उर रहमान

पाक सेना से विद्रोह कर बनाई BNP, राष्ट्रपति रहते मारे गए; कौन थे जिया उर रहमान

जिया उर रहमान बांग्लादेश के राष्ट्रपति और BNP के संस्थापक रहे। उन्होंने पाकिस्तानी सेना से बगावत कर 1971 के मुक्ति संग्राम में भूमिका निभाई। 1981 में चटगांव में उनकी हत्या हुई, जिसने बांग्लादेश की राजनीति को झकझोर दिया।

Dhaka: बांग्लादेश की राजनीति में जिया उर रहमान का नाम एक ऐसे नेता के रूप में दर्ज है जिसने सैन्य पृष्ठभूमि से निकलकर देश की राजनीति की दिशा बदली। वह न सिर्फ बांग्लादेश के राष्ट्रपति रहे बल्कि बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी (BNP) के संस्थापक भी थे। उनका जीवन संघर्ष, सत्ता और अंत में हिंसक मौत की कहानी है। खालिदा जिया के निधन के बाद एक बार फिर उनके पति जिया उर रहमान की भूमिका और योगदान पर चर्चा तेज हो गई है।

पाकिस्तानी सेना से शुरुआत

जिया उर रहमान का करियर शुरुआत में पूरी तरह सैन्य रहा। 1960 के दशक में वह पाकिस्तानी आर्मी में कैप्टन के पद पर तैनात थे। उस समय बांग्लादेश, पूर्वी पाकिस्तान के रूप में जाना जाता था। सेना में रहते हुए जिया को एक अनुशासित और साहसी अधिकारी के तौर पर पहचाना जाता था। हालांकि उस दौर में किसी ने यह नहीं सोचा था कि यही अधिकारी आगे चलकर पाकिस्तानी सेना से बगावत करेगा।

1971 का मुक्ति संग्राम

1971 में जब बांग्लादेश का मुक्ति संग्राम शुरू हुआ तो जिया उर रहमान ने एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला लिया। उन्होंने पाकिस्तानी सेना से बगावत कर दी और बांग्लादेश की आजादी की लड़ाई में शामिल हो गए। यह फैसला उनके जीवन का सबसे अहम मोड़ साबित हुआ। इस दौरान उन्होंने रेडियो के जरिए स्वतंत्रता की घोषणा में भी अहम भूमिका निभाई। मुक्ति संग्राम के बाद वह बांग्लादेश में एक राष्ट्रीय नायक के रूप में उभरे।

आजादी के बाद सेना में उभार

बांग्लादेश की आजादी के बाद जिया उर रहमान तेजी से सेना के उच्च पदों तक पहुंचे। 25 अगस्त 1975 को उन्हें बांग्लादेश सेना का प्रमुख बनाया गया। यह वह दौर था जब देश राजनीतिक अस्थिरता और सैन्य हस्तक्षेप से गुजर रहा था। जिया ने सेना में अनुशासन कायम करने और सत्ता को स्थिर करने की कोशिश की।

राष्ट्रपति पद तक का सफर

1977 में जिया उर रहमान बांग्लादेश के राष्ट्रपति बने। यह पद उन्हें पहले कार्यवाहक रूप में मिला और बाद में उन्होंने इसे लोकतांत्रिक आधार देने की कोशिश की। राष्ट्रपति बनने के बाद उन्होंने खुद को सिर्फ सैन्य शासक तक सीमित नहीं रखा बल्कि राजनीतिक सुधारों पर भी ध्यान दिया।

BNP की स्थापना

साल 1978 में जिया उर रहमान ने बांग्लादेश नेशनलिस्ट पार्टी यानी BNP की स्थापना की। इस पार्टी का मकसद एक वैकल्पिक राजनीतिक विचारधारा पेश करना था। BNP ने राष्ट्रवाद, लोकतंत्र और आर्थिक विकास को अपनी राजनीति का आधार बनाया। पार्टी के गठन के साथ ही बांग्लादेश की राजनीति में एक नया ध्रुव उभरा।

पहले निर्वाचित राष्ट्रपति

1979 में हुए चुनाव में BNP को शानदार जीत मिली। इस जीत के साथ ही जिया उर रहमान बांग्लादेश के पहले निर्वाचित राष्ट्रपति बने। यह उनके लिए बड़ी उपलब्धि थी क्योंकि वह सैन्य पृष्ठभूमि से आने के बावजूद लोकतांत्रिक प्रक्रिया के जरिए सत्ता में पहुंचे। उनके समर्थकों के लिए यह साबित हो गया कि जिया सिर्फ एक सैनिक नहीं बल्कि जननेता भी हैं।

राष्ट्रपति बनने के बाद भी जिया उर रहमान की जिंदगी खतरे से खाली नहीं थी। उन्हें लगातार जान से मारने की धमकियां मिल रही थीं। बांग्लादेश के इंटेलिजेंस विभाग ने कई बार चेतावनी दी थी कि उनकी सुरक्षा को गंभीर खतरा है। इसके बावजूद जिया अपने कार्यक्रमों में सक्रिय रहे और आम लोगों से मिलने से पीछे नहीं हटे।

चटगांव यात्रा और हत्या

30 मई 1981 को जिया उर रहमान चटगांव पहुंचे। यह यात्रा उनकी जिंदगी की आखिरी यात्रा साबित हुई। चटगांव में सेना के ही कुछ अफसरों ने मिलकर उनकी हत्या कर दी। इस घटना ने पूरे देश को झकझोर दिया। कहा जाता है कि इस साजिश में लेफ्टिनेंट कर्नल मोती उर रहमान की अहम भूमिका थी। वह चटगांव के जीओसी मेजर जनरल मोहम्मद अबुल मंजूर के तबादले से नाराज थे। इसी नाराजगी ने एक बड़े राजनीतिक हत्याकांड का रूप ले लिया।

जिया उर रहमान की हत्या के बाद बांग्लादेश में राजनीतिक भूचाल आ गया। BNP अचानक अपने संस्थापक और सबसे बड़े नेता को खो बैठी। सेना और राजनीति के बीच तनाव और गहरा गया। यह घटना बांग्लादेश के इतिहास की सबसे सनसनीखेज राजनीतिक हत्याओं में गिनी जाती है।

खालिदा जिया की राजनीति में एंट्री

पति की हत्या के समय खालिदा जिया राजनीति में सक्रिय नहीं थीं। जिया उर रहमान उन्हें एक शर्मिली गृहणी कहा करते थे जो परिवार और बच्चों तक सीमित थीं। लेकिन पति की मौत के बाद परिस्थितियां बदल गईं। BNP नेतृत्व संकट में फंस गई और पार्टी को एक चेहरे की जरूरत थी। इसी दौर में खालिदा जिया राजनीति में आईं और आगे चलकर बांग्लादेश की पहली महिला प्रधानमंत्री बनीं।

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