खनन और पत्थर उद्योग में काम करने वाले राजस्थान के मजदूर सिलिकोसिस जैसी घातक बीमारी की चपेट में तेजी से आ रहे हैं। दो साल में सामने आए 5,993 मामलों में से 2,817 की मौत ने श्रमिक सुरक्षा की पोल खोल दी है।
Rajasthan: राजस्थान के पत्थर उद्योग और खनन क्षेत्रों में काम करने वाले मजदूर अब अपनी ही मेहनत का शिकार बन रहे हैं। सिलिकोसिस नामक फेफड़ों की यह जानलेवा बीमारी धूल भरे वातावरण में काम करने वाले मजदूरों की सांसें छीन रही है। यह बीमारी केवल शारीरिक संकट नहीं है, बल्कि उनके परिवारों के लिए भी बड़ी त्रासदी बन गई है।
राज्य में हाल के आंकड़े बताते हैं कि पिछले दो साल में 5,983 सिलिकोसिस के मामले सामने आए। इनमें से 3,066 मरीज आज भी जंग लड़ रहे हैं, जबकि 2,917 मजदूरों की मौत हो चुकी है। यानी लगभग आधे मरीजों की जान इस बीमारी ने ले ली है। करौली और सिरोही जैसे जिलों में हालात बेहद डरावने हैं, जहां दो साल में लगभग 3,000 लोगों की मौत हुई।
खनन और पत्थर उद्योग में खतरा
विशेषज्ञों का कहना है कि सिलिकोसिस उन मजदूरों को प्रभावित करती है, जो लंबे समय तक सिलिका युक्त धूल में काम करते हैं। खदानों, क्रशर और पत्थर कटाई क्षेत्रों में यह धूल लगातार सांस के साथ फेफड़ों में जाती है और धीरे-धीरे फेफड़ों को नष्ट कर देती है। मजदूर अक्सर सुरक्षा उपकरणों के बिना काम करते हैं, जिससे बीमारी और घातक हो जाती है।

सुरक्षा उपायों और समय पर मेडिकल जांच की कमी इस बीमारी को और गंभीर बना रही है। कई मजदूर तो तब डॉक्टर के पास आते हैं जब बीमारी अपने अंतिम चरण में होती है। इससे इलाज मुश्किल हो जाता है और मृत्यु दर बढ़ जाती है।
समाज के लिए चेतावनी
सिलिकोसिस की भयावहता यह दिखाती है कि मजदूरों की सुरक्षा और स्वास्थ्य पर ध्यान देना कितना जरूरी है। समय पर जांच, मास्क और अन्य सुरक्षा उपकरण, तथा खदानों में धूल कम करने की व्यवस्था बेहद जरूरी है।
विशेषज्ञों का कहना है कि यदि तत्काल कदम नहीं उठाए गए, तो राजस्थान के खनन और पत्थर उद्योग में काम करने वाले हजारों मजदूर हर साल इस बीमारी की चपेट में आएंगे। सरकार, उद्योग और समाज को मिलकर मजदूरों की सुरक्षा सुनिश्चित करनी होगी, ताकि यह silent killer और ज्यादा जीवन न ले।









