पिता की घड़ी और शांति की ताकत

पिता की घड़ी और शांति की ताकत

हमारा मन अक्सर समस्याओं के शोर में इतना उलझ जाता है कि हम सामने रखे समाधान को देख नहीं पाते। यह कहानी एक पिता, उनके बेटे और एक खोई हुई पुरानी घड़ी की है। यह हमें सिखाती है कि जब हड़बड़ाहट और शोर से काम न बने, तो 'शांति' और 'धैर्य' ही सफलता की चाबी बनते हैं।

कहानी 

एक छोटे से कस्बे में एक मेहनती बढ़ई (Carpenter) रहता था, जिसका नाम 'सोहन' था। वह अपनी कला में बहुत माहिर था और लकड़ी के सुंदर खिलौने और फर्नीचर बनाता था। सोहन के पास एक बहुत पुरानी जेब-घड़ी थी। यह कोई साधारण घड़ी नहीं थी, बल्कि उसके पिताजी ने उसे उपहार में दी थी। सोहन उस घड़ी को अपनी जान से भी ज्यादा संभालकर रखता था, क्योंकि वह उसके पिता की आखिरी निशानी थी।

एक दिन सोहन अपनी वर्कशॉप (कारखाने) में काम कर रहा था। वहां लकड़ी का बहुत सारा बुरादा और कतरनें जमीन पर बिखरी हुई थीं। काम खत्म करने के बाद, जब वह घर जाने के लिए अपनी जैकेट पहनने लगा, तो उसने देखा कि उसकी जेब खाली है। उसकी वह कीमती घड़ी गायब थी।

सोहन के पैरों तले जमीन खिसक गई। वह घबरा गया और पागलों की तरह वर्कशॉप में इधर-उधर देखने लगा। वहां लकड़ी के बुरादे के ढेर लगे थे। उसने एक-एक ढेर को हटाना शुरू किया, लेकिन घड़ी कहीं नहीं मिली। उसकी घबराहट बढ़ती जा रही थी। वह जितना ज्यादा ढूंढता, उतना ही ज्यादा परेशान होता जा रहा था। उसे पसीना आने लगा और वह गुस्से में सामान पटकने लगा।

उसकी परेशानी देखकर वर्कशॉप के बाहर खेल रहे कुछ बच्चे और उसके कुछ साथी वहां आ गए। सोहन ने उनसे कहा, 'मेरी घड़ी खो गई है, जो भी उसे ढूंढकर देगा, मैं उसे इनाम दूंगा।'

इनाम की बात सुनते ही सब लोग घड़ी ढूंढने में जुट गए। वर्कशॉप में एकदम शोर-शराबा शुरू हो गया। कोई लकड़ियाँ हटा रहा था, तो कोई बुरादे में हाथ मार रहा था। हर कोई चिल्ला रहा था, 'यहाँ नहीं है!', 'वहाँ देखो!' पूरा कमरा धूल और शोर से भर गया। लगभग एक घंटे तक सबने एड़ी-चोटी का जोर लगा दिया, लेकिन वह छोटी सी घड़ी किसी को नहीं मिली।

थक-हारकर सोहन निराश हो गया। उसने सबको बाहर जाने को कहा और खुद भी सिर पकड़कर एक कोने में बैठ गया। उसे लगा कि अब वह अपने पिता की निशानी हमेशा के लिए खो चुका है।

तभी, सोहन का छोटा बेटा, जो दूर खड़ा सब देख रहा था, धीरे से उसके पास आया और बोला, 'पिताजी, क्या मैं एक बार कोशिश करूँ? लेकिन मेरी एक शर्त है, मुझे कमरे में बिल्कुल अकेले जाने दीजिए और दरवाजा बंद कर दीजिए।'

सोहन को लगा कि जब इतने सारे लोग नहीं ढूंढ पाए, तो यह छोटा बच्चा क्या करेगा? लेकिन बेटे की जिद और आत्मविश्वास देखकर उसने हामी भर दी। उसने सोचा, चलो एक आखिरी कोशिश करने में क्या हर्ज है।

लड़का वर्कशॉप के अंदर गया और उसने दरवाजा बंद कर लिया। सोहन और बाकी लोग बाहर खड़े होकर इंतजार करने लगे। वे सोच रहे थे कि अंदर से लकड़ियाँ हटाने की आवाज आएगी, लेकिन अंदर एकदम सन्नाटा था। कोई शोर नहीं, कोई आवाज नहीं।

करीब 10 मिनट बाद, दरवाजा खुला। लड़का बाहर आया और उसके चेहरे पर एक प्यारी सी मुस्कान थी। उसकी हथेली पर वही पुरानी 'कीमती घड़ी' रखी थी।

सोहन खुशी से उछल पड़ा। उसने बेटे को गले लगा लिया और हैरानी से पूछा, 'बेटा! हम सबने मिलकर पूरा कमरा छान मारा था, फिर भी हमें घड़ी नहीं मिली। तुमने इसे इतनी आसानी से कैसे ढूंढ लिया? तुमने तो कोई शोर भी नहीं किया।'

बेटे ने मुस्कुराते हुए जवाब दिया, 'पिताजी, मैंने कुछ नहीं किया। मैं बस कमरे के बीचों-बीच चुपचाप बैठ गया। मैंने अपनी आँखें बंद कीं और कमरे की शांति को महसूस किया। जब बाहर का शोर बंद हुआ और मैं शांत बैठा, तो मुझे उस सन्नाटे में 'टिक-टिक' की धीमी सी आवाज सुनाई दी। मैंने बस उस आवाज का पीछा किया और बुरादे के एक ढेर के नीचे मुझे यह घड़ी मिल गई।'

सोहन की आँखों में आँसू आ गए। उसे आज एक बहुत बड़ी सीख मिल चुकी थी। वह समझ गया कि जिस समाधान को वह शोर और हड़बड़ाहट में ढूंढ रहा था, वह दरअसल शांति में छिपा था।

सीख 

जीवन में जब भी हम किसी मुसीबत में फंसते हैं, तो हमारा मन अशांत हो जाता है और हम हड़बड़ाहट में गलत फैसले लेते हैं। यह कहानी सिखाती है कि समस्याओं का समाधान शोर मचाने या घबराने से नहीं, बल्कि शांत दिमाग से सोचने पर मिलता है। हर दिन अपने लिए कुछ पल 'मौन' के निकालिए, आपको अपनी उलझनों के जवाब वहीं मिलेंगे।

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