प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर एक सुभाषित साझा किया। इसमें उन्होंने सत्य, शुभ और ज्ञानवर्धक वचनों को सुनने, कल्याणकारी विचारों को अपनाने और अपने जीवन को लोकहित के लिए समर्पित करने का संदेश दिया।
नई दिल्ली: प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने सोमवार को सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म ‘एक्स’ पर एक संस्कृत सुभाषित साझा किया। इसके जरिए उन्होंने लोगों को सत्य, शुभ और ज्ञानवर्धक बातों को सुनने, सकारात्मक विचारों को अपनाने और अपने जीवन को लोकहित के लिए समर्पित करने का संदेश दिया। प्रधानमंत्री ने जनहित से जुड़ी सही और प्रामाणिक सूचनाओं को साझा करने की जरूरत पर भी जोर दिया।
प्रधानमंत्री की ओर से साझा किए गए संदेश में व्यक्तिगत जीवन में अच्छे आचरण और स्वस्थ शरीर के महत्व के साथ समाज के प्रति जिम्मेदारी को भी जोड़ा गया है। उनका संदेश केवल व्यक्तिगत कल्याण तक सीमित नहीं है, बल्कि समाज और राष्ट्र को जागरूक, सशक्त और समरस बनाने की बात करता है।
पीएम मोदी ने सुभाषित के जरिए क्या संदेश दिया?
प्रधानमंत्री ने अपने सोशल मीडिया पोस्ट में लिखा कि लोगों को सत्य, शुभ और ज्ञानवर्धक वचन सुनने चाहिए और कल्याणकारी विचारों को अपने जीवन में अपनाना चाहिए। उन्होंने स्वस्थ शरीर, बेहतर आचरण और श्रेष्ठ गुणों के साथ जीवन को लोकहित में लगाने का आह्वान किया। साथ ही, प्रधानमंत्री ने सत्य और प्रमाणिक जानकारी के प्रसार को भी महत्वपूर्ण बताया।
मौजूदा डिजिटल दौर में सोशल मीडिया के जरिए सूचनाएं बहुत तेजी से फैलती हैं। ऐसे में सही और जनहितकारी जानकारी साझा करना समाज को जागरूक बनाने में अहम भूमिका निभा सकता है। उनके संदेश का व्यापक अर्थ यह है कि व्यक्ति को अपने व्यक्तिगत विकास के साथ समाज और राष्ट्र के प्रति भी जिम्मेदारी निभानी चाहिए।
कौन सा संस्कृत श्लोक साझा किया गया?
प्रधानमंत्री ने ‘भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा...’ से शुरू होने वाला प्रसिद्ध वैदिक मंत्र साझा किया। श्लोक इस प्रकार है:
“भद्रं कर्णेभिः शृणुयाम देवा भद्रं पश्येमाक्षभिर्यजत्राः।
स्थिरैरङ्गैस्तुष्टुवांसस्तनूभिर्व्यशेम देवहितं यदायुः॥”
इस मंत्र में मनुष्य के लिए शुभ और कल्याणकारी चीजें सुनने तथा देखने की कामना की गई है। साथ ही स्वस्थ शरीर और स्थिर अंगों के साथ जीवन को सार्थक तरीके से व्यतीत करने की भावना व्यक्त होती है। प्रधानमंत्री के संदेश के संदर्भ में इसे सकारात्मक सोच, स्वस्थ जीवन, अच्छे आचरण और लोककल्याण की भावना से जोड़कर देखा जा सकता है।

इससे पहले परोपकार पर साझा किया था सुभाषित
प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी इससे पहले 7 अगस्त को भी एक संस्कृत सुभाषित साझा कर चुके हैं। उस पोस्ट में उन्होंने दूसरों की भलाई करने और बिना किसी स्वार्थ के परोपकार की भावना रखने का संदेश दिया था। उन्होंने लिखा था:
“किं चन्द्रमाः प्रत्युपकारलिप्सया करोति गोभिः कुमुदावबोधनम्।
स्वभाव एवोन्नतचेतसां सतां परोपकारव्यसनं हि जीवितम्॥”
इसका भावार्थ है कि चंद्रमा किसी बदले की उम्मीद में अपनी किरणों से कुमुदिनी को प्रकाशित नहीं करता। यह उसका स्वभाव है। इसी तरह उदार और महान व्यक्तियों के लिए दूसरों की मदद करना किसी लाभ या प्रत्युपकार की अपेक्षा नहीं, बल्कि उनके स्वभाव का हिस्सा होता है। इस संदेश में निस्वार्थ सेवा और परोपकार को जीवन के महत्वपूर्ण मूल्यों के रूप में प्रस्तुत किया गया।
6 अगस्त को मातृभूमि और प्रकृति का संदेश
इससे एक दिन पहले, 6 अगस्त को भी प्रधानमंत्री ने एक संस्कृत मंत्र साझा किया था। इसमें पृथ्वी, प्रकृति, औषधियों और मातृभूमि के प्रति सम्मान की भावना दिखाई देती है। श्लोक था:
“विश्वस्वं मातरमोषधीनां ध्रुवां भूमिं पृथिवीं धर्मणा धृताम्।
शिवां स्योनामनु चरेम विश्वहा॥”
इसका भावार्थ है कि पृथ्वी माता स्थिर और समृद्ध रहे, जहां विभिन्न प्रकार की वनस्पतियां और औषधियां विकसित होती हैं। साथ ही मनुष्य को सद्गुणों से पोषित अपनी कल्याणकारी मातृभूमि की निरंतर सेवा करनी चाहिए।












