राष्ट्रपति शासन के बाद मणिपुर में सत्ता वापसी, भाजपा ने युमनाम खेमचंद को चुना CM

मणिपुर में राष्ट्रपति शासन खत्म होने के बाद भाजपा ने युमनाम खेमचंद सिंह को विधायक दल का नेता चुना। अब वे नए मुख्यमंत्री बनेंगे। राज्य मे जारी जातीय संकट के बीच।

मणिपुर में राष्ट्रपति शासन समाप्त होने के बाद भाजपा विधायक दल ने युमनाम खेमचंद सिंह को अपना नेता चुना है। इसके साथ ही वे राज्य के नए मुख्यमंत्री बनेंगे। यह फैसला लंबे समय से जारी Manipur Crisis के बीच लिया गया है।

Manipur Crisis: मणिपुर में लंबे समय से चल रहे राजनीतिक और सामाजिक संकट के बीच भारतीय जनता पार्टी ने बड़ा दांव चला है। राष्ट्रपति शासन समाप्त होने के बाद भाजपा विधायक दल ने युमनाम खेमचंद सिंह को अपना नया नेता चुन लिया है। इसके साथ ही अब वे मणिपुर के नए मुख्यमंत्री के रूप में राज्य की कमान संभालेंगे। यह फैसला ऐसे समय में आया है जब राज्य जातीय हिंसा, प्रशासनिक अस्थिरता और भरोसे के संकट से गुजर रहा है।

राष्ट्रपति शासन के बाद सत्ता की वापसी

मणिपुर में 13 फरवरी 2025 को राष्ट्रपति शासन लागू किया गया था। यह फैसला तब लिया गया जब कुकी-जो और मैतेई समुदायों के बीच जातीय हिंसा लगातार बढ़ती जा रही थी और राज्य सरकार हालात संभालने में विफल मानी गई। इसके बाद मुख्यमंत्री एन बीरेन सिंह ने अपने पद से इस्तीफा दे दिया था।

राष्ट्रपति शासन के दौरान राज्य की कानून-व्यवस्था और प्रशासनिक फैसले सीधे केंद्र सरकार के नियंत्रण में रहे। बाद में संसद ने अगस्त 2025 में राष्ट्रपति शासन को छह महीने के लिए और बढ़ा दिया था। अब राष्ट्रपति शासन की समाप्ति के साथ ही राज्य में फिर से निर्वाचित सरकार की वापसी का रास्ता साफ हुआ है।

दिल्ली में हुई अहम बैठक

राष्ट्रपति शासन खत्म होने से कुछ दिन पहले राष्ट्रीय राजधानी दिल्ली में भाजपा विधायकों की अहम बैठक हुई। इस बैठक में मणिपुर से भाजपा के सभी विधायक शामिल हुए। इसके बाद एनडीए के सहयोगी दलों के साथ भी अलग से चर्चा की गई।

इन बैठकों का मकसद था नए नेता का चयन करना जो न सिर्फ पार्टी के भीतर संतुलन बना सके बल्कि राज्य में बिगड़े हालात को भी संभाल सके। लंबी चर्चा और विचार-विमर्श के बाद युमनाम खेमचंद सिंह के नाम पर सहमति बनी।

युमनाम खेमचंद सिंह बने विधायक दल के नेता

भाजपा विधायक दल ने सर्वसम्मति से युमनाम खेमचंद सिंह को अपना नेता चुना। इसके साथ ही उनका मुख्यमंत्री बनना तय हो गया। पार्टी का मानना है कि खेमचंद सिंह का प्रशासनिक अनुभव और संगठन पर पकड़ राज्य में स्थिरता लाने में मदद करेगी।

उनकी छवि एक सुलझे हुए और अनुभवशील नेता की मानी जाती है, जो अलग-अलग समुदायों के बीच संवाद स्थापित कर सकते हैं।

Manipur Crisis में क्यों अहम है यह फैसला

मणिपुर पिछले दो वर्षों से जातीय हिंसा की आग में झुलस रहा है। 3 मई 2023 को शुरू हुई हिंसा ने राज्य की सामाजिक संरचना को बुरी तरह प्रभावित किया। हजारों लोग विस्थापित हुए, सैकड़ों की जान गई और प्रशासन पर गंभीर सवाल उठे।

एन बीरेन सिंह के इस्तीफे के बाद राजनीतिक शून्य पैदा हो गया था। राष्ट्रपति शासन के दौरान हालात कुछ हद तक नियंत्रण में आए, लेकिन स्थायी समाधान के लिए निर्वाचित सरकार की जरूरत महसूस की जा रही थी। ऐसे में युमनाम खेमचंद सिंह को मुख्यमंत्री बनाना भाजपा की ओर से संकट प्रबंधन की कोशिश माना जा रहा है।

जांच आयोग और केंद्र सरकार की भूमिका

केंद्रीय गृह मंत्रालय ने मणिपुर हिंसा की जांच के लिए गठित आयोग को दिसंबर 2025 में समय सीमा बढ़ाई थी। आयोग को निर्देश दिया गया है कि वह अपनी रिपोर्ट जितनी जल्दी हो सके, लेकिन 20 मई 2026 से पहले जरूर सौंपे।

इस आयोग को 3 मई 2023 से शुरू हुई हिंसा के कारणों, प्रशासनिक प्रतिक्रिया और जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका की जांच करनी है। नई सरकार के सामने इस आयोग की रिपोर्ट और उसके सुझावों को लागू करना भी बड़ी चुनौती होगी।

कौन हैं युमनाम खेमचंद सिंह

युमनाम खेमचंद सिंह मणिपुर की राजनीति में जाना-पहचाना नाम हैं। वे भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ नेता हैं और सिंगजामेई विधानसभा क्षेत्र से 2017 और 2022 में विधायक चुने जा चुके हैं।

2017 से 2022 तक वे मणिपुर विधानसभा के अध्यक्ष भी रहे। इस दौरान उन्होंने सदन की कार्यवाही को संतुलित ढंग से चलाने की कोशिश की और सभी दलों के साथ संवाद बनाए रखा।

मंत्री के रूप में अनुभव

2022 के विधानसभा चुनाव के बाद बने दूसरे बीरेन सिंह मंत्रिमंडल में युमनाम खेमचंद सिंह को कैबिनेट मंत्री बनाया गया था। उनके पास नगर प्रशासन, आवास विकास (MAHUD), ग्रामीण विकास और पंचायती राज तथा शिक्षा जैसे अहम विभाग थे।

इन विभागों में काम करते हुए उन्होंने शहरी विकास, पंचायत स्तर पर योजनाओं के क्रियान्वयन और शिक्षा व्यवस्था को मजबूत करने की दिशा में काम किया। फरवरी 2025 में राष्ट्रपति शासन लागू होने तक वे मंत्री पद पर बने रहे।

नई सरकार के सामने चुनौतियां

नए मुख्यमंत्री के सामने सबसे बड़ी चुनौती राज्य में भरोसा बहाल करने की होगी। कुकी-जो और मैतेई समुदायों के बीच तनाव अब भी पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है। विस्थापित लोगों की पुनर्वापसी, राहत शिविरों की स्थिति और कानून-व्यवस्था को मजबूत करना सरकार की प्राथमिकता होगी।

इसके अलावा विकास परियोजनाओं को दोबारा गति देना, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं को सामान्य करना और युवाओं में भरोसा जगाना भी जरूरी होगा।

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