अमेरिकी फेडरल रिजर्व के सख्त रुख के बाद अब भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) पर भी ब्याज दरों में बढ़ोतरी का दबाव बढ़ सकता है। यस बैंक की एक शोध रिपोर्ट के मुताबिक, भारत और अमेरिका के बीच ब्याज दरों का अंतर और कम हुआ है, जिससे अक्टूबर में आरबीआई की ओर से रेपो रेट बढ़ाने की संभावना बढ़ गई है।
RBI Repo Rate Hike: अमेरिकी फेडरल रिजर्व के सख्त मौद्रिक रुख के बाद भारतीय रिजर्व बैंक (RBI) की आगामी मौद्रिक नीति बैठक पर बाजार की नजरें टिक गई हैं। यस बैंक की एक शोध रिपोर्ट में संकेत दिया गया है कि भारत और अमेरिका के बीच ब्याज दरों का अंतर कम होने, महंगाई में बढ़ोतरी और कच्चे तेल की ऊंची कीमतों के कारण अक्टूबर में आरबीआई के सामने ब्याज दरों को लेकर चुनौती बढ़ सकती है। हालांकि, रेपो रेट बढ़ाने का अंतिम निर्णय घरेलू आर्थिक परिस्थितियों, महंगाई और नकदी की स्थिति के आकलन पर निर्भर करेगा।
अमेरिकी फेड के फैसले से भारत की चिंता क्यों बढ़ी?
अमेरिकी फेडरल रिजर्व की ओर से ब्याज दरों में 25 आधार अंकों की बढ़ोतरी के बाद उसकी नीतिगत दर 3.75 से 4 प्रतिशत के दायरे में पहुंच गई है। रिपोर्ट के अनुसार, फेड का यह कदम महंगाई को नियंत्रित करने के लिए सख्त मौद्रिक नीति पर उसके फोकस को दर्शाता है। फेड ने 2026 के लिए आर्थिक विकास और महंगाई से जुड़े अनुमानों में भी बदलाव किया है।
यस बैंक की रिपोर्ट के मुताबिक, अमेरिका में आर्थिक गतिविधियों और रोजगार बाजार की स्थिति फेड को महंगाई के खिलाफ सख्त रुख बनाए रखने की गुंजाइश दे रही है। रिपोर्ट में यह भी बताया गया है कि बाजार में दिसंबर में एक और 25 आधार अंकों की दर बढ़ोतरी की संभावना पर चर्चा हो रही है। हालांकि, भविष्य के फैसले आर्थिक आंकड़ों और फेड की नीतिगत समीक्षा पर निर्भर करेंगे।
भारत और अमेरिका के बीच ब्याज दरों का अंतर बना अहम मुद्दा

अमेरिकी ब्याज दरों में बढ़ोतरी और भारत की मौद्रिक नीति के बीच अंतर कम होने से भारतीय वित्तीय बाजार पर असर पड़ सकता है। ब्याज दरों का अंतर कम होने पर कुछ विदेशी निवेशकों के लिए अमेरिकी परिसंपत्तियां अधिक आकर्षक हो सकती हैं। इससे उभरते बाजारों में पूंजी प्रवाह और विदेशी मुद्रा बाजार पर दबाव की स्थिति बन सकती है।
यस बैंक की रिपोर्ट में भारतीय बाजार से विदेशी पोर्टफोलियो निवेशकों (FPI) की शुद्ध निकासी को भी एक महत्वपूर्ण चिंता के रूप में रेखांकित किया गया है। हालांकि, किसी भी बाजार पर असर केवल ब्याज दरों के अंतर से तय नहीं होता। वैश्विक जोखिम, निवेशकों का भरोसा, आर्थिक विकास और मुद्रा विनिमय दर जैसे अन्य कारक भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।
महंगाई और कच्चे तेल की कीमतें बढ़ा सकती हैं दबाव
भारत में आरबीआई के संभावित फैसले के लिए घरेलू महंगाई की स्थिति महत्वपूर्ण रहेगी। रिपोर्ट में अगस्त के खुदरा महंगाई यानी उपभोक्ता मूल्य सूचकांक (CPI) और मुख्य महंगाई (Core Inflation) में बढ़ोतरी का उल्लेख किया गया है। यदि महंगाई का दबाव लगातार बना रहता है, तो केंद्रीय बैंक के लिए मूल्य स्थिरता और आर्थिक विकास के बीच संतुलन बनाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
इसके अलावा, कच्चे तेल की कीमतों में मजबूती भारत की अर्थव्यवस्था के लिए एक अहम जोखिम मानी जाती है। भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों के एक बड़े हिस्से के लिए आयात पर निर्भर है। ऐसे में महंगा कच्चा तेल आयात लागत, व्यापार संतुलन और महंगाई के दबाव को प्रभावित कर सकता है। हालांकि, इसका वास्तविक असर अंतरराष्ट्रीय कीमतों, रुपये की विनिमय दर और घरेलू बाजार में कीमतों के हस्तांतरण पर निर्भर करता है।
अतिरिक्त नकदी और आरबीआई की रणनीति
अक्टूबर में रेपो रेट से जुड़े संभावित फैसले के साथ बैंकिंग प्रणाली में उपलब्ध अतिरिक्त नकदी भी महत्वपूर्ण मुद्दा बन सकती है। यस बैंक के अनुसार, आरबीआई की नकदी प्रबंधन संबंधी कार्रवाइयों का प्रभाव मौद्रिक नीति के आकलन में अहम होगा। रिपोर्ट में भारित औसत कॉल दर (WACR) के 5.05 प्रतिशत होने का उल्लेख किया गया है। यह दर बैंकिंग प्रणाली में अल्पकालिक उधारी की स्थिति का एक संकेतक है। केंद्रीय बैंक नकदी प्रबंधन के विभिन्न उपायों के माध्यम से बाजार की तरलता और अल्पकालिक ब्याज दरों को प्रभावित करता है।
अमेरिकी फेड के फैसले, घरेलू महंगाई, विदेशी निवेश और नकदी की स्थिति को देखते हुए अक्टूबर की मौद्रिक नीति समीक्षा महत्वपूर्ण हो सकती है। हालांकि, केवल अमेरिकी फेड की दर बढ़ोतरी के आधार पर आरबीआई के रेपो रेट बढ़ाने का निष्कर्ष निकालना उचित नहीं होगा।










