पश्चिम बंगाल के आरजी कर मेडिकल कॉलेज रेप-मर्डर केस में मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने नए सिरे से जांच की घोषणा की है। मृतका की मां के अनुरोध पर यह फैसला लिया गया। मुख्यमंत्री ने पुलिस की कथित लापरवाही और अंतिम संस्कार मामले की जांच के निर्देश दिए।
कोलकाता: पश्चिम बंगाल में 2024 के चर्चित आरजी कर मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल रेप-मर्डर मामले को लेकर मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने नए सिरे से जांच कराने की घोषणा की है। सरकार का यह फैसला मृत महिला डॉक्टर की मां और अब भाजपा विधायक रत्ना देबनाथ के अनुरोध के बाद लिया गया है। मुख्यमंत्री ने मामले में पुलिस की भूमिका पर सवाल उठाते हुए कहा कि जांच और कार्रवाई के दौरान पुलिस अपने कर्तव्य का प्रभावी ढंग से पालन करने में विफल रही।
विशेष आयोग के तहत होगी नई जांच
मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने रविवार को कहा कि मृतका की मां ने उन्हें पत्र लिखकर मामले की दोबारा जांच कराने का अनुरोध किया था। मुख्यमंत्री के मुताबिक, मुख्य सचिव और विशेषज्ञों की टीम के साथ विस्तृत चर्चा के बाद सरकार ने विशेष आयोग अधिनियम, 1952 के तहत नए सिरे से जांच शुरू करने का फैसला लिया है। सरकार के इस ऐलान के बाद आरजी कर मामले की जांच को लेकर एक बार फिर देशभर में चर्चा तेज हो गई है। अगस्त 2024 में सामने आए इस मामले ने देश में महिला सुरक्षा, अस्पतालों में डॉक्टरों की सुरक्षा और आपराधिक मामलों की जांच को लेकर व्यापक बहस छेड़ दी थी।
मुख्यमंत्री ने कहा कि मामले की जांच में जिन पहलुओं पर पहले पर्याप्त ध्यान नहीं दिया गया, उन्हें नई जांच के दौरान देखा जाएगा। सरकार का उद्देश्य घटना से जुड़े तथ्यों को सामने लाना और जिम्मेदारी तय करना बताया गया है।
अंतिम संस्कार में कथित लापरवाही की भी जांच
मुख्यमंत्री शुभेंदु अधिकारी ने महिला डॉक्टर के अंतिम संस्कार से जुड़े कथित लापरवाही के मामले की अलग से जांच कराने के निर्देश भी दिए हैं। उन्होंने संबंधित अधिकारियों को इस मामले में जिम्मेदारी तय करने और दोषी पाए जाने वाले लोगों के खिलाफ तत्काल कार्रवाई करने को कहा है।
सरकार की ओर से यह कदम ऐसे समय उठाया गया है जब आरजी कर मामले को लेकर मृतका के परिवार की ओर से लगातार कई सवाल उठाए जाते रहे हैं। परिवार की ओर से पहले भी आशंका जताई गई थी कि घटना में केवल एक व्यक्ति शामिल नहीं हो सकता है।
अगस्त 2024 में सामने आया था मामला
आरजी कर मेडिकल कॉलेज एवं अस्पताल में अगस्त 2024 में एक महिला पोस्ट-ग्रेजुएट ट्रेनी डॉक्टर के साथ दुष्कर्म और हत्या का मामला सामने आया था। 9 अगस्त 2024 की सुबह अस्पताल के सेमिनार हॉल में महिला डॉक्टर का शव मिलने के बाद पूरे देश में आक्रोश फैल गया था। प्रारंभिक जांच और पोस्टमार्टम से महिला डॉक्टर के साथ यौन हिंसा और गंभीर शारीरिक चोटों की बात सामने आई थी। घटना के बाद अस्पताल के जूनियर डॉक्टरों और मेडिकल समुदाय ने बड़े पैमाने पर विरोध प्रदर्शन शुरू कर दिया था।
कई शहरों में डॉक्टरों ने प्रदर्शन और कार्य बहिष्कार किया, जिससे स्वास्थ्य सेवाओं पर भी असर पड़ा था। इस घटना ने अस्पतालों में डॉक्टरों, विशेषकर महिला स्वास्थ्यकर्मियों की सुरक्षा को लेकर गंभीर सवाल खड़े किए। साथ ही पुलिस जांच, अस्पताल प्रशासन की भूमिका और अपराध के बाद की प्रक्रियाओं को लेकर भी व्यापक बहस हुई।
कोलकाता पुलिस ने संजय रॉय को किया था गिरफ्तार
घटना के बाद कोलकाता पुलिस ने 10 अगस्त 2024 को अस्पताल से जुड़े नागरिक स्वयंसेवक संजय रॉय को गिरफ्तार किया था। जांच आगे बढ़ने के साथ मामला कलकत्ता हाई कोर्ट तक पहुंचा। हाई कोर्ट के आदेश के बाद 13 अगस्त 2024 को जांच केंद्रीय जांच ब्यूरो यानी CBI को सौंप दी गई। इसके बाद सीबीआई ने मामले की जांच अपने हाथ में लेकर घटना से जुड़े साक्ष्यों, आरोपों और अस्पताल प्रशासन की भूमिका की पड़ताल की। जांच के दौरान अस्पताल के तत्कालीन प्रिंसिपल डॉ. संदीप घोष की भूमिका भी जांच के दायरे में आई।
डॉ. संदीप घोष पर मामले से जुड़े साक्ष्यों से कथित छेड़छाड़ और वित्तीय अनियमितताओं के आरोप लगे। सीबीआई ने सितंबर 2024 में उन्हें गिरफ्तार किया था। मामले से जुड़े अलग-अलग पहलुओं की जांच एजेंसी की ओर से की गई।
जनवरी 2025 में संजय रॉय को मिली उम्रकैद
मामले में मुख्य आरोपी के तौर पर गिरफ्तार किए गए संजय रॉय के खिलाफ मुकदमा आगे बढ़ा। जनवरी 2025 में कोलकाता की विशेष अदालत ने उन्हें दोषी करार देते हुए आजीवन कारावास की सजा सुनाई। हालांकि, मृत महिला डॉक्टर के परिवार की ओर से आरोपी के लिए मृत्युदंड की मांग की गई थी। परिवार का कहना था कि अपराध की गंभीरता को देखते हुए दोषी को अधिकतम सजा मिलनी चाहिए।
संजय रॉय की सजा के बावजूद मामले को लेकर मृतका के परिवार की ओर से कई सवाल उठते रहे। परिवार ने यह आशंका भी जताई कि घटना में एक से अधिक लोग शामिल हो सकते हैं और पूरे घटनाक्रम की व्यापक जांच की आवश्यकता है।
सुप्रीम कोर्ट ने लिया था स्वतः संज्ञान
आरजी कर मामले की गंभीरता को देखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने भी स्वतः संज्ञान लिया था। अदालत ने डॉक्टरों और स्वास्थ्यकर्मियों की सुरक्षा से जुड़े व्यापक मुद्दों पर विचार किया और इस उद्देश्य से नेशनल टास्क फोर्स का गठन किया। टास्क फोर्स का उद्देश्य देशभर में डॉक्टरों की सुरक्षा से जुड़े उपायों पर सुझाव देना था।
इस मामले ने अस्पतालों में सुरक्षा व्यवस्था, महिला स्वास्थ्यकर्मियों की सुरक्षा और कार्यस्थल पर सुरक्षित वातावरण उपलब्ध कराने की जरूरत को राष्ट्रीय स्तर पर प्रमुख मुद्दा बनाया। बाद में दिसंबर 2025 में मामले को कलकत्ता हाई कोर्ट को वापस भेज दिया गया। इसके बाद जांच और उससे जुड़े कानूनी पहलुओं पर हाई कोर्ट की निगरानी में आगे की प्रक्रिया जारी रही।
मई 2026 में बनी तीन सदस्यीय SIT
मृतका के माता-पिता की ओर से मामले में एक से अधिक लोगों की संभावित संलिप्तता को लेकर जताई गई आशंका के बाद कलकत्ता हाई कोर्ट ने मई 2026 में सीबीआई की तीन सदस्यीय विशेष जांच टीम यानी SIT के गठन का आदेश दिया। यह टीम मामले के उन पहलुओं की पड़ताल कर रही है जिन पर परिवार की ओर से सवाल उठाए गए हैं। SIT का गठन मामले की जांच को और व्यापक बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम माना गया।
अब पश्चिम बंगाल सरकार की ओर से विशेष आयोग अधिनियम के तहत नए सिरे से जांच की घोषणा के बाद इस मामले में आगे की कार्रवाई पर नजर रहेगी। नई जांच में पुराने साक्ष्यों, जांच की प्रक्रिया और सामने आए नए सवालों को किस तरह देखा जाता है, यह आने वाले समय में स्पष्ट होगा।
फिर चर्चा में आया आरजी कर मामला
आरजी कर मेडिकल कॉलेज की घटना को दो साल पूरे होने से पहले एक बार फिर राज्य की राजनीति और न्यायिक प्रक्रिया के केंद्र में यह मामला आ गया है। नई जांच की घोषणा के बाद मृतका के परिवार की ओर से उठाए गए सवालों पर सरकार की कार्रवाई महत्वपूर्ण मानी जा रही है।
फिलहाल सरकार ने पुलिस की कथित विफलता और अंतिम संस्कार से जुड़ी शिकायतों की जांच के निर्देश दिए हैं। वहीं, सीबीआई की विशेष जांच टीम भी मामले के अन्य पहलुओं की जांच कर रही है। ऐसे में आरजी कर केस में आगे होने वाली जांच और उसके निष्कर्ष पर पीड़ित परिवार के साथ-साथ पूरे देश की नजर बनी हुई है।











