“राम राज्य केवल राजा से नहीं, प्रजा से भी बनता है” – Mohan Bhagwat का नागपुर में बड़ा बयान

Mohan Bhagwat ने Nagpur में अपने संबोधन में कहा कि राम राज्य केवल राजा नहीं बल्कि प्रजा के आचरण से बनता है। जानिए उनके भाषण की मुख्य बातें और इसका सामाजिक संदेश

अयोध्या में श्रीराम जन्मभूमि पर भव्य मंदिर निर्माण तथा रामलला और धर्मध्वजा की प्रतिष्ठा के उपलक्ष्य में प्रतिभाओं के सम्मान और अभिनंदन का कार्यक्रम नागपुर के रेशमबाग स्थित डॉ. हेडगेवार स्मारक समिति द्वारा आयोजित किया गया। 

न्यूज़ दिल्ली: राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख Mohan Bhagwat ने नागपुर में आयोजित एक कार्यक्रम के दौरान “राम राज्य” की अवधारणा पर विस्तार से विचार व्यक्त किए। उन्होंने कहा कि आदर्श शासन व्यवस्था केवल शासक के गुणों पर निर्भर नहीं करती, बल्कि समाज के प्रत्येक व्यक्ति के आचरण और सहभागिता से मिलकर बनती है।

यह संबोधन नागपुर के रेशमबाग स्थित Dr. Hedgewar Smarak Samiti द्वारा आयोजित एक सम्मान समारोह में दिया गया, जिसमें Govind Dev Giri और Suresh Joshi सहित कई प्रमुख हस्तियां मौजूद थीं। कार्यक्रम का आयोजन अयोध्या में Ram Mandir Ayodhya के निर्माण और उससे जुड़े प्रयासों को सम्मानित करने के लिए किया गया था।

सामूहिक प्रयास से संभव हुआ मंदिर निर्माण

अपने संबोधन में भागवत ने कहा कि अयोध्या में भव्य मंदिर का निर्माण किसी एक व्यक्ति या संस्था का परिणाम नहीं, बल्कि सामूहिक प्रयासों का प्रतीक है। उन्होंने एक रूपक के माध्यम से समझाया कि जैसे भगवान श्रीकृष्ण द्वारा गोवर्धन पर्वत उठाने की कथा में सभी लोगों का योगदान आवश्यक था, उसी तरह मंदिर निर्माण भी समाज के सामूहिक सहयोग से ही संभव हुआ।

उन्होंने कहा कि “जब तक सभी लोग अपनी-अपनी ‘लकड़ी’ नहीं लगाते, तब तक बड़ा कार्य पूरा नहीं होता।” यह टिप्पणी समाज की भागीदारी और सामूहिक जिम्मेदारी को रेखांकित करती है।

भारत के उत्थान पर जोर

भागवत ने अपने भाषण में भारत के वैश्विक भूमिका पर भी प्रकाश डाला। उन्होंने कहा कि भारत का उत्थान केवल आर्थिक या राजनीतिक नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण है। उनके अनुसार, भारत की पहचान उसके मूल्यों और परंपराओं में निहित है, और इन्हीं के माध्यम से वह विश्व को दिशा दे सकता है।

उन्होंने यह भी कहा कि इतिहास में कई विचारकों, जैसे Sri Aurobindo, ने भारत के पुनरुत्थान की बात कही थी, और वर्तमान समय में यह प्रक्रिया तेज होती दिखाई दे रही है।

राजनीतिक और ऐतिहासिक संदर्भ

अपने संबोधन में भागवत ने भारत के राजनीतिक परिवर्तन का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि पिछले कुछ दशकों में देश ने अपनी पहचान को लेकर कई चरणों से गुजरते हुए एक नई दिशा पकड़ी है। उन्होंने संकेत दिया कि आधुनिक भारत में हो रहे बदलाव, विशेष रूप से 2014 के बाद की राजनीतिक घटनाएं, देश की आत्मविश्वास में वृद्धि को दर्शाती हैं। हालांकि, उन्होंने यह भी स्पष्ट किया कि राष्ट्र निर्माण एक सतत प्रक्रिया है, जिसमें समाज के हर वर्ग की भागीदारी जरूरी है।

भागवत ने कहा कि “राम राज्य” केवल आदर्श राजा की वजह से नहीं बनता, बल्कि आदर्श नागरिकों के कारण भी स्थापित होता है। उन्होंने Ramayana का उल्लेख करते हुए कहा कि इसमें न केवल भगवान राम के गुणों का वर्णन है, बल्कि उस समय की प्रजा के आचरण का भी विस्तार से उल्लेख किया गया है।

उनके अनुसार, यदि समाज का प्रत्येक व्यक्ति अपने जीवन में नैतिकता, अनुशासन और जिम्मेदारी का पालन करे, तो वही “राम राज्य” की नींव बनती है। उन्होंने लोगों से अपील की कि वे अपने व्यक्तिगत और सामाजिक जीवन में इन मूल्यों को अपनाएं और अपने प्रभाव क्षेत्र में सकारात्मक परिवर्तन लाने का प्रयास करें।

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